1940 का दशक, जहाँ भारत आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, और बॉलीवुड अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था। उस दौर में जब पर्दे पर नूरजहाँ और सुरैया जैसी अभिनेत्रियों का जलवा था, उसी समय एक और नाम भी चमक रहा था—रमोला देवी। यह नाम आज के दर्शकों के लिए अनसुना हो सकता है, मगर उस ज़माने में उनकी अदाकारी और खूबसूरती ने कई दिलों को छुआ था। फिर भी, इतिहास के पन्नों में वह कहीं गुम हो गईं। यह कहानी है उस ‘लॉस्ट ज्वेल’ की, जिसने चुपचाप सिनेमा को समृद्ध किया और चुपचाप विदा ले ली।
प्रारंभिक जीवन: एक सितारे का जन्म
रमोला देवी का जन्म 1917 के दशक में एक मध्यमवर्गीय यहूदी परिवार में हुआ था, जो बगदाद से जुड़े हुए थे।। उनका बचपन कलकत्ता में गुजरा और अपनी शिक्षा पूरी करने के साथ – साथ मंच पर भी अभिनय किया। उस ज़माने में लड़कियों का फिल्मों में आना समाज की नज़रों में ‘बदनामी’ माना जाता था। मगर रमोला के पिता, जो खुद नाटकों के शौक़ीन थे, ने उन्हें प्रोत्साहित किया। कहते हैं, 16 साल की उम्र में ही वह एक नाटक मंडली में शामिल हो गईं, जहाँ उनकी मेहनत ने निर्देशकों का ध्यान खींचा।
वह मोड़: 1939 में बनी फिल्म “दिल ही तो है“ में रमोला ने एक ऐसी बेटी की भूमिका निभाई, जो अपने पिता के द्वारा किये गए हर त्याग का मज़ाक बनाकर उन्हें छोड़ देती है। यहीं से उनके सिनेमाई सफर की शुरुआत हुई।
1940 का दशक: ग्लैमर और संघर्ष का दौर
1940 का दशक बॉलीवुड के लिए बदलाव का समय था। ब्लैक-एंड-व्हाइट फिल्मों से टॉकीज़ की ओर बढ़ते हुए, नए प्रयोग हो रहे थे। इसी दौरान रमोला देवी ने अपनी पहचान बनाई।
यादगार फिल्में:
- “खज़ांची” (1941): इस फ़िल्म में जो एक मर्डर मिस्ट्री थी, उन्होंने मुख्य किरदार “माधुरी” की भूमिका निभाई।यह फ़िल्म भारत में 1940 के दशक की शुरुआत की सबसे बड़ी हिट फ़िल्मों में से एक थी। गीत “सावन का नज़ारा है“ आज भी याद किया जाता है।
- “हम भी इंसान हैं ” (1948): फणी मजूमदार द्वारा निर्देशित फिल्म में रमोला के साथ देव आनंद भी मुख्य भूमिका में है।
अभिनय शैली:
रमोला देवी को “आँखों से बोलने वाली अदाकारा” कहा जाता था। उस दौर में जब अति-नाटकीय अभिनय चलन में था, उनकी सूक्ष्म अभिव्यक्तियाँ ताज़गी लाती थीं। फिल्म “खज़ांची“ में उनके अभिनय ने भारतीय सिनेमा में अपनी एक अलग पहचान बनायीं।
व्यक्तिगत जीवन: चुप्पियों के पीछे छुपे राज़
रमोला देवी का निजी जीवन एक पहेली बना रहा। कहते हैं कि उन्होंने 1945 में एक फिल्म निर्माता से शादी की, जिसके बाद उन्होंने धीरे -धीरे फिल्मों से किनारा कर लिया। मगर यह शादी ज़्यादा दिन नहीं चली। 1951 के बाद उन्होंने फिर कभी फिल्मों में काम नहीं किया। कुछ अफवाहें थीं कि वह मानसिक तनाव से जूझ रही थीं, तो कुछ कहते हैं कि उन्होंने संन्यास ले लिया।
एक दिलचस्प वाकया: 1952 में, एक पत्रकार ने उन्हें मुंबई के एक मंदिर में देखा। जब पूछा गया कि क्यों छोड़ दिया फिल्मों को, तो उन्होंने बस इतना कहा: “जब पर्दा गिर जाए, तो असली जीवन शुरू होता है।”
योगदान और विरासत: क्यों याद नहीं की जातीं रमोला देवी?
रमोला देवी ने 15 साल के करियर में 30 से ज़्यादा फिल्मों में काम किया, मगर आज उनका नाम क्यों गुमनाम है? कारण कई हैं:
- फिल्मों का लुप्त होना: 1940 के दशक की अधिकतर फिल्में नष्ट हो चुकी हैं। “शुक्रिया“ का एक ही प्रिंट मुंबई के फिल्म संग्रहालय में है।
- स्टार सिस्टम का अभाव: उस समय अभिनेताओं को ‘स्टार’ नहीं, ‘कलाकार’ माना जाता था। प्रचार और पब्लिसिटी का चलन नहीं था।
- ऐतिहासिक उपेक्षा: 1940 के दशक को अक्सर बॉलीवुड के ‘प्रयोगात्मक चरण’ के तौर पर देखा जाता है, जिसमें नूरजहाँ और के.एल. सहगल को छोड़कर बाकियों को भुला दिया गया।
आधुनिक संदर्भ: आज की अभिनेत्रियाँ—विद्या बालन से लेकर तापसी पन्नू तक—जो ‘साधारण औरत’ के किरदार निभाती हैं, वह रमोला देवी की विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।
एक अधूरी कहानी का अंत
1950 के दशक में रमोला देवी पूरी तरह गायब हो गईं। कुछ कहते हैं कि वह दिल्ली में एक अनाथाश्रम चलाती थीं, तो कुछ का मानना है कि उन्होंने आत्महत्या कर ली। मगर सच क्या है, यह आज भी रहस्य बना हुआ है।
सिनेमा के इतिहासकार डॉ. रमेश चंद्र कहते हैं: “रमोला देवी उस दौर की विडंबना थीं—जब प्रतिभा को सिर्फ़ पुरुष निर्देशकों और निर्माताओं के सहारे जीना पड़ता था।”
निष्कर्ष: क्यों ज़रूरी है उन्हें याद करना?
रमोला देवी की कहानी सिर्फ़ एक अभिनेत्री की नहीं, बल्कि उस दौर की औरतों की है जिन्होंने पितृसत्तात्मक समाज से लड़कर अपनी पहचान बनाई। आज जब हम ‘फीमेल लीड’ की बात करते हैं, तो उनके संघर्षों को नमन करना चाहिए।
अगली बार जब आप बॉलीवुड की ‘गोल्डन एरा’ की बात करें, तो नूरजहाँ और मधुबाला के साथ रमोला देवी का नाम भी लें। क्योंकि इतिहास उन्हें ही याद रखता है, जिन्हें याद किया जाता है।
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