गुजरात का नाम लेते ही ज़ेहन में क्या आता है? गरबा, व्यापार, ढोकला, और शायद बॉलीवुड के कुछ बड़े नाम जो इस माटी से निकले। लेकिन एक चीज़ है जो अक्सर बातचीत में पीछे रह जाती है — और वो है गुजराती सिनेमा।
ढोलीवुड। जी हाँ, यही नाम है इस इंडस्ट्री का। ढोल की थाप पर जन्मी, संघर्षों में पली, और जब सबने समझा कि शायद ये सिनेमा अब खत्म हो गया — तब इसने ऐसी वापसी की कि पूरा देश चौंक गया। ये कहानी सिर्फ फिल्मों की नहीं है। ये कहानी है एक भाषा की, एक संस्कृति की, और उन लोगों की जिन्होंने हार नहीं मानी।
वो पहली आवाज़ — जब गुजरात पर्दे पर बोला
साल था 1931। बॉम्बे के एक सिनेमाघर में 4 फरवरी को पहली बार गुजराती ज़बान में कुछ बोला गया — एक छोटी सी शॉर्ट फिल्म, नाम था चवचव नो मुरब्बो। यह गुजराती की पहली साउंड फिल्म थी। उस फिल्म में जो पहले शब्द गूँजे, वो थे — “माने मनकड करदे”। एक साधारण सा डायलॉग, लेकिन उस पल का मतलब असाधारण था। गुजरात पर्दे पर बोल उठा था।

फिर 1932 में आई नरसिंह मेहता — पहली फुल-लेंथ गुजराती टॉकी, जिसे निर्देशित किया नानूभाई वकील ने। संत नरसिंह मेहता की जीवनी पर आधारित इस फिल्म ने दर्शकों को एक नई दुनिया से मिलवाया। और यहीं से शुरू हुआ गुजराती सिनेमा का सफर — धीमा, लेकिन पक्का।
1947 तक यानी आज़ादी से पहले, सिर्फ बारह गुजराती फिल्में बनी थीं। बारह। ये संख्या बताती है कि शुरुआत कितनी कठिन थी। लेकिन जो बना, वो दिल से बना था।
उदय का दौर — जब गुजरात ने अपनी कहानियाँ खुद लिखीं
1940 के दशक में गुजराती सिनेमा ने अपनी एक पहचान बनाई। संत-सती फिल्में, पौराणिक कथाएँ, लोककथाएँ — यही गुजराती पर्दे की दुनिया थी। रणकदेवी, मीराबाई, गुणसुंदरी जैसी फिल्मों ने दर्शकों के दिलों में जगह बनाई। ये फिल्में उस समाज की नब्ज़ पकड़ती थीं — उनकी आस्था, उनके संघर्ष, उनकी ज़मीन।
1960 का साल गुजराती सिनेमा के लिए एक नया मोड़ लाया। गुजरात और महाराष्ट्र अलग राज्य बने। और उसी साल गुजराती फिल्म इंडस्ट्री ने अपनी 100वीं फिल्म का आँकड़ा पार किया। 1932 से 1961 तक — करीब तीस साल में पहला शतक। धीमी रफ्तार थी, मगर दिशा साफ थी।
1968 में आई लीलुडी धरती — पहली गुजराती रंगीन फिल्म। उस रंग के साथ जैसे गुजराती सिनेमा ने भी एक नई साँस ली।
सुनहरा ज़माना — 70-80 का दशक, जब ढोलीवुड चमका
अगर गुजराती सिनेमा का कोई सबसे खूबसूरत दौर रहा है, तो वो था 1970 और 1980 का दशक। इसे ढोलीवुड का गोल्डन एरा कहा जाता है — और बेवजह नहीं।
गुजरात सरकार ने 1970 के दशक में एंटरटेनमेंट टैक्स से छूट दी और सब्सिडी का ऐलान किया। इस एक फैसले ने पूरी इंडस्ट्री की तस्वीर बदल दी। सिर्फ 70 के दशक में 200 से ज़्यादा गुजराती फिल्में बनीं। परिवार, रोमांस, सामाजिक मुद्दे, कॉमेडी, पौराणिक — हर तरह की कहानियाँ पर्दे पर आईं।
और इसी दौर में उभरा गुजराती सिनेमा का पहला असली महानायक — नरेश कनोडिया।
नरेश कनोडिया वो नाम हैं जिन्हें गुजराती सिनेमा का अमिताभ बच्चन कहा जाए तो शायद अतिशयोक्ति नहीं होगी। 1970 में वेली ने आव्या फूल से शुरुआत कर उन्होंने 100 से ज़्यादा गुजराती फिल्में कीं। अपने भाई महेश कनोडिया के साथ उन्होंने महेश-नरेश की जोड़ी बनाई जो दर्शकों की चहेती बन गई। 1980 के दशक में वो विदेश में भी गुजराती स्टेज शो करने वाले पहले गुजराती कलाकार बने — अफ्रीका, अमेरिका, एशिया। गुजराती सिनेमा की आवाज़ समंदर पार पहुँच गई थी।
उपेंद्र त्रिवेदी, अरविंद त्रिवेदी — ये नाम उस दौर में घर-घर जाने जाते थे। जोग संजोग, मेरु मलन, धोला मारू, मां-बाप ने भूलशो नहीं — ये फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं थीं, ये गुजराती समाज का आईना थीं।
पतन — जब पर्दा धुँधला पड़ गया
लेकिन 1990 का दशक आया और गुजराती सिनेमा पर जैसे एक लंबी रात उतर आई।
टेलीविज़न का असर बढ़ा। बॉलीवुड की फिल्में हर शहर, हर कस्बे में पहुँच रही थीं — बड़े स्टार, बड़े बजट, बड़े गाने। और गुजराती सिनेमा? वो कहानियाँ दोहराता रहा जो पहले चल चुकी थीं। नई सोच नहीं, नए चेहरे नहीं, नया दर्शक नहीं।
शहरी गुजराती दर्शक इस सिनेमा से कटता चला गया। वो हिंदी फिल्में देखने लगा, अंग्रेज़ी फिल्में देखने लगा। जो गुजराती फिल्में बन रही थीं, वो सिर्फ ग्रामीण दर्शकों को ध्यान में रखकर बन रही थीं — और ग्रामीण दर्शक भी धीरे-धीरे टीवी की तरफ खिंच रहे थे।
2000 तक आते-आते एक साल में 20 से भी कम गुजराती फिल्में रिलीज़ हो रही थीं। वो इंडस्ट्री जिसने 70 के दशक में सिर्फ एक दशक में 200 फिल्में बनाई थीं — वो अब साँसें गिन रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे गुजराती सिनेमा का सफर शायद यहीं खत्म हो जाएगा।

पहली उम्मीद — सरकार ने बढ़ाया हाथ
2005 में गुजरात सरकार ने एक बड़ा फैसला किया — गुजराती फिल्मों पर 100% एंटरटेनमेंट टैक्स माफ। साथ में हर फिल्म के लिए 5 लाख रुपए की सब्सिडी का ऐलान।
इस एक घोषणा ने इंडस्ट्री में हलचल पैदा कर दी। फिल्में बनने लगीं। आँकड़े बढ़े। लेकिन एक समस्या थी — बनीं तो फिल्में, मगर सिर्फ संख्या बढ़ी, गुणवत्ता नहीं। सस्ती कहानियाँ, कमज़ोर तकनीक, और उसी पुराने फार्मूले को दोहराते चेहरे।
दर्शक सिनेमाघरों में आए, लेकिन वापस जाने के बाद लौटे नहीं। सरकार की मदद एक लाठी थी — जिससे चलना शुरू हुआ, मगर दौड़ने के लिए कुछ और चाहिए था।
वो “कुछ और” 2012 में आया।
पुनर्जन्म — केवी रीते जईश और नए गुजराती सिनेमा का जन्म
अभिषेक जैन एक युवा निर्देशक थे जिन्होंने मुंबई में बॉलीवुड प्रोडक्शन हाउसेज़ के साथ काम किया था। वो अहमदाबादी थे। और एक दिन उन्होंने फैसला किया — गुजराती में फिल्म बनाएँगे। ऐसी फिल्म जो शहरी गुजराती युवाओं की बात करे। उनकी ज़िंदगी, उनके सपने, उनकी दिक्कतें।
सिर्फ 1.75 करोड़ रुपए के बजट में बनी केवी रीते जईश — 15 जून 2012 को रिलीज़ हुई। फिल्म की कहानी थी गुजराती पटेल परिवार का अमेरिका जाने का जुनून। एक ऐसी इच्छा जो करोड़ों गुजराती घरों में ज़िंदा थी, मगर इससे पहले किसी ने उसे पर्दे पर इतने करीब से नहीं दिखाया था।
दर्शक सिनेमाघरों में गए — और हँसते, रोते, सोचते हुए निकले। फिल्म ने वो किया जो सालों से गुजराती सिनेमा नहीं कर पाया था — शहरी दर्शक को वापस सीट पर लाया।
2012 में ही गुजराती फिल्मों की रिलीज़ संख्या 72 के पीक पर पहुँच गई। 2011 में जो फिल्में 20-25 स्क्रीन पर रिलीज़ होती थीं, 2015 तक वो 150-160 स्क्रीन पर आने लगीं। बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 2014 में ₹7 करोड़ था — 2015 में ₹55 करोड़। यह सिर्फ संख्याएँ नहीं थीं, यह एक पुनर्जन्म का प्रमाण था।
राष्ट्रीय मंच पर गुजराती — ऑस्कर से नेशनल अवार्ड तक
अभिषेक जैन ने जो दरवाज़ा खोला, उसमें से एक पूरी पीढ़ी निकली।
2013 में द गुड रोड बनी — और भारत की ओर से ऑस्कर के लिए आधिकारिक प्रविष्टि के रूप में भेजी गई। एक गुजराती फिल्म, ऑस्कर की दौड़ में। वो पल पूरे गुजरात के लिए गर्व का पल था।
2019 में हेलारो आई — कच्छ की महिलाओं की कहानी, 1970 के दशक की पृष्ठभूमि में। इस फिल्म ने 66वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में बेस्ट फीचर फिल्म का सर्वोच्च सम्मान जीता। किसी ने शायद सोचा भी नहीं था कि वो दिन आएगा जब एक गुजराती फिल्म भारत की सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित होगी।
और फिर आई छेलो शो — पान नलिन की मास्टरपीस। एक बच्चे की सिनेमा के प्रति दीवानगी की कहानी। इसे भारत की ओर से ऑस्कर 2023 के लिए आधिकारिक एंट्री चुना गया — RRR और कश्मीर फाइल्स जैसी दिग्गज फिल्मों को पीछे छोड़कर। गुजराती सिनेमा ने साबित कर दिया था कि वो किसी से कम नहीं।
वो चीज़ जो गुजराती सिनेमा को अलग बनाती है
गुजराती सिनेमा की एक खासियत है जो उसे बाकी क्षेत्रीय सिनेमाओं से अलग करती है — वो है अपनी माटी से जुड़ाव।
जो फिल्में सबसे ज़्यादा चलीं, वो वही थीं जो गुजराती दर्शक के बचपन की, उसके घर की, उसकी बोली की बात करती थीं। अभिषेक जैन ने खुद कहा है — “जो फिल्में लोगों की जड़ों से जुड़ती हैं, जो उन्हें उनके बचपन की याद दिलाती हैं, वही सबसे ज़्यादा चलती हैं।”

गुज्जूभाई द ग्रेट, चेलो दिवस, रेवा, बे यार, राँग साइड राजू — इन फिल्मों ने नए गुजराती सिनेमा का चेहरा बनाया। इनमें ग्लैमर था, मगर उससे ज़्यादा था अपनापन।
आज का ढोलीवुड — कहाँ खड़ा है?
आज गुजराती सिनेमा सिर्फ गुजरात में नहीं देखा जाता। OTT प्लेटफॉर्म्स पर गुजराती कंटेंट की माँग बढ़ रही है। विदेश में बसे गुजराती डायस्पोरा — अमेरिका, UK, अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया — अपनी भाषा में फिल्में देखना चाहते हैं। और ढोलीवुड उन्हें वो दे रहा है।
2016 में गुजरात सरकार ने इंसेंटिव पॉलिसी लागू की। डिजिटल तकनीक ने छोटे बजट को भी बड़े पर्दे के काबिल बना दिया। नए निर्देशक, नए अभिनेता, नई कहानियाँ — इंडस्ट्री जीवंत है।
लेकिन चुनौतियाँ भी हैं। बजट की सीमाएँ हैं। बड़े शहरों में स्क्रीन मिलना अभी भी मुश्किल है। और हिंदी सिनेमा का दबाव हमेशा रहेगा।
आखिरी बात
गुजराती सिनेमा की कहानी दरअसल किसी भी उस चीज़ की कहानी है जो गिरती है, लड़ती है, और फिर उठती है।
1932 में एक संत की कहानी से शुरू हुई यह यात्रा आज ऑस्कर तक पहुँच चुकी है। रास्ते में अंधेरे आए, निराशा आई, सन्नाटा आया। लेकिन कुछ लोग थे जो मानते रहे कि इस भाषा में, इस माटी में, इन कहानियों में दम है।
और वो सही साबित हुए।
ढोलीवुड मर नहीं गया था। वो बस साँस ले रहा था — अगली छलाँग के लिए।