Do Beegha Zameen – जिंदगी के ताने – बाने में उलझती परिवार की खुशियाँ

जीवन एक  ऐसी पहेली है जो किसी के लिए खुशियों की बहार लेकर आती है तो किसी पर यह समस्यायों का  पहाड़ बनकर टूटती है।ऐसी ही एक फिल्म दो बीघा ज़मीन जिसमे जीवन से घिरे एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसकी समस्याएं उसके परिवार की हर खुशियों को खत्म कर देती है। मगर वह कभी भी हार नहीं मानता और अपनी हर परिस्थिति में अपना जीवन अपने आदर्शों पर जीता है।

दो बीघा ज़मीन, यह फिल्म 16 जनवरी 1953 में रिलीज़ हुयी थी और इस फिल्म के निर्माता और निर्देशक दोनों ही बिमल रॉय हैं।  यह फिल्म रविंद्र नाथ टैगोर की एक कविता “Dui Bigha Jomi” पर आधारित है और इस फिल्म की प्रेरणा बिमल रॉय को इटेलियन फिल्म  ” Bicycle Thieves” से मिली, जो 1948 में रिलीज़ हुयी थी।

Story 

 फिल्म की कहानी शुरू होती है एक किसान शम्भू  महतो से जो अपने परिवार पिता , पत्नी पार्वती और बेटा कन्हैया के साथ एक छोटे से गाँव में रहता है शम्भू के पास अपने और परिवार के जीवन यापन के लिए सिर्फ 2 बीघा ज़मीन ही है, जिस पर वह खेती करकर अपना काम चलाता है। मगर कई वर्षों से बारिश न होने की वजह से गांव  मे अकाल की वजह से शम्भू असर्मथ है परिवार का पोषण करने में।

कुछ समय पश्चात् बारिश होने की वजह से सभी गांव वालों को अपनी विपत्ति के दिन जाते हुए नज़र आते हैं मगर शम्भू पर अब विपत्ति आने वाली है और वो भी गांव के जमींदार ठाकुर हरनाम सिंह बनकर।ठाकुर हरनाम सिंह गांव में एक मिल का निर्माण करना चाहते हैं और उस मिल वाली जमीन के बीच में शम्भू की 2 बीघा ज़मीन आती है 

हरनाम सिंह को पूरा भरोसा है कि वह शम्भू से इस ज़मीन को खरीद लेंगे क्योकि शम्भू ने अपने परिवार की जीविका करने के लिए जमींदार से कुछ कर्ज़ लिया था जिसको उसने कई वर्षों से चुकाया नहीं है। मगर शम्भू अपनी एक मात्र जीविका को बेचने से मना  कर देता है। इससे नाराज़ हरनाम शम्भू को बोलता है कि या तो कल कर्ज़ चुकाओ या फिर अपनी जमीन की नीलामी के लिए तैयार हो जाना।

शम्भू अपने पिता और परिवार को सब कुछ बताता है, सभी उसके निर्णय से सहमत होते हैं और घर का सारा सामान और गहने बेचने को तैयार होते हैं इसी बीच शम्भू अपने बेटे की मदद से क़र्ज़ का मूल्य जान लेता है कि 65 रुपये है और वह सब कुछ बेच कर इन रुपयों का इंतेज़ाम कर लेता है।

सुबह होते ही वह यह 65 रुपये ठाकुर हरनाम को देता है मगर उसको जब धक्का लगता है जब उसको पता चलता है कि कर्ज़ की कीमत 65 रुपए नहीं बल्कि 235 रुपये है। मामला अदालत तक जाता है शम्भू इलज़ाम लगता है कि ठाकुर के लोगो ने खाते के साथ छेड़छाड़ की है मगर अनपढ़ होने की वजह से वह यह साबित नहीं कर पाता  और अदालत उसको 3 महीने की मोहलत देती है कर्ज़ की पूरी रकम चुकाने के लिए।

शम्भू रकम पूरी करने के लिए बहुत  संघर्ष करता है मगर कोई भी उसको कर्ज़ नहीं देता। इतनी ज्यादा रकम के इंतेज़ाम के बारे में वह सोच – सोच कर परेशां होता है उसकी समय उसका एक मित्र कलकत्ता जाकर नौकरी करने का सुझाव देता है जिसे शम्भू स्वीकार कर लेता है।  शम्भू अपने बेटे को साथ नहीं ले जाना चाहता है मगर कन्हैया जिद करके साथ आ जाता है।

कलकत्ता पहुँच तो जाते हैं दोनों मगर कोई भी उन्हें काम देने को तैयार नहीं होता है।जिसकी वजह से उन दोनों को सड़क के किनारे ही रातें गुजारनी पड़ती हैं। धीरे – धीरे शम्भू की दोस्ती फुटपाथ पर रहने वाले लालू उस्ताद से होती है जो उसको काम दिलवाते हैं।  एक दिन फुटपाथ पर सोते समय शम्भू के सामानों की चोरी हो जाती है। और वही दूसरी तरफ कन्हैया को बहुत तेज़ बुखार हो जाता है फिर शम्भू रानी और चाय वाले की मदद से एक कमरा किराये पर लेता है और उसका किराया चुकाने के लिए वह कुली का काम करता है।

शम्भू की दोस्ती एक रिक्शा चालक से होती है जो उसको रिक्शा चलने का लाइसेंस भी दिलवाता है तो अब शम्भू रिक्शा चलने के साथ – साथ जूता पोलिश का भी काम करता है।

तीसरा महीना आते ही शम्भू कर्ज़ की रकम को पूरा करने के लिए और ज्यादा मेहनत  करने लगता है। एक दिन एक व्यक्ति अपनी प्रेमिका का पीछा करने  शम्भू से तेज रिक्शा चलने को बोलता है और शम्भू भी ज्यादा पैसों के लालच में बहुत तेज चलता है और उसका एक्सीडेंट हो जाता है। कन्हैया अपने पिता की ऐसी हालत देखकर और कर्ज़ की रकम को पूरा करने के लिए जलत कार्य की और बाद जाता है।

जब यह बात शम्भू को पता चलती है तो वह बहुत ही नाराज़ होता है।उधर गांव में शम्भू का कोई भी खत ना मिलने पर परेशां पार्वती कलकत्ता पहुँच जाती है और वहां पहुँचते ही उसकी मुलाकात एक गलत इंसान से हो जाती है जो पति को जानने का झांसा देकर पार्वती को अपने घर ले जाता है। जब पार्वती को उसके गलत इरादों का पता चलता है तो वह वहां से भाग जाती है और थोड़ी दूर जाकर उसका एक्सीडेंट हो जाता है।

कुछ लोग पार्वती को अस्पताल ले जाने के लिए  शम्भू के रिक्शे का उपयोग करते हैं जैसे ही शम्भू पार्वती को देखता है तो वह चौक जाता है और उसको जल्दी से अस्पताल ले जाता है, वहां पर डॉक्टर ऑपरेशन की बात करता है। वहीँ दूसरी तरफ कन्हैया एक महिला के पैसे चुकारकर घर आता है और उसे माँ के एक्सीडेंट के बारे में पता चलता है।

अस्पताल में माँ की ऐसी हालत देखकर उसे खुद के किये पर पछतावा होता है और वह चुरायेगये पैसे फेंक देता है और ऐसा कभी न करने का निर्णय लेता है। शम्भू  की कमाई गयी रकम पार्वती के इलाज में खर्च हो जाती है और उसके बाद वह गांव वापस लौट आता है।  शम्भू की 2 बीघा ज़मीन नीलाम हो जाती है और हरनाम के पास चली जाती है फिर वहां पर मिल का निर्माण शुरू हो जाता है।  और शम्भू और उसका परिवार अपनी ज़मीन से बहुत हो जाते हैं। इसी के साथ फिल्म का अंत भी हो जाता है।  

Songs & Cast –

 फिल्म के सभी गाने बहुत लोकप्रिय हैं और आज भी सुने जाते हैं। इसका संगीत सलिल चौधरी ने दिया है – ” आजा री आ निदिया तू आ “, “अजब तोरी दुनिया ओ मेरे राजा “, “धरती कहे पुकार के “, “हरियाला सावन ढोल बजाता आया ” और इन गानों को आवाज़ दी है लता मंगेशकर, मन्ना डे और मोहम्मद रफ़ी ने।

इस फिल्म में अभिनय बलराज सहानी (शम्भू ), निरुपा रॉय ( पार्वती ), मुराद (ठाकुर हरनाम सिंह ), रतन कुमार ( कन्हैया), नूर जहाँ (रानी ) और अन्य कलाकारों ने साथ दिया है।

फिल्म की अवधि 2 घंटे और 22 मिनट्स (142 मिनट्स ) है। यह फिल्म ब्लैक & व्हाइट बनी है।

Location  इस फिल्म की शूटिंग कोलकत्ता और उसके आस पास की छोटी छोटी जगहों पर की गयी है।

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