चार्ली चैपलिन की ‘द ग्रेट डिक्टेटर’: जब कॉमेडी बनी तानाशाही के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार

सिनेमा के इतिहास में ऐसी फिल्में बहुत कम बनी हैं जिन्होंने न सिर्फ मनोरंजन किया, बल्कि एक पूरे युग को चुनौती दे दी। ऐसी ही […]

विटोरियो डी सिका की ‘बाइसिकल थीव्स’: इतालवी नवयथार्थवाद (Neorealism) की एक उत्कृष्ट कृति

फिल्में अक्सर हमें एक अलग दुनिया में ले जाती हैं – रोमांच, फंतासी, या शानदार जीवन की दुनिया में। लेकिन कभी-कभी कोई फिल्म हमें हमारे […]

Aquanauts 1980: सोवियत साइंस-फिक्शन फिल्म रिव्यू

कई वर्षों से अधिक समय से, मेरा जुनून— एक ही मिशन के साथ: उन फिल्मों को उजागर और प्रासंगिक बनाना जिन्हें समय भूल गया है। […]

“वूमन ऑफ फायर 1971”: एक ऐसी ज्वाला जिसने कोरियाई सिनेमा की दिशा बदल दी

कोरियन सिनेमा की बात करते ही ज़्यादातर लोगों के दिमाग में “पैरासाइट”, “ओल्डबॉय” या हाल की नेटफ्लिक्स सीरीज़ का नाम आता है, लेकिन 1970 के […]

Yang Naiwu (1930) Chinese Film Review: न्याय, साज़िश और समाज—एक ऐतिहासिक केस की सिनेमा-यात्रा

ज़्यादातर फिल्म रिव्यू इस सवाल से शुरू होते हैं कि “फिल्म कैसी लगी?”—लेकिन Yang Naiwu and Xiao Baicai (1930) के केस में पहला सवाल ही बदल जाता […]

“बसंत बिलाप 1973”: Soumitra Chatterjee–Aparna Sen की Evergreen रोमांटिक कॉमेडी

Basanta Bilap एक 1973 की भारतीय बंगाली भाषा की रोमांटिक कॉमेडी फिल्म है, जिसका निर्देशन Dinen Gupta ने किया था। यह फिल्म Bimal Kar की […]

Raj Nartaki (1940): दरबारी नर्तकी के इश्क़, धर्म और त्याग की अनसुनी दास्तान

क्लासिक भारतीय फिल्मों पर वर्षों से रिसर्च‑बेस्ड रिव्यू लिखते हुए “Raj Nartaki (1940)” हमेशा उन टाइटल्स में गिना गया है, जिन्हें ज़्यादातर दर्शक नाम से […]

Tokyo Story 1953 – खामोश फ्रेम्स में छिपी ज़िंदगी की पूरी कहानी

क्लासिक वर्ल्ड सिनेमा पर कई सालों से लिखते हुए हमेशा यह महसूस हुआ है कि कुछ फिल्में “स्टोरी” से ज़्यादा “अनुभव” होती हैं। जापानी निर्देशक यासुजिरो […]

“Crows and Sparrows Review: कैसे इस फिल्म ने चीन के बदलते दौर को दिखाया?”

“Crows and Sparrows (乌鸦与麻雀)” 1949 की एक चीनी फ़िल्म है, जिसे निर्देशक झेंग जुनली (Zheng Junli) ने बनाया और यह शंघाई की एक पुरानी इमारत […]

यहूदी 1958: एक ऐतिहासिक महाकाव्य जो प्रेम और सहिष्णुता की अमर गाथा है

बॉलीवुड के स्वर्णिम दौर की बात हो और 1958 का ज़िक्र न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। यह वह दौर था जब पर्दे पर […]