कभी-कभी जब रात के सन्नाटे में रेडियो पर अचानक “लग जा गले” की धुन बजती है या टीवी पर “शोले” का कोई सीन आ जाता है, तो लगता है जैसे वक्त थम गया हो। पुरानी हिंदी फिल्मों की एक अलग ही कशिश थी। न हाई-टेक स्पेशल इफेक्ट्स, न करोड़ों का प्रमोशन — बस एक ठोस कहानी, दिल को छू लेने वाला संगीत और किरदार जो अपने से लगते थे। सिनेमा हॉल से निकलने के बाद भी वे फिल्में हमारे साथ घर आती थीं, और दशकों बाद भी हम उन्हें उसी चाव से देखते हैं। आज सवाल यह उठता है कि इतने संसाधनों, टेक्नोलॉजी और पैसे के बावजूद बॉलीवुड क्यों ऐसी फिल्में नहीं बना पा रहा जो “क्लासिक” बन सकें? क्या हम हमेशा के लिए गोल्डन एरा को मिस करते रह जाएंगे, या इसके पीछे कुछ ठोस वजहें हैं?
यह लेख न तो बॉलीवुड को कोसने के लिए है और न ही अतीत के मोह में डूबने के लिए। बल्कि यह एक ईमानदार कोशिश है उन पांच असली वजहों को समझने की, जिनकी वजह से आज के दौर की फिल्में देखते वक्त मन में एक कसक रह जाती है — काश, यह भी वैसे ही होती जैसे पहले हुआ करती थीं।
किसी फिल्म को ‘क्लासिक’ क्या बनाता है?
सिर्फ पुरानी हो जाने से कोई फिल्म क्लासिक नहीं बन जाती। क्लासिक वह फिल्म होती है जो अपने समय के समाज, भावनाओं और संस्कृति को इस कदर समेट ले कि आने वाली हर पीढ़ी उसमें खुद को ढूंढ सके। ऐसी फिल्मों की कहानी बिना झोल के बहती है, उनके गाने अकेले सुनने पर भी पूरी फिल्म याद दिला देते हैं, और उनके संवाद ज़ुबान पर ऐसे चढ़ते हैं जैसे कोई अपनी बात कह रहा हो। कुल मिलाकर, एक क्लासिक फिल्म में सांस्कृतिक गहराई, भावनात्मक सच्चाई, बार-बार देखने की चाह और लंबे समय तक प्रासंगिकता होती है। “मुगल-ए-आज़म”, “गाइड”, “दीवार”, “मदर इंडिया”, “शोले”, “अर्थ”, “जाने भी दो यारों” — सोचिए, ये सारी फिल्में बिना किसी थोपे हुए मैसेज के, बिना सोशल मीडिया के शोर के आज भी ज़िंदा हैं। तो आखिर आज ऐसी फिल्में क्यों नहीं बन पा रही हैं?

1. कहानी की आत्मा को कमाई की भूख ने निगल लिया
पुराने दौर में फिल्म बनाने की प्रक्रिया का केंद्र कोई न कोई कहानी होती थी। निर्देशक और लेखक महीनों एक स्क्रिप्ट पर माथापच्ची करते थे। पैसे की चिंता तो थी, लेकिन सबसे पहला सवाल यह नहीं था कि “ओपनिंग डे कितने करोड़ की होगी।” आज स्थिति यह है कि स्क्रिप्ट लिखते वक्त भी दिमाग में बॉक्स ऑफिस कलेक्शन, वीकेंड ट्रेंड और सैटेलाइट राइट्स घूम रहे होते हैं। फिल्म महज़ एक ‘प्रोडक्ट’ बनकर रह गई है जिसका मकसद ज़्यादा से ज़्यादा कमाई करना है।
जब मकसद ही पैसा हो, तो कहानी अपनी ईमानदारी खो देती है। भावनाओं को निचोड़ने की बजाय मेकर्स सोचते हैं कि कौन-सा सीन “वायरल” होगा, किस डायलॉग पर रील्स बनेंगी, और किस क्लाइमेक्स के बाद लोग सीटी बजाएंगे। स्क्रिप्ट में गहराई नहीं, चमक-दमक भरी जाती है। नतीजा? फिल्म देखते वक्त तो मज़ा आ जाता है, लेकिन थिएटर से बाहर निकलते ही सब भूल जाते हैं। जबकि “आनंद” या “प्यासा” जैसी फिल्में इसलिए क्लासिक हैं क्योंकि उनके पीछे कहानीकार का एक शुद्ध इरादा था — जिंदगी को समझने और समझाने की कोशिश।
कोई निर्माता आज यूँ कहे कि “हमें एक ऐसी फिल्म बनानी है जो बीस साल बाद भी देखी जाए,” तो स्टूडियो वाले तुरंत पूछेंगे, “इसका ROI क्या है?” बस यहीं से क्लासिक सिनेमा का ताबूत बंद होने लगता है।
2. संगीत और बोलों ने खो दी अपनी आत्मा
बॉलीवुड और उसके संगीत का रिश्ता गंगा-जमुनी संस्कृति जितना पुराना है। एक ज़माना था जब फिल्म का गाना पूरी कहानी को आगे बढ़ाता था। “तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं” या “कभी कभी मेरे दिल में” जैसे गीत सुनते ही पूरी फिल्म की आत्मा सामने आ जाती थी। ये गाने सिर्फ मनोरंजन नहीं थे — ये भावनाओं के सफर थे। शायरों और संगीतकारों की पेन ड्राइव में स्टॉक म्यूजिक नहीं, दिल की धड़कने होती थीं।
आज का हाल देखिए। ज़्यादातर गाने क्लब में बजने लायक बनाए जाते हैं, या फिर किसी पुरानी धुन को रीमिक्स करके पेश कर दिया जाता है। शब्दों की गहराई गायब है। जहाँ गुलज़ार साहब लिखते थे “मैंने दिल से कहा ढूंढ लाना ख़ुशी, नासमझ लाया ग़म तो ये ग़म ही सही,” वहाँ आज के गीतकार लिखते हैं “बेबी, तेरा बॉडी सो हॉट।” इस अंतर को क्या नाम दें? बदलता ज़माना कहें या गिरता स्तर?
सच तो यह है कि आज की फिल्मों में संगीत अक्सर मार्केटिंग टूल बनकर रह गया है। एक पेपी गाना लॉन्च होता है, इंस्टाग्राम पर ट्रेंड करता है, और हफ्तेभर बाद लोग भूल जाते हैं। जबकि “गाइड” के गाने आज भी सुने जाते हैं, बिना किसी रील्स के। जब तक कोई फिल्म ऐसा संगीत नहीं देती जो पीढ़ियों तक गूँजे, तब तक क्लासिक बनने का सपना अधूरा ही रहेगा।

3. रीमेक, सीक्वल और फॉर्मूले में उलझा बॉलीवुड
पिछले कुछ वर्षों पर नज़र डालें तो पाएंगे कि बॉलीवुड ने असल और साहसिक कहानियाँ कम, और पुरानी सफलताओं की रीमेक-रीसाइकलिंग ज़्यादा की है। कोई पुरानी हिट उठाओ, उसमें थोड़ा आधुनिक ट्विस्ट डालो, एक बड़ा स्टार लो और रिलीज़ कर दो। “अग्निपथ”, “ज़ंजीर”, “हिम्मतवाला”, “दोनों” — ये सब रीमेक बनीं, कुछ ने पैसे कमाए पर क्या कोई मूल के आस-पास भी पहुँच पाई? शायद ही कभी।
इसके अलावा फिल्मों की सीरीज़ बनाने का ट्रेंड भी बढ़ गया है। “हाउसफुल 4”, “गोलमाल 5”, “भूल भुलैया 2” — नाम ही काफी हैं। पहली फिल्म की सफलता के बाद निर्माता उसी ब्रांड का दूध दुहने में लग जाते हैं। असली रचनात्मकता कहाँ है? क्लासिक वही बनती है जो किसी नए विचार से जन्म लेती है, न कि किसी पुरानी चीज़ की फोटोकॉपी से।
फॉर्मूला फिल्में पुराने ज़माने में भी बनीं, लेकिन तब भी बीच-बीच में “मंथन”, “अंकुर”, “अर्थ” जैसी धारदार फिल्में आती रहती थीं। आज व्यावसायिकता के बोझ तले वह प्रयोगधर्मिता दब गई है। सीक्वल बनाने में जोखिम कम होता है और मुनाफा ज़्यादा, लेकिन सिनेमा का इतिहास बताता है कि सच्ची क्लासिक हमेशा जोखिम उठाकर ही बनी है।
4. दर्शक बदल गया, और उसकी नब्ज़ बदल गई
इस पूरी बहस में दर्शकों की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। आज का दर्शक पहले से कहीं ज़्यादा व्यस्त और बिखरा हुआ है। उसके पास ढेर सारे विकल्प हैं — नेटफ्लिक्स, अमेज़न प्राइम, यूट्यूब, इंस्टाग्राम रील्स, गेमिंग। उसका ध्यान बहुत छोटा हो गया है। यदि फिल्म के पहले पंद्रह मिनट में कुछ धमाकेदार न हुआ, तो वह उब जाती है। ऐसे में फिल्मकार गहरे चरित्र-चित्रण की बजाय तेज़ रफ़्तार एडिटिंग और लगातार घटनाओं की बौछार करते हैं। इमोशन को साँस लेने का वक्त ही नहीं मिलता।
इसके अलावा सोशल मीडिया और रील कल्चर ने फिल्म को एक अजीब मोड़ पर ला खड़ा किया है। अक्सर फिल्म के एक-दो सीन या गाने को छोटे वीडियो में काटकर फैलाया जाता है। अच्छी बात यह है कि फिल्म का प्रचार हो जाता है, लेकिन बुरी बात यह है कि लोग पूरी फिल्म देखने की ज़रूरत नहीं समझते। वे सोचते हैं, “रील पर सब देख लिया, अब फिल्म कौन देखे?” ऐसी स्थिति में कोई भी निर्देशक चाहकर भी वो रवानी नहीं ला सकता जो “सारांश” या “मासूम” में हुआ करती थी, जहाँ हर पल आपको अंदर खींचता था।
पुराने ज़माने में फिल्म देखना एक अनुभव था — पूरा परिवार जाता था, इंटरवल में चर्चा होती थी। आज यह इंडिविजुअल एक्टिविटी बन गया है, और ओटीटी के कारण धैर्य और भी घट गया है। जब दर्शक ही धीमी गति वाली, सुरीली कहानियों के लिए तैयार नहीं है, तो मेकर्स भी उसी के अनुसार फिल्में बनाने लगते हैं — यह एक दुष्चक्र है।
5. कॉरपोरेट फिल्ममेकिंग बनाम निर्देशक की सोच
एक ज़माना था जब फिल्में किसी व्यक्ति विशेष की दृष्टि (विज़न) से बनती थीं। राज कपूर, गुरु दत्त, बिमल रॉय, ऋषिकेश मुखर्जी — इनका अपना एक संसार था। वे स्टूडियो में बैठे बहीखातों से नहीं, बल्कि दिल से फैसले करते थे। अब स्थिति बिल्कुल उलट है। अधिकतर बड़ी फिल्में किसी कॉरपोरेट हाउस, प्रोडक्शन कंपनी या स्टूडियो के कड़े नियंत्रण में बनती हैं। इन कंपनियों के मार्केटिंग विभाग और डेटा एनालिस्ट तय करते हैं कि किस तरह की कहानी चलेगी, किस एक्टर को लेना है, और फिल्म का अंत क्या होना चाहिए।
निर्देशक हाथ बाँधे खड़े रहते हैं। स्क्रिप्ट में बार-बार बदलाव होते हैं ताकि वह “सेफ” और “मार्केट-फ्रेंडली” बनी रहे। नतीजा? फिल्म का अपना कोई व्यक्तित्व नहीं होता। वह एक सिली-सिलाई प्रोडक्ट बनकर रह जाती है। कल्पना कीजिए, यदि गुरु दत्त के साथ भी ऐसा होता, तो क्या “प्यासा” बन पाती? शायद कोई कहता है कि साहब, फिल्म बहुत डिप्रेसिंग है, इसमें एक आइटम सॉन्ग डाल दीजिए।
इसी तरह पैसों का दबाव रचनात्मकता को कुचल देता है। स्टार की फीस में ही आधा बजट चला जाए, फिर कंटेंट पर खर्च करने को क्या बचेगा? पुराने दौर में बड़े से बड़े कलाकार मेहनताना तो लेते थे, पर फिल्म की कहानी सर्वोपरि रहती थी। आज बड़े स्टार्स के साथ फिल्म करने का मतलब है कि उनकी इमेज को हर हाल में चमकाना है, चाहे स्क्रिप्ट की बलि क्यों न देनी पड़े। यह “कॉरपोरेट सिनेमा” फिल्म को एक जीवित कलाकृति नहीं, एक पैक्ड प्रोडक्ट बना देता है।
क्या उम्मीद बिल्कुल खत्म हो गई? (एक निष्पक्ष नज़र)
यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि बॉलीवुड से क्लासिक बनने की क्षमता बिल्कुल ही चली गई है। बीच-बीच में कुछ फिल्में ऐसी आती हैं जो अपनी अलग राह बनाती हैं। “अंधाधुन”, “तुम्बाड”, “बधाई हो”, “गैंग्स ऑफ वासेपुर”, “राज़ी”, “हिंदी मीडियम” — इन फिल्मों ने दिखाया कि अगर इरादा नेक हो और कहानी कहने की ज़िद हो, तो दर्शक आज भी सराहते हैं। ये फिल्में अपने समय से आगे शायद क्लासिक का दर्जा पा सकती हैं, बशर्ते लोग इन्हें बार-बार देखते रहें।
हालाँकि, ऐसी फिल्मों की संख्या उँगलियों पर गिनी जा सकती है। मुख्यधारा का बड़ा बॉलीवुड अभी भी उसी फॉर्मूले पर चल रहा है — स्टार, स्केल और शोर। लेकिन इस निराशा के बीच भी एक सकारात्मक संकेत है: नए लेखक और निर्देशक, खासकर ओटीटी की वजह से, ज्यादा साहसी कहानियाँ कह रहे हैं। कौन जाने, आने वाले दस वर्षों में कोई नया “शोले” या कोई नई “गाइड” हमें हैरान कर दे।
सांस्कृतिक और बाज़ारू संदर्भ
बदलाव का एक बड़ा कारण भूमंडलीकरण और पश्चिमीकरण भी है। आज बॉलीवुड सिर्फ भारत के लिए नहीं, पूरी दुनिया के लिए फिल्म बनाने की कोशिश करता है। नतीजा यह होता है कि फिल्मों से अपनापन गायब हो जाता है; वे न इधर की रहती हैं न उधर की। पुरानी फिल्में अपनी जड़ों से जुड़ी होती थीं — गाँव, मोहल्ला, रिश्ते, भारतीयता की खुशबू। आज की फिल्में अक्सर ऐसे किरदारों पर बनती हैं जिनसे आम भारतीय जुड़ाव महसूस नहीं कर पाता।
साथ ही सोशल मीडिया और पीआर कल्चर ने आलोचना का माहौल खत्म कर दिया है। कोई फिल्म चाहे कितनी भी औसत क्यों न हो, ट्रेलर लॉन्च पर तालियाँ, ऑनलाइन बॉट्स की तारीफों की बौछार — इससे मेकर्स को लगता है कि उन्होंने कोई कालजयी कृति बना दी। यह आत्ममुग्धता उन्हें खुद को सुधारने का मौका ही नहीं देती। जबकि पुराने दौर में आलोचक कठोर होते थे, और फिल्मकार उनसे सीखता था।
संगीत उद्योग भी पूरी तरह बिखर चुका है। पहले एक फिल्म का पूरा एल्बम मीलों का सफर तय करता था। आज एल्बम की जगह प्लेलिस्ट ने ले ली है। किसी को पूरी एल्बम सुनने का धैर्य नहीं; चंद सेकंड सुनकर अगला गाना। ऐसे माहौल में कोई संगीतकार अपना पूरा दिल क्यों झोंकेगा?
समापन: क्लासिक का इंतज़ार अभी बाकी है
तो क्या बॉलीवुड वाकई क्लासिक बनाने में असमर्थ हो गया है? शायद नहीं — लेकिन वह इसके लिए खुद को तैयार नहीं कर रहा है। क्लासिक बनने के लिए जिन चीज़ों की ज़रूरत होती है — वक्त, संयम, गहरी सोच, भावनात्मक ईमानदारी और व्यावसायिक दबाव से थोड़ी आज़ादी — वे सब आज के सिस्टम में धीरे-धीरे खोती जा रही हैं।
हमें यह समझना होगा कि सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि समाज का आईना है। अगर यह आईना सिर्फ चमक दिखाएगा और सच नहीं, तो लोग उसे गौर से नहीं देखेंगे। फिल्म तब क्लासिक बनती है जब वह हमें हमसे मिलवाती है, जब वह हमारी ख़ामोशियों को ज़बान देती है।
उम्मीद अभी बाकी है। बशर्ते हम दर्शक भी अपनी पसंद-नापसंद में थोड़ा धैर्य और गहराई लाएँ। एक अच्छी फिल्म को थिएटर में जाकर सपोर्ट करें, ऊँची आवाज़ वाले मार्केटिंग के बहकावे में न आएँ, और रील्स से आगे बढ़कर पूरी कहानी सुनने का माद्दा रखें। तभी निर्देशकों को हौसला मिलेगा कि वे कमाई का नहीं, कहानी का सौदा करें।
बॉलीवुड के पास हुनर है, इतिहास है, और एक भावुक दर्शक वर्ग भी है। बस ज़रूरत है उस आग को फिर से जलाने की जो कभी “प्यासा” और “दीवार” जैसी फिल्मों की जान हुआ करती थी। क्लासिक बनाने की क्षमता मरी नहीं है — वह सो रही है, और उसे जगाने की ज़िम्मेदारी हम सबकी है।
