70 साल पुरानी ये फिल्म आज भी क्यों रुलाती है — Nakdong River (1952) Review
कुछ फिल्में सिर्फ देखी जाती हैं। और कुछ फिल्में महसूस होती हैं। Nakdong River उन चुनिंदा फिल्मों में से है…
Movie Reviews – Connect to Life
कुछ फिल्में सिर्फ देखी जाती हैं। और कुछ फिल्में महसूस होती हैं। Nakdong River उन चुनिंदा फिल्मों में से है…
एक सवाल पूछता हूँ। Sleeping Beauty देखने के बाद आपको सबसे पहले किसका चेहरा याद आता है? सुनहरे बालों वाली…
आज जब हम कोरिया की बात करते हैं तो ज़हन में क्या आता है? BTS की धुनें। Squid Game का…
एक पल के लिए सोचिए — दूसरा विश्व युद्ध अपने चरम पर है, लंदन की गलियां बम धमाकों से अभी-अभी…
लेखक की कलम से: कुछ फ़िल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बनती। कुछ फ़िल्में एक दर्पण होती हैं — जिसमें…
क्या कोई फिल्म एक साथ इतनी शांत और इतनी तूफानी हो सकती है? क्या एक बूढ़ा अभिनेता, एक ईर्ष्यालु प्रेमिका,…
क्या किसी औरत का बदला सिर्फ उसके जीवन तक सीमित होता है, या वह मौत के बाद भी जारी रह…
कल्पना कीजिए, एक ऐसा दौर जब सिनेमा के पर्दे पर उतरती हर तस्वीर एक सपने जैसी लगती थी। चेहरे पर…
हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग की वो मासूम चेहरे वाली शोख लड़की, जिसकी बड़ी-बड़ी आंखें और सहज मुस्कान ने लाखों…
क्लासिक वर्ल्ड सिनेमा पर कई सालों से लिखते हुए हमेशा यह महसूस हुआ है कि कुछ फिल्में “स्टोरी” से ज़्यादा…
बॉलीवुड के स्वर्णिम दौर की बात हो और 1958 का ज़िक्र न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। यह वह…
हैलो दोस्तों! आज हम एक ऐसी फिल्म की बात करने वाले हैं, जिसने सदी के मध्य में बैठे दर्शकों की…
आज के दौर में जब हम ‘RRR’ या ‘पोन्नियिन सेलवन’ के शानदार विजुअल्स देखते हैं, तो उनकी तकनीकी चमक-धमक हैरान…
कभी-कभी टीवी चैनल बदलते हुए या ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की गहराइयों में खोज करते हुए हमारी नज़र किसी ऐसी फिल्म…
सोचिए एक ऐसी दुनिया जहाँ समय रुक गया हो। जहाँ हवा में चमकते सितारों की बजाय बस धूल भरी यादें…
साल 1951, दुनिया अभी दूसरे महायुद्ध के सदमे से उबर भी नहीं पाई थी कि एक नई दहशत ने जकड़…
सोचिए, एक दिन डॉक्टर आपको बता दे कि आपको गैस्ट्रिक कैंसर है, और बस कुछ ही महीने बाकी हैं। अब…
साल 1952 की बात है, सिनेमाघरों में पहली बार रंगीन रोशनी दिखी । दर्शकों ने देखा मीना कुमारी सफ़ेद घोड़े…
क्या आपने कभी कोई पुरानी हिंदी फिल्म देखते हुए सोचा है, “अरे! यह तो आज भी वैसा ही है!”? फिर…
सियोल की एक ठंडी शाम, 1954, एक खाली पड़े सिनेमा हॉल में एक युवती अपनी आँखों में आँसू छुपाते हुए…