1919 का राष्ट्रीयकरण और दुनिया का पहला फिल्म स्कूल VGIK: लेनिन ने सिनेमा को हथियार कैसे बनाया

1920s Soviet agitprop train standing at a snowy rural station,

सोचिए, 1919 का रूस। गृहयुद्ध छिड़ा हुआ है। शहरों में रोटी की कमी है, कारखाने ठप हैं, और सरकार को हर रोज़ अपनी जान बचाने की चिंता है। ऐसे में एक नेता कलम उठाता है और दस्तखत करता है, किसी हथियार के ऑर्डर पर नहीं, बल्कि फिल्म उद्योग के राष्ट्रीयकरण के आदेश पर।

वह नेता थे व्लादिमीर लेनिन। तारीख थी 27 अगस्त 1919. और कुछ ही दिनों बाद मॉस्को में एक ऐसी संस्था खुली, जिसे आज दुनिया का पहला फिल्म स्कूल माना जाता है: VGIK.

सवाल यह है कि जिस सरकार के पास खाने को अनाज नहीं था, उसने सिनेमा पर इतना ध्यान क्यों दिया? इसका जवाब Lenin and cinema के रिश्ते में छिपा है, और यह कहानी आज भी फिल्म पढ़ने वालों को हैरान करती है।

क्रांति से पहले के रूस का एक पुराना सिनेमाघर, जहां दर्शक मूक फिल्म देख रहे हैं

क्रांति से पहले रूस का सिनेमा कैसा था?

1917 की क्रांति से पहले रूस में फिल्म उद्योग छोटा था, पर बढ़ रहा था। पहली रूसी कथा-फिल्म Stenka Razin 1908 में बनी। 1913 तक देश में हजार से ज्यादा सिनेमाघर खुल चुके थे। ज्यादातर फिल्में प्राइवेट कंपनियां बनाती थीं, और परदे पर रोमांटिक ड्रामा, ऐतिहासिक कहानियां और लोकप्रिय सितारे छाए रहते थे।

क्रांति के बाद हालात उलट गए। कई निर्माता, कलाकार और निर्देशक देश छोड़कर भाग गए। फिल्म का कच्चा माल, यानी रील और केमिकल, लगभग खत्म होने लगा। जो लोग रुके, उनके पास पैसे नहीं थे और स्टूडियो बिखर रहे थे।

लेकिन नई सरकार को एक बात जल्दी समझ आ गई थी। देश की ज्यादातर जनता पढ़ना नहीं जानती थी। अखबार और पर्चे उन तक कम पहुंचते थे। फिल्म की भाषा, यानी तस्वीरें, हर किसी की समझ में आती थीं।

27 अगस्त 1919: वह आदेश जिसने सब बदल दिया

27 अगस्त 1919 को लेनिन ने उस फरमान पर दस्तखत किए, जिससे फिल्म बनाने और दिखाने का पूरा नियंत्रण शिक्षा के जन-आयोग (Narkompros) के हाथ में चला गया। इस आयोग के मुखिया अनातोली लुनाचार्स्की थे, जो संस्कृति और शिक्षा को क्रांति का हिस्सा मानते थे।

इसे समझिए: निजी स्टूडियो अब निजी नहीं रहे। फिल्म बनाने, बांटने और दिखाने, तीनों पर सरकार का ताला लग गया।

लेनिन की सोच साफ थी, पर इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने से बचना चाहिए। उनके नाम से एक मशहूर बात कही जाती है कि सिनेमा हमारे लिए सब कलाओं में सबसे महत्वपूर्ण है। इतिहासकार मानते हैं कि यह बात उन्होंने कला की खूबसूरती के लिए नहीं, बल्कि सिनेमा की प्रचार और आंदोलन की ताकत को ध्यान में रखकर कही थी। उनके लिए फिल्म एक औज़ार थी, जैसे मंच, पोस्टर या अखबार, बस ज्यादा असरदार।

और ताकत वाकई ज्यादा थी। एक पर्चा पढ़ने के लिए पढ़ा-लिखा होना ज़रूरी है। फिल्म देखने के लिए सिर्फ आंखें चाहिए।

1922 के निर्देश और सिनेमा की रणनीति

कुछ साल बाद, 17 जनवरी 1922 को लेनिन ने फिल्म कारोबार पर कुछ निर्देश जारी किए। इनमें सरकारी नियंत्रण के साथ-साथ यह भी था कि फिल्म दिखाने का कारोबार पैसा कमाने का जरिया बने। गृहयुद्ध के बाद अर्थव्यवस्था संभालने के लिए सरकार ने कुछ ढील दी, जिसे NEP का दौर कहा जाता है। इस दौरान निजी फिल्म कंपनियों को सीमित छूट मिली और सिनेमाघरों में मनोरंजक फिल्में भी चलीं, ताकि टिकट बिकें और उसी कमाई से प्रचार वाली फिल्मों का खर्च निकले।

यह रणनीति दिलचस्प है। लेनिन समझते थे कि सिर्फ उपदेश देने वाली फिल्में कोई नहीं देखेगा। दर्शक को सिनेमाघर तक खींचने के लिए कहानी चाहिए, और कहानी के बीच संदेश डाला जा सकता है।

1920 के दशक में बर्फीले रेलवे स्टेशन पर हाथ से चलने वाला फिल्म कैमरा संभालता कैमरामैन

सिनेमा ट्रेन पर: जब फिल्म गांव-गांव पहुंची

अब सबसे रोमांचक हिस्सा। गृहयुद्ध के दौरान सरकार ने “प्रचार रेलगाड़ियां” चलाईं, जो मोर्चे और दूर-दराज के इलाकों तक जाती थीं। इन गाड़ियों में छपाई की मशीनें, पर्चे, कलाकारों की टोली और फिल्म दिखाने के उपकरण होते थे। गांव के लोग पहली बार चलती तस्वीरें देखते थे।

इन्हीं दिनों कैमरामैन एदुआर्द तिस्से जैसे लोग उभरे, जो आगे चलकर सर्गेई आइज़ेंश्टाइन की मशहूर फिल्मों के कैमरे के पीछे रहे। तिस्से ने बाद में याद किया कि उस दौर में कभी-कभी उनके पास सिर्फ 100 फुट के आसपास फिल्म होती थी, और उसी में रेड स्क्वायर पर मई दिवस का जुलूस और लेनिन का भाषण दर्ज करना होता था। यानी हर फ्रेम सोच-समझकर खींचना पड़ता था, क्योंकि गलती की गुंजाइश नहीं थी।

यही तंगी आगे चलकर सोवियत सिनेमा की पहचान बन गई, क्योंकि कम फिल्म में ज्यादा कहने की कला निकल आई।

VGIK: दुनिया का पहला फिल्म स्कूल

अब स्कूल की बात। 1919 में, यानी राष्ट्रीयकरण के कुछ ही दिन बाद, मॉस्को में राज्य फिल्म स्कूल खोला गया। इसके संस्थापक थे व्लादिमीर गार्दिन, जो क्रांति से पहले के कुछ गिने-चुने निर्देशकों में थे जो रुककर नई सरकार के साथ काम करने को तैयार हुए। रूसी सूत्रों के मुताबिक 1 सितंबर 1919 को इस संस्था की शुरुआत मानी जाती है।

यही संस्था आगे चलकर VGIK बनी। नाम कई बार बदले:

  • 1919: राज्य फिल्म स्कूल
  • 1925 के आसपास: राज्य फिल्म संस्थान (GIK)
  • 1934: अखिल-संघीय राज्य सिनेमा संस्थान (VGIK)
  • 1986 से: सर्गेई गेरासिमोव के नाम पर, यानी आज का Gerasimov Institute of Cinematography

इसे व्यापक रूप से world’s first film school माना जाता है। हालांकि “पहला” जैसा दावा हमेशा थोड़ा सावधानी मांगता है, इसलिए इतिहासकार इसे “सबसे पुराना और पहला माने जाने वाला” कहना ज्यादा पसंद करते हैं। बाद में दुनिया भर में दूसरे संस्थान आए: इटली में 1935 में Centro Sperimentale, फ्रांस में 1943 में IDHEC, प्राग में 1946 में FAMU और पोलैंड के वोज़ में 1948 का फिल्म स्कूल। भारत में पुणे का फिल्म संस्थान 1960 में शुरू हुआ। यानी VGIK इन सबसे दशकों पहले आ चुका था।

शुरुआत आसान नहीं थी। कच्ची फिल्म की भारी कमी थी, इसलिए छात्र कई बार पुरानी फिल्मों को काटकर, जोड़कर और दोबारा जोड़कर सीखते थे। और यहीं से निकला सोवियत सिनेमा का सबसे बड़ा तोहफा।

जब कमी ने कला को जन्म दिया

लेव कुलेशोव (Lev Kuleshov) ने 1920 में एक प्रयोगशाला शुरू की। फिल्म की कमी के कारण उनके छात्र पुरानी फिल्मों के टुकड़े लेकर उन्हें अलग-अलग क्रम में जोड़ने के प्रयोग करते थे। इन प्रयोगों से जो नतीजा निकला, उसे आज कुलेशोव इफेक्ट कहते हैं। मोटा विचार यह है कि अर्थ अकेले शॉट से नहीं, बल्कि दो शॉट्स के जुड़ने से पैदा होता है। एक ही चेहरे की तस्वीर के बाद अगर खाने की थाली दिखाई जाए तो भूख महसूस होती है, और ताबूत दिखाया जाए तो दुख।

यही मोंताज (montage) की बुनियाद बनी। पुदोव्किन, दिज़ा वेर्तोव और आइज़ेंश्टाइन जैसे दिग्गजों ने इसे आगे बढ़ाया। 1928 से आइज़ेंस्टाइन खुद VGIK में पढ़ाने लगे।

इसी दौर की कुछ फिल्मों ने दुनिया को हिला दिया:

  • Battleship Potemkin (1925), जिसके ओडेसा सीढ़ियों वाले दृश्य को आज भी सिनेमा की क्लास में पढ़ाया जाता है
  • Mother (1926), पुदोव्किन की फिल्म
  • Man with a Movie Camera (1929), दिज़ा वेर्तोव का प्रयोग, जिसमें कथा नहीं, सिर्फ कैमरे की नजर से शहर की जिंदगी है

ये सब Soviet propaganda films की सूची में भी आती हैं, और साथ ही कला के लिहाज से भी बेमिसाल मानी जाती हैं। यह एक दिलचस्प उलझन है: जो फिल्म प्रचार के लिए बनी थी, वही सिनेमा की भाषा बदल गई।

पुरानी फिल्म की पट्टियों को काटकर जोड़ता संपादक, जिससे मोंताज की तकनीक विकसित हुई

प्रचार का दूसरा चेहरा

अगर कहानी यहीं खत्म होती तो यह एक चमकदार सफलता होती, पर सच इतना सीधा नहीं है। 1920 के दशक के आखिर से स्टालिन का शिकंजा कसने लगा। प्रयोगधर्मी सिनेमा को “अभिजात्य” और “औपचारिकतावादी” कहकर निशाना बनाया गया। निर्देशकों से कहा गया कि वे सरल, सीधी और “समाजवादी यथार्थवाद” वाली फिल्में बनाएं।

आइज़ेंस्टाइन जैसे बड़े नाम भी इसकी चपेट में आए। उनकी फिल्म Ivan the Terrible के दूसरे भाग को स्टालिन के दौर में रोक दिया गया और वह 1958 में जाकर दिखाई जा सकी। बाद के दशकों में सेंसरशिप, निगरानी और कई कलाकारों की मुश्किलें आम बात रहीं।

इसलिए लेनिन का सिनेमा-हथियार वाला विचार दोधारी साबित हुआ। एक तरफ इसने तकनीक, शिक्षा और रचनात्मकता को बढ़ावा दिया। दूसरी तरफ इसने कलाकार की आजादी पर सरकारी पहरा भी बैठा दिया।

VGIK से निकले नाम

फिर भी VGIK की ताकत इस बात से पता चलती है कि इसने आगे चलकर कितने बड़े नाम दिए। आंद्रेई तारकोव्स्की, सर्गेई पाराजानोव, निकिता मिखाल्कोव, आंद्रेई कोन्चालोव्स्की, लारिसा शेपित्को और अलेक्ज़ेंडर सोकुरोव जैसे फिल्मकार इसी संस्थान से पढ़े या जुड़े रहे। इनकी फिल्में अलग-अलग मिजाज की हैं, पर सबमें एक बात साझा है: कैमरे को सिर्फ रिकॉर्ड करने की मशीन नहीं, सोचने का तरीका माना गया।

भारतीय पाठकों के लिए: सोवियत सिनेमा और भारत

हमारे लिए भी यह कहानी दूर की नहीं है। 1950 के दशक में भारत और सोवियत संघ के बीच सांस्कृतिक रिश्ते गहरे थे। राज कपूर की आवारा और श्री 420 सोवियत संघ में बेहद लोकप्रिय हुईं, और 1957 में दोनों देशों ने मिलकर परदेसी जैसी साझा फिल्म भी बनाई। भारतीय फिल्मकारों ने भी सोवियत मोंताज और सामाजिक सिनेमा की सोच को करीब से देखा।

आज इस इतिहास को क्यों पढ़ें?

आज जब हम सोशल मीडिया, वीडियो और सरकारी विज्ञापनों के बीच जी रहे हैं, तब यह कहानी और ज्यादा प्रासंगिक है। यह दिखाती है कि चलती तस्वीरें सिर्फ मनोरंजन नहीं हैं। वे राय बना सकती हैं, भावनाएं जगा सकती हैं और पूरी पीढ़ी की सोच को दिशा दे सकती हैं।

लेनिन ने यह बात सौ साल से भी पहले भांप ली थी। और VGIK की कहानी यह भी सिखाती है कि जब किसी कला को सिखाने के लिए पहली बार संस्था बनती है, तो उसके साथ सिर्फ तकनीक नहीं, एक पूरा नजरिया भी पैदा होता है।

सर्दियों में मॉस्को के फिल्म संस्थान की इमारत की सीढ़ियां चढ़ते छात्र, जिनके हाथ में फिल्म के डिब्बे हैं

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

VGIK की स्थापना कब हुई?
1919 में मॉस्को में, राज्य फिल्म स्कूल के नाम से। इसे व्यापक रूप से दुनिया का पहला और सबसे पुराना फिल्म स्कूल माना जाता है।

लेनिन ने फिल्म उद्योग का राष्ट्रीयकरण कब किया?
27 अगस्त 1919 को, एक सरकारी फरमान पर दस्तखत करके।

VGIK के संस्थापक कौन थे?
फिल्म निर्देशक व्लादिमीर गार्दिन।

क्या सोवियत प्रचार फिल्में सिर्फ प्रचार थीं?
नहीं। उनमें राजनीतिक संदेश था, पर Battleship Potemkin जैसी फिल्मों ने सिनेमा की भाषा, खासकर मोंताज, को नई दिशा दी।

आखिर में

1919 का वह आदेश शायद लेनिन की कलम से निकला सबसे अनोखा फैसला नहीं था, पर इसका असर लंबा चला। एक भूखे, लड़खड़ाते देश ने सिनेमा को हथियार माना, और उसी हथियार को धार देने के लिए दुनिया का पहला फिल्म स्कूल खुला।

नतीजा दोनों तरफ गया: कुछ बेहतरीन कला मिली और कुछ बुरी तरह दबाई गई आवाजें भी। यही इस इतिहास की सबसे ईमानदार बात है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *