1950 के दशक का सबसे अमीर एक्टर — जो बाद में Extra का रोल करने पर मजबूर हो गया: भरत भूषण की अनसुनी दास्तान

Bharat Bhushan

एक सुबह अमिताभ बच्चन अपनी गाड़ी में बैठे मुंबई के सांताक्रूज इलाके से गुज़र रहे थे। तभी उनकी नज़र एक बस स्टॉप पर पड़ी। वहाँ आम लोगों की भीड़ में एक बुजुर्ग आदमी चुपचाप खड़ा था — कोई पहचान नहीं, कोई हलचल नहीं, कोई देखने वाला नहीं।

अमिताभ ने उस चेहरे को पहचाना। वो कोई और नहीं, भरत भूषण थे।

वही भरत भूषण जो 1950 के दशक में हिंदी सिनेमा के सबसे चमकते सितारे थे। जिनके बंगले के बाहर फैन्स की लाइनें लगती थीं। जिनकी एक झलक पाने के लिए लोग घंटों इंतजार करते थे। वो शख्स आज एक साधारण बस का इंतजार कर रहा था — बिल्कुल अकेला, बिल्कुल गुमनाम।

अमिताभ ने बाद में अपने ब्लॉग में लिखा — “मैं गाड़ी रोककर उन्हें लिफ्ट देना चाहता था, लेकिन हिम्मत नहीं हुई। मुझे डर था कि कहीं उन्हें शर्मिंदगी न हो। और मैं आगे बढ़ गया। लेकिन वो तस्वीर मेरे ज़ेहन में हमेशा के लिए बस गई।”

यह सिर्फ एक घटना नहीं है। यह पूरी ज़िंदगी की कहानी है — एक ऐसे इंसान की, जिसने सब कुछ पाया और सब कुछ खो दिया।

Bollywood superstar

मेरठ से मुंबई तक — एक ख्वाब की शुरुआत

14 जून 1920 को उत्तर प्रदेश के मेरठ में जन्मे भरतभूषण गुप्ता — जिन्हें दुनिया भरत भूषण के नाम से जानती है — एक ऐसे घर में पले-बढ़े जहाँ सिनेमा की कोई जगह नहीं थी। पिता रायबहादुर मोतीलाल गुप्ता मेरठ के सरकारी वकील और इलाहाबाद हाई कोर्ट में जज थे। घर में पढ़ाई-लिखाई की परंपरा थी। बेटे से उम्मीद थी कि वो भी वकील बनेगा।

लेकिन दो साल की उम्र में माँ चली गईं। दोनों भाइयों को अलीगढ़ में नाना के यहाँ छोड़ दिया गया। अलीगढ़ में रहते हुए भरत का मन किताबों से ज़्यादा कहानियों में रमने लगा — थिएटर में, संगीत में, किरदारों में।

पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पहले कलकत्ता और फिर बंबई का रुख किया। घर वाले खुश नहीं थे। पिता की मर्जी के खिलाफ जाकर एक्टिंग चुनना उस ज़माने में बड़ी हिम्मत का काम था। लेकिन भरत ने चुना।

1941 में किदार शर्मा की फिल्म “चित्रलेखा” में एक छोटे से किरदार के साथ उनका सफर शुरू हुआ। यह शुरुआत थी एक लंबे संघर्ष की — जो अगले दस साल तक चलती रही।

वो सुबह जिसने सब बदल दिया — बैजू बावरा (1952)

1952 आया और उसके साथ आई “बैजू बावरा”

विजय भट्ट की इस फिल्म में भरत भूषण ने बैजू का किरदार निभाया — एक ऐसे संगीतकार का जो अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए तानसेन को संगीत में चुनौती देता है। फिल्म में मीना कुमारी थीं, नौशाद का संगीत था, और मोहम्मद रफी की वो आवाज़ थी जिसने “मन तरपत हरि दर्शन को आज” गाकर लाखों दिलों को झकझोर दिया।

फिल्म रिलीज हुई और क्या हुआ — पूरा हिंदुस्तान दीवाना हो गया।

उस दौर में राज कपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार जैसे दिग्गज थे। इनके बीच अपनी पहचान बनाना आसान नहीं था। लेकिन भरत भूषण ने कर दिखाया। उनकी अपनी एक अलग ज़मीन थी — वो ज़मीन जहाँ कवि रहते थे, संगीतकार रहते थे, दर्द से भरे किरदार रहते थे। उस ज़मीन पर उनका एकाधिकार था।

“बैजू बावरा” के बाद एक के बाद एक हिट — “मिर्जा ग़ालिब” (1954), जिसमें उन्होंने उर्दू के महान शायर को जिया। “श्री चैतन्य महाप्रभु” (1954) जिसके लिए उन्हें 1955 में Filmfare Best Actor Award मिला। “बसंत बहार” (1956), “फागुन” (1958), “बरसात की रात” (1960) — एक के बाद एक कामयाबियाँ।

उस दौर में भरत भूषण हिंदी सिनेमा के सबसे अमीर एक्टर्स में से एक थे। मुंबई के कार्टर रोड पर समुद्र के किनारे एक शानदार बंगला था उनका। कई गाड़ियाँ थीं। घर में नौकर-चाकर थे। किताबों का विशाल संग्रह था — क्योंकि एक्टिंग से अलग साहित्य उनकी जान था। ज़िंदगी इससे बेहतर नहीं हो सकती थी।

वो बंगला — जो तीन सुपरस्टार्स को ले डूबा

भरत भूषण के उस बंगले की कहानी अपने आप में एक अजीब दास्तान है।

मुंबई के बांद्रा इलाके में कार्टर रोड पर समुद्र के किनारे बना वो बंगला जब भरत भूषण ने खरीदा था, तब वो बॉलीवुड के किंग थे। लेकिन जब उनकी फिल्में डूबने लगीं और क़र्ज़ बढ़ने लगा, तो उन्हें वो बंगला बेचना पड़ा। बंगले की हालत इतनी खराब हो गई थी और भरत भूषण के पतन की चर्चा इतनी थी कि कोई उसे खरीदना नहीं चाहता था। लोग कहने लगे — बंगला बदकिस्मत है।

फिर आए राजेंद्र कुमार। उन्होंने वो बंगला मात्र 60,000 रुपये में खरीदा, उसका नाम रखा “डिम्पल” (अपनी बेटी के नाम पर) और पूजा करवाई। कुछ साल सब ठीक रहा, लेकिन 1968-69 तक उनकी फिल्में भी पिटने लगीं। उन्हें भी वो बंगला बेचना पड़ा।

1950s Actor

तब आए राजेश खन्ना। 3.5 लाख रुपये में खरीदा, नाम रखा “आशीर्वाद” — जो आगे चलकर मुंबई की सबसे मशहूर इमारतों में से एक बन गया। लेकिन 1974 के बाद राजेश खन्ना का सितारा भी डूबने लगा।

तीन सुपरस्टार। एक बंगला। तीनों की एक जैसी तकदीर।

भरत भूषण उस बंगले के पहले मालिक थे — और उनका पतन भी सबसे पहले हुआ।

वो भाई जिसने सपना दिखाया, वो भाई जिसने डुबोया

“बैजू बावरा” की कामयाबी के बाद भरत भूषण के बड़े भाई रमेशचंद्र गुप्ता ने उन्हें प्रोडक्शन में उतरने के लिए राजी किया।

भाई की बात थी। भरोसे की बात थी। और बात भी तो सही लगती थी — आप देश के सबसे बड़े स्टार हैं, तो प्रोड्यूसर भी बनो, और भी ज़्यादा कमाओ।

“दूज का चाँद” बनाई। जबरदस्त नुकसान हुआ। लेकिन रुके नहीं। एक के बाद एक फिल्में बनाते गए। नुकसान पर नुकसान होता गया। जो कमाया था एक्टिंग से, वो सब प्रोडक्शन की भट्टी में झोंक दिया।

साथ में जुआ भी था। Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक, भरत भूषण ने जुए में भी काफी संपत्ति गँवाई। एक तरफ फिल्में पिट रही थीं, दूसरी तरफ जुए की लत और ऊपर से गलत निवेश — तीनों ने मिलकर उन्हें तबाह कर दिया।

1960 का दशक आते-आते वो क़र्ज़ में डूब चुके थे।

जब सुपरस्टार को Extra बनना पड़ा

यह वो हिस्सा है जो सबसे ज़्यादा तकलीफ देता है।

जो आदमी कभी स्क्रीन पर आता था तो दर्शक सीटियाँ बजाते थे — उसे अब छोटे-छोटे किरदार मिलने लगे। 49 साल की उम्र में वो “प्यार का मौसम” (1969) में शशि कपूर के पिता का किरदार निभा रहे थे। फिर और नीचे आए — “हमशक्ल” और “प्यार का देवता” जैसी फिल्मों में बिना नाम के Extra का काम किया।

ज़रा सोचिए — वही आदमी जिसके साथ मीना कुमारी, मधुबाला, नरगिस, गीता बाली और वैजयंतीमाला काम कर चुकी थीं। वही आदमी जिसके लिए नौशाद ने संगीत दिया था, रफी और मुकेश ने गाया था — वो अब किसी फिल्म में एक चेहरे की तरह पर्दे के पीछे खड़ा था।

शानदार बंगला बिक चुका था। गाड़ियाँ जा चुकी थीं। मुंबई के चॉल में ज़िंदगी गुज़र रही थी।

पहली पत्नी की मौत, दूसरी शादी और अकेलापन

ज़िंदगी में सिर्फ पैसा ही नहीं गया — दर्द और भी था।

पहली पत्नी शारदा — जो मेरठ के एक बड़े ज़मींदार की बेटी थीं — का निधन हो गया। दो बेटियाँ थीं — अनुराधा और अपराजिता। अकेलेपन में 1967 में उन्होंने “बरसात की रात” की अपनी को-स्टार रत्ना से दूसरी शादी की। रत्ना उनके साथ रहीं, लेकिन ज़िंदगी की मुश्किलें कम नहीं हुईं।

जिस इंडस्ट्री ने उन्हें सितारा बनाया था, उसने उनके बुरे वक्त में पीठ फेर ली। कोई नहीं आया। कोई नहीं पूछा।

गुमनाम एक्टर

27 जनवरी 1992 — एक खामोश विदाई

27 जनवरी 1992 को 71 साल की उम्र में भरत भूषण इस दुनिया से चले गए।

कोई बड़ी खबर नहीं बनी। कोई श्रद्धांजलि सभा नहीं हुई। जिस इंसान ने “बैजू बावरा” में तानसेन को चुनौती दी थी — उसकी विदाई उतनी ही खामोश थी जितना उसके आखिरी साल।

उनकी बेटी अपराजिता ने बाद में एक YouTube channel शुरू किया — “Bharat Tales” — जहाँ उन्होंने पिता की यादें और अनसुनी बातें दुनिया के साथ साझा कीं। शायद यही एकमात्र तरीका था यह बताने का कि उनके पिता सिर्फ एक भूला-बिसरा नाम नहीं थे — वो एक इंसान थे, एक कलाकार थे।

भरत भूषण को कैसे याद करें?

भरत भूषण की कहानी सुनकर दिल में एक सवाल उठता है — क्या बॉलीवुड ने उनके साथ न्याय किया?

जवाब शायद “नहीं” है।

लेकिन उनकी विरासत अभी भी ज़िंदा है। “बैजू बावरा” का “मन तरपत” आज भी बजता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। “बरसात की रात” का “ज़िंदगी भर नहीं भूलेगी” आज भी कहीं न कहीं गूँजता है। मोहम्मद रफी की आवाज़ में, मुकेश की आवाज़ में, तलत महमूद की आवाज़ में — भरत भूषण का चेहरा हमेशा के लिए दर्ज है।

शोहरत चली जाती है। बंगले बिक जाते हैं। गाड़ियाँ जाती हैं। लेकिन जो कला एक बार दिल में उतर जाए, वो कभी नहीं जाती।

अमिताभ बच्चन ने उस दिन गाड़ी रोकी नहीं। वो आगे बढ़ गए। लेकिन वो तस्वीर — एक बस स्टॉप पर खड़े एक गुमनाम सुपरस्टार की — उनके साथ हमेशा रही। और आज हमारे साथ भी रहेगी।

क्योंकि भरत भूषण की कहानी सिर्फ उनकी कहानी नहीं है। यह उस हर इंसान की कहानी है जो यह समझता है कि शोहरत स्थायी होती है। जो यह मान लेता है कि आज जो है, वो हमेशा रहेगा।

नहीं रहता। कभी नहीं रहता।


भरत भूषण — एक नज़र में

विवरण जानकारी
असली नाम भरतभूषण गुप्ता
जन्म 14 जून 1920, मेरठ, उत्तर प्रदेश
निधन 27 जनवरी 1992, बंबई
पहली फिल्म चित्रलेखा (1941)
सबसे बड़ी फिल्म बैजू बावरा (1952)
Filmfare Award 1955 — श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए
मशहूर फिल्में मिर्जा ग़ालिब, बरसात की रात, बसंत बहार, फागुन
प्रमुख बंगला कार्टर रोड, बांद्रा (बाद में राजेश खन्ना का “आशीर्वाद”)
पत्नियाँ शारदा (पहली), रत्ना भूषण (दूसरी, 1967)
बेटियाँ अनुराधा भूषण, अपराजिता भूषण

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