दादासाहेब फाल्के के बाद क्या हुआ — भारतीय साइलेंट सिनेमा के वो दस साल जो कोई नहीं जानता

left in dusty golden sunlight, the filmmaker in dhoti-kurta and wire-rimmed glasses gripping the brass crank with conviction before the mythological canvas, then the vertical amber crack splitting reality, and right side sinking into forgotten grey, cobwebbed chair, dusty projector and scattered reels on the floor.

1913 से 1931 के बीच एक पूरी दुनिया बनी थी — जिसे इतिहास ने सिर्फ एक नाम देकर भुला दिया

जब भी कोई भारतीय सिनेमा के इतिहास की बात करता है, तो बातचीत एक ही जगह रुक जाती है — दादासाहेब फाल्के। 1913, ‘राजा हरिश्चंद्र’, पहली भारतीय फिल्म। बस। जैसे इसके बाद कुछ हुआ ही नहीं। जैसे फाल्के ने फिल्म बनाई, पर्दा गिरा, और सीधे 1931 में ‘आलम आरा’ आ गई।

लेकिन उन दोनों के बीच के अठारह साल? वो दस-पंद्रह साल जब भारत में 1,338 मूक फिल्में बनीं? जब पुणे के गलियारों में एक चित्रकार ने सिनेमा को नई भाषा दी? जब कोलकाता में एक पारसी व्यापारी ने पूरे देश में फिल्म वितरण का जाल बिछाया? जब दक्षिण भारत में एक तमिल फिल्ममेकर ने साबित किया कि सिनेमा सिर्फ बंबई का नहीं है?

ये सब किताबों में नहीं मिलता। क्योंकि इतिहास हमेशा एक नायक चुनता है — और बाकी सबको भुला देता है।

तो आज वो कहानी — जो कोई नहीं बताता।

बाबूराव पेंटर — भारतीय साइलेंट सिनेमा के वो पायनियर जिन्होंने 1925 में 'सावकारी पाश' से भारत की पहली सामाजिक फिल्म बनाई और V. Shantaram जैसी पीढ़ी को तराशा, लेकिन इतिहास ने जिन्हें वो जगह नहीं दी जो मिलनी चाहिए थी

फाल्के अकेले नहीं थे — और यही सबसे बड़ी गलतफहमी है

1913 में जब ‘राजा हरिश्चंद्र’ मुंबई के कोरोनेशन सिनेमा में रिलीज़ हुई, उसी साल पुणे में दो और फिल्ममेकर थे — N.G. चित्रे और R.G. टॉर्नी — जिन्होंने ‘पुंडलिक’ नाम का एक filmed play बनाया था। वो 1912 में बना था। यानी तकनीकी रूप से वो फाल्के से पहले थे। लेकिन उनका नाम? आज शायद एक फीसदी लोग भी नहीं जानते।

इतिहासकार वीरचंद धर्मसे — जिन्होंने भारतीय साइलेंट सिनेमा की सबसे विस्तृत filmography तैयार की है — बताते हैं कि 1930 तक भारत में कुल 1,338 मूक फिल्में बनी थीं। इनमें से सिर्फ 29 आज उपलब्ध हैं। बाकी 1,309 फिल्में — जो बनीं, जो रिलीज़ हुईं, जो लोगों ने देखीं और सराहीं — नाइट्रेट की आग में, बाढ़ में, लापरवाही में, या बस वक्त के साथ खाक हो गईं।

1,309 फिल्में। गायब। हमेशा के लिए।

ये सोचकर एक अजीब सा दर्द होता है। कितने लोगों ने उन फिल्मों में काम किया होगा? कितने घरों के ज़ेवर गिरवी रखे गए होंगे। कितनी रातें जागकर काम हुआ होगा। और आज — कुछ नहीं बचा। एक फ्रेम भी नहीं।

बाबूराव पेंटर — वो आदमी जिसे फाल्के जितना बड़ा होना चाहिए था

अगर मैं आपसे पूछूँ कि भारतीय साइलेंट सिनेमा के सबसे अहम इंसान कौन थे — तो शायद आप फाल्के का नाम लेंगे। लेकिन जो लोग उस दौर के सिनेमा को गहराई से जानते हैं, वो एक और नाम लेते हैं।

बाबूराव कृष्णाराव मेस्त्री — जिन्हें दुनिया बाबूराव पेंटर के नाम से जानती है।

वो एक चित्रकार थे — थिएटर के पर्दों पर पेंटिंग करते थे। लेकिन जब उन्होंने सिनेमा देखा, तो समझ गए कि यह माध्यम कितना बड़ा हो सकता है। 1919 में उन्होंने कोल्हापुर में Maharashtra Film Company की नींव रखी। और फिर एक के बाद एक ऐसी फिल्में बनाईं जिन्होंने भारतीय सिनेमा को एक नई दिशा दी।

उनकी 1925 की फिल्म ‘सावकारी पाश’ — The Indian Shylock — भारत की पहली सामाजिक-यथार्थवादी फिल्म मानी जाती है। उसमें किसानों का एक ज़ालिम साहूकार के हाथों शोषण दिखाया गया था। कोई पौराणिक कहानी नहीं। कोई देवता नहीं। सिर्फ असली ज़िंदगी — जितनी कठोर थी उतनी ही ईमानदारी से।

और उस फिल्म में किसान की भूमिका निभाने वाला एक जोशीला नौजवान था — जिसका नाम था शांताराम राजाराम वानकुद्रे। जिसे आगे चलकर दुनिया V. Shantaram के नाम से जानी जाएगी। हाँ — वही V. Shantaram जिन्हें भारतीय सिनेमा का एक और स्तंभ कहा जाता है। उनकी शुरुआत बाबूराव पेंटर के साथ हुई थी।

बाबूराव पेंटर ने न सिर्फ फिल्में बनाईं — उन्होंने एक पूरी पीढ़ी तैयार की। V. Shantaram, K. Dhaiber, V.G. Damle, S. Fattelal — ये सब बाबूराव के स्कूल से निकले थे। पर आज उनका नाम? ज़्यादातर लोगों ने सुना भी नहीं।

भारतीय सिनेमा की पहली महिला अभिनेत्रियाँ दुर्गाबाई कामत और उनकी 13 वर्षीय बेटी कमलाबाई — जिन्होंने 1913 में 'मोहिनी भस्मासुर' में काम करके सामाजिक दबाव को नकारा और भारतीय सिनेमा इतिहास रचा

J.F. मदन — वो व्यापारी जिसने सिनेमा को धंधा बनाया

अगर बाबूराव पेंटर ने सिनेमा को कला दी, तो J.F. मदन ने उसे व्यापार दिया।

जमशेदजी फ्रामजी मदन — एक पारसी थिएटर मालिक — ने कोलकाता से अपना काम शुरू किया था। उन्होंने Elphinstone Bioscope Company बनाई और पूरे भारत में फिल्म वितरण का एक ऐसा नेटवर्क खड़ा किया जो उस ज़माने में बेमिसाल था। उनके पास सिनेमाघर थे — बंबई में, कोलकाता में, मद्रास में, रंगून में तक।

1920 में जब भारत में Censor Board बना — बंबई, कोलकाता, मद्रास और रंगून में — तो उसका सबसे ज़्यादा असर मदन की कंपनी पर पड़ा। क्योंकि वो सबसे ज़्यादा फिल्में वितरित कर रहे थे। उन्होंने 1919 में ‘बिलवामंगल’ बनाई — कोलकाता की पहली प्रमुख भारतीय फिल्म।

मदन का असली योगदान ये था कि उन्होंने साइलेंट सिनेमा को सिर्फ बंबई तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने दिखाया कि फिल्म एक राष्ट्रीय माध्यम हो सकता है — अलग-अलग भाषाओं में, अलग-अलग शहरों में। लेकिन इतिहास ने उन्हें भी वो जगह नहीं दी जो मिलनी चाहिए थी।

दक्षिण भारत का वो सिनेमा जिसे उत्तर ने कभी नहीं पहचाना

भारतीय साइलेंट सिनेमा का एक और अध्याय है जो लगभग पूरी तरह अनदेखा रह गया है — दक्षिण भारत का सिनेमा।

धर्म से की शोध से एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया — तमिलनाडु के R. Nataraja Mudaliar ने 1915 में ‘गोपाल कृष्ण’ बनाई थी। यानी फाल्के के सिर्फ दो साल बाद। और ‘कीचक वध’ 1916 में बनी — न कि 1917 में जैसा पहले माना जाता था।

मतलब — दक्षिण भारत में सिनेमा उतना ही पुराना था जितना उत्तर में। लेकिन चूँकि इतिहास हिंदी और मराठी केंद्रित रहा, तो दक्षिण के पायनियर्स की कहानी कभी मुख्यधारा में नहीं आई।

1923 में बनी ‘सिंहगढ़’ — भारत की पहली पूर्ण ऐतिहासिक फिल्म मानी जाती है। इसमें कोल्हापुर के महाराजा ने अपने असली हाथी, घोड़े और सेना फिल्म के लिए दिए थे। सोचिए — एक राजा ने अपनी पूरी शाही फौज किसी फिल्म के लिए दे दी। उस ज़माने में ये कितना असाधारण रहा होगा।

भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्रियाँ — जिन्हें नाम तक नहीं दिया गया

साइलेंट एरा की एक और कहानी है जो दिल को छू लेती है — और गुस्सा भी दिलाती है।

‘राजा हरिश्चंद्र’ में सभी महिला भूमिकाएं पुरुषों ने निभाई थीं — क्योंकि उस ज़माने में सम्माननीय परिवार की औरत का पर्दे पर आना बहुत बुरा माना जाता था। फाल्के ने बताया कि उन्होंने कई महिलाओं से संपर्क किया — किसी ने नहीं माना।

भारतीय साइलेंट सिनेमा की खोई हुई फिल्में — 1,338 में से 1,309 मूक फिल्में आज उपलब्ध नहीं हैं, नाइट्रेट आग और लापरवाही की वजह से हमेशा के लिए नष्ट हो गई एक पूरी सिनेमाई विरासत

लेकिन उसी साल — 1913 में — फाल्के की दूसरी फिल्म ‘मोहिनी भस्मासुर’ में दो महिलाएं आगे आईं। दुर्गाबाई कामत और उनकी 13 साल की बेटी कमलाबाई। दोनों माँ-बेटी। दुर्गाबाई एक अनुभवी रंगमंच कलाकार थीं। उन्होंने सामाजिक दबाव को नकारा और कैमरे के सामने खड़ी हुईं।

कमलाबाई ने उसी फिल्म में पहला ऑन-स्क्रीन नृत्य किया। भारतीय सिनेमा में हीरोइन का पहला डांस नंबर — एक 13 साल की लड़की का। और इतिहास ने उन्हें कितना याद किया? ज़्यादातर लोग आज भी नहीं जानते कि ये दोनों कौन थीं।

ये वो औरतें थीं जिन्होंने समाज की परवाह किए बिना एक नई दुनिया बनाने में हिस्सा लिया। और बदले में मिला क्या? गुमनामी।

वो फिल्म जिसे ब्रिटिश सेंसर ने ‘अमेरिकी अश्लीलता’ कहकर बैन किया

साइलेंट एरा में सब कुछ शांत और सीधा-सादा नहीं था। उस दौर में भी विवाद थे। सेंसरशिप थी। और बैन था।

1926 में एक फिल्म आई — ‘Race Ki Thes’। उसमें Madan Mohan और Surajram थे। Censor Board ने उस फिल्म को ban कर दिया। वजह? आधिकारिक रूप से दर्ज कारण था — “यह फिल्म भारतीय परिवेश में अमेरिकी अश्लीलता की सबसे घटिया किस्म के सारे बुरे तत्वों को ले आती है।”

मतलब — 1926 में भारत में एक फिल्म को इसलिए बैन किया गया क्योंकि वो ‘बहुत ज़्यादा हॉलीवुड’ थी। ये बात उस वक्त की है जब हॉलीवुड की नकल करना आज जैसा आसान नहीं था। उस जमाने के किसी फिल्ममेकर ने इतनी हिम्मत दिखाई कि कुछ अलग और नया करने की कोशिश की — और सिस्टम ने उसे रोक दिया।

वो फिल्म आज उपलब्ध नहीं है। उसका एक भी प्रिंट नहीं बचा। हम कभी नहीं जान पाएंगे कि वो असल में कैसी थी।

फाल्के का खुद का दूसरा अध्याय — जो कोई याद नहीं करता

और अब — दादासाहेब फाल्के खुद। क्योंकि उनकी कहानी भी 1913 पर खत्म नहीं हुई थी।

‘राजा हरिश्चंद्र’ के बाद फाल्के ने बहुत काम किया। 1913 से 1937 के बीच उन्होंने 94 फीचर फिल्में और 27 शॉर्ट फिल्में बनाईं। ‘मोहिनी भस्मासुर’ (1913), ‘सत्यवान सावित्री’ (1914), ‘लंका दहन’ (1917), ‘श्री कृष्ण जन्म’ (1918), ‘कालिया मर्दन’ (1919) — ये सब फाल्के की हैं।

‘लंका दहन’ की बात करें तो उस फिल्म में हनुमानजी की भूमिका इतनी प्रभावशाली थी कि दर्शक पर्दे पर फूल फेंकने लगे थे। सिनेमाघर में जूते उतारकर लोग बैठने लगे — जैसे किसी मंदिर में बैठते हैं। एक फिल्म इतनी असरदार थी कि लोगों ने उसे पूजा की तरह देखा।

दादासाहेब फाल्के के जीवन के अंतिम वर्ष — भारतीय सिनेमा के पिता जिन्होंने 94 फीचर फिल्में बनाईं, 1937 में आखिरी फिल्म फ्लॉप हुई और 1944 में उसी उद्योग की गुमनामी में निधन हुआ जिसकी नींव उन्होंने रखी थी

लेकिन फिर 1920 के दशक के आखिर में कुछ बदल गया। फाल्के की कंपनी — Hindustan Cinema Films Company — घाटे में जाने लगी। नई पीढ़ी आ रही थी। बाबूराव पेंटर जैसे लोग थे जो सिनेमा को नई दिशा दे रहे थे। और फाल्के — जो हमेशा अकेले काम करने के आदी थे — नई परिस्थितियों में खुद को फिट नहीं कर पाए।

1937 में उन्होंने आखिरी फिल्म बनाई — ‘गंगावतरण’। वो टॉकी थी। नहीं चली। और उसके बाद फाल्के साहब का सिनेमा से नाता टूट गया। वो जिस उद्योग के पिता थे, उसी ने उन्हें पहचानना बंद कर दिया था।

वो दस साल — जो असल में अट्ठारह थे

1913 से 1931 तक — ये अट्ठारह साल भारतीय सिनेमा के सबसे ज़रूरी साल थे। इन सालों में सिनेमा ने खुद को बनाया — बिना किसी मैनुअल के, बिना किसी गाइड के।

इन सालों में बाबूराव पेंटर ने सामाजिक सिनेमा की नींव रखी। J.F. मदन ने distribution का ढाँचा बनाया। दक्षिण भारत के फिल्ममेकर्स ने साबित किया कि सिनेमा सिर्फ एक शहर की चीज़ नहीं है। दुर्गाबाई और कमलाबाई ने समाज को चुनौती दी। अनजान कैमरामैनों ने हाथ से हैंडल घुमाकर इतिहास रचा।

और ये सब — इतिहास की किताबों में एक फुटनोट भी नहीं हैं।

जब मैं इन लोगों की कहानियाँ पढ़ता हूँ — और महसूस करता हूँ कि इनकी बनाई 1,309 फिल्में हमेशा के लिए खो गई हैं — तो एक बात बार-बार मन में आती है।

इतिहास उन्हें याद करता है जिनके बारे में कुछ बचा रहता है। और कुछ बचाने के लिए ज़रूरी है कि कोई बचाए।

साइलेंट एरा के इन गुमनाम फिल्ममेकर्स को कोई नहीं बचा पाया। न उनकी फिल्में बचीं, न उनके नाम।

लेकिन उनकी ज़िद बची। उनका जुनून बचा। और आज जो भी भारतीय सिनेमा है — वो उन्हीं की नींव पर खड़ा है। भले ही वो नींव अब दिखती नहीं।

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