वो फिल्म जिसने Akira Kurosawa को दुनिया से मिलाया — Sanshiro Sugata 1943 Review

1880 के Meiji era Japan में तूफानी हवा में खड़ा एक judo योद्धा

मुझे याद है जब मैंने पहली बार Akira Kurosawa का नाम सुना था — किसी ने कहा था, “Seven Samurai देखनी है तो ज़िंदगी में एक बार ज़रूर देखो।” मैंने देखी। और उसके बाद जो हुआ वो शायद हर Kurosawa fan के साथ होता है — आप उनकी हर फिल्म ढूँढ़ने लगते हो। एक के बाद एक। और फिर एक दिन आप उस पहली फिल्म तक पहुँचते हैं जहाँ से सब शुरू हुआ था।

Sanshiro Sugata। 1943। Kurosawa की पहली फिल्म।

और जब आप इसे देखते हैं — तो पहला ख़याल यही आता है कि ये किसी पहली फिल्म जैसी लगती ही नहीं है।

वो दिन जब Kurosawa ने पहली बार “Action” बोला

बात 13 दिसंबर, 1942 की है। Yokohama के Asama Shrine के परिसर में एक 32 साल का नौजवान director की कुर्सी पर पहली बार बैठा था। नाम था Akira Kurosawa।

 Sanshiro Sugata 1943 के सबसे यादगार scene

Kurosawa ने खुद अपनी autobiography में लिखा है कि जब उन्होंने पहली बार “Action” बोला, तो उनकी अपनी आवाज़ उन्हें अजीब लगी। वो शब्द वो पहले भी बोल चुके थे — six साल तक assistant director रहे थे Toho Studios में। लेकिन उस दिन फर्क था। उस दिन ये उनकी फिल्म थी।

छह साल। इतने सालों तक उन्होंने दूसरे directors के पीछे खड़े होकर सीखा। Script लिखी। Camera angles समझे। Actors को देखा। और जब उन्हें अपनी पहली फिल्म मिली, तो उन्होंने Tsuneo Tomita के उपन्यास को चुना — Judo और Jujitsu की rivalry की एक कहानी। एक ऐसे लड़के की कहानी जो ताकत से शुरू होती है और wisdom तक पहुँचती है।

फिल्म का नाम रखा — Sanshiro Sugata।

कहानी — सुनने में सरल, महसूस करने में गहरी

1882 का Japan। Meiji era. देश बदल रहा है। पुरानी परंपराएँ और नई सोच आमने-सामने हैं।

इसी दौर में Aizu से एक जवान लड़का Tokyo आता है — Sanshiro Sugata (Susumu Fujita)। बड़ा है। ताकतवर है। लेकिन उसके अंदर एक बेचैनी है — वो कुछ ऐसा सीखना चाहता है जो सिर्फ मारना-पीटना नहीं हो। उसे Jujitsu नहीं, कुछ और चाहिए।

एक रात वो एक duel देखता है — Judo master Shogoro Yano (Denjiro Okochi) अकेले दम पर कई Jujitsu fighters को नदी में फेंक देते हैं। न शोर, न घमंड। बस एक शांत, अजेय ताकत।

Sanshiro उसी रात तय कर लेता है — इन्हीं से सीखूँगा।

लेकिन Yano के यहाँ सीखना आसान नहीं है। और Sanshiro का सबसे बड़ा दुश्मन कोई बाहर का fighter नहीं — वो खुद है। उसका ego। उसकी जल्दबाज़ी। उसका ये मानना है कि ताकत ही सब कुछ है।

वो रात और वो कमल का फूल — फिल्म का सबसे यादगार scene

फिल्म में एक scene है जो मैं कभी नहीं भूल सका।

Sanshiro एक झगड़े में पड़ जाता है जो उसे नहीं करना था। Yano को पता चलता है। वो निराश होते हैं — बहुत गहरी निराशगी, जो चीखने-चिल्लाने से नहीं, बल्कि उस खामोशी से ज़ाहिर होती है जो एक गुरु की होती है जब शिष्य भटक जाए।

Sanshiro माफी माँगना चाहता है। लेकिन वो नहीं जानता कैसे।

तो वो करता है वो जो उसे सही लगता है — वो उस ठंडे तालाब में कूद पड़ता है जो Yano के temple के पास है। और वहीं रहता है। रात भर। ठंडे पानी में। गले तक डूबा हुआ।

पास का monk उसे देखता है और कहता है — ये सिर्फ दिखावा है। अपने आप को prove करने की ज़िद है।

और फिर — रात के घने अंधेरे में — एक कमल का फूल खिलता है।

Sanshiro उसे देखता है। और कुछ टूट जाता है उसके अंदर। वो ego जो उसने पाल रखा था — वो चला जाता है। वो उस तालाब से बाहर नहीं निकलता। वो एक नए इंसान की तरह बाहर आता है।

Kurosawa ने इस scene में कोई बड़ा dialogue नहीं रखा। कोई dramatic music नहीं। बस अंधेरा, ठंडा पानी, एक कमल, और एक लड़के का जन्म।

यही Kurosawa की ताकत थी। पहली ही फिल्म में।

Gennosuke Higaki — वो villain जिसे Kurosawa ने खुद अपना Mephistopheles कहा

हर Kurosawa film में एक किरदार होता है जो story को अलग dimension देता है। Sanshiro Sugata में वो किरदार है — Gennosuke Higaki।

Higaki, Jujitsu का एक expert है। लेकिन वो सिर्फ villain नहीं। वो एक ऐसा इंसान है जो अपनी कला से नहीं, अपने अहंकार से लड़ता है। Western कपड़े पहनता है। Calm रहता है। लेकिन उसके अंदर एक जहर है — वो Judo को नीचा दिखाना चाहता है। Sanshiro को हराना चाहता है।

Kurosawa ने बाद में कहा था — “Higaki मेरा Mephistopheles है। वो इस फिल्म का सबसे दिलचस्प किरदार है।”

और वो सही थे। क्योंकि Higaki हमें याद दिलाता है कि बुराई हमेशा चीखती-चिल्लाती नहीं आती। वो कभी-कभी सूट पहनकर मुस्कुराते हुए आती है।

1880 के Japan में Judo और Jujitsu के बीच dramatic duel का श्याम-श्वेत सिनेमाई चित्रण

वो आखिरी दृश्य — हवा, घास और दो योद्धा

फिल्म का क्लाइमैक्स Sengokuhara के मैदान में होता है। February 15, 1943। असली shooting date।

और उस दिन कुदरत ने खुद set design किया।

Sanshiro और Higaki आमने-सामने हैं। लेकिन कोई दर्शक नहीं। कोई referee नहीं। बस एक खुला मैदान, लंबी-लंबी घास, और एक तूफानी हवा जो इतनी तेज़ है कि घास लगभग ज़मीन पर झुकी जा रही है।

आसमान में बादल दौड़ रहे हैं। हवा का शोर है। और दो इंसान एक-दूसरे को देख रहे हैं।

Kurosawa ने इस scene में weather को एक character बनाया। हवा सिर्फ background नहीं — वो उस tension का हिस्सा है जो दोनों के बीच है। जब Sanshiro move करता है, हवा बढ़ जाती है। जब Higaki रुकता है, एक पल के लिए सब थम जाता है।

ये technique — weather को emotion की तरह use करना — Kurosawa बाद में Rashomon में, Seven Samurai में, Ran में बार-बार use करेंगे। लेकिन पहली बार यहाँ थी।

Censor Board से वो लड़ाई जो Yasujiro Ozu ने जीती

फिल्म बन गई। Kurosawa खुश थे। लेकिन असली इम्तिहान अब था।

1943 का Japan। World War II. Military censorship हर चीज़ पर थी। और जब Sanshiro Sugata Censor Board के पास गई, तो उन्होंने कह दिया — ये film “ज़्यादा British-American style” में है। यानी Western cinema का असर है। और वो नहीं चलेगा।

करीब 17-18 मिनट का फुटेज काट दिया गया। वो footage आज तक नहीं मिला।

लेकिन फिल्म रिलीज़ हो पाई — इसलिए कि एक बड़े Director ने दखल दिया। Yasujiro Ozu. Japanese cinema के उस legend ने Censor Board को मनाया। और 25 March, 1943 को Sanshiro Sugata theaters में आई।

दो दिन पहले — 23 March को — Kurosawa 33 साल के हुए थे।

पहली फिल्म में ही एक “पूरा” Director

जो बात इस फिल्म को देखकर सबसे ज़्यादा चौंकाती है — वो ये है कि ये किसी नए director की पहली कोशिश नहीं लगती।

Opening shot देखिए — camera ऊपर आसमान से शुरू होता है, धीरे-धीरे नीचे आता है, एक गली में मुड़ता है, और एक unbroken shot में Sanshiro तक पहुँचता है। ये 45 seconds। बिना किसी cut के। पहली ही फिल्म में।

Light और shadow का वो खेल जो बाद में Kurosawa की पहचान बना — वो यहाँ भी है। Sanshiro के lotus pond वाले scene में जिस तरह दिन-रात में बदलता है — बस एक lighting change से — वो technique आज भी cinema schools में पढ़ाई जाती है।

और acting? Susumu Fujita ने Sanshiro को जिस तरह play किया — एक raw, angry, confused लड़के से एक mature, humble warrior तक का सफर — बिना किसी exaggeration के — वो देखने लायक है।

climactic windstorm scene से प्रेरित श्याम-श्वेत सिनेमाई दृश्य, Akira Kurosawa की पहली फिल्म की भावना का प्रतीक

वो बात जो फिल्म नहीं कहती, लेकिन दिखाती है

Sanshiro Sugata एक Judo film नहीं है।

ये एक ऐसे इंसान की कहानी है जो सीखता है कि असली ताकत ताकत में नहीं होती। Humility में होती है। ये एक ऐसे शिष्य की कहानी है जो समझता है कि गुरु सिर्फ techniques नहीं सिखाते — वो जीना सिखाते हैं।

Kurosawa ने फिल्म में एक dialogue दिया है जो पूरी film का soul है —

“A lotus will only grow in the mud.”

कमल सिर्फ कीचड़ में उगता है। यानी जो सबसे कठिन जगह है, जहाँ सब कुछ गंदा और मुश्किल लगता है — वहीं से असली सुंदरता निकलती है। Sanshiro का वो तालाब वाला scene इसी का visual था।

आखिरी बात — क्यों देखें आज?

अगर आप Kurosawa को जानना चाहते हैं — और सिर्फ उनकी “famous” फिल्में देखकर संतुष्ट नहीं हैं — तो Sanshiro Sugata ज़रूर देखें।

ये 80 साल पुरानी फिल्म है। Black and white है। कुछ footage missing है। लेकिन जो बचा है, वो काफी है ये समझने के लिए कि एक असली filmmaker कैसे सोचता है।

ये वो फिल्म है जहाँ से एक legend शुरू हुआ था। जहाँ एक 33 साल के इंसान ने पहली बार कुर्सी पर बैठकर “Action” बोला और cinema का इतिहास बदल दिया।

और जब आप ये फिल्म देखेंगे — उस आखिरी scene में, जब हवा चल रही होगी और Sanshiro मैदान में खड़ा होगा — आप समझ जाएँगे कि Akira Kurosawa कोई director नहीं थे।

वो एक कवि थे। जो कैमरे से लिखते थे।


Rating: 4.5/5 — Kurosawa का पहला अध्याय। अधूरा नहीं, बल्कि एक शुरुआत जो अपने आप में मुकम्मल है।

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