मैसूर के उस राजा की कहानी जो कुश्ती में अजेय था — रणधीर कंठीरव 1960 फ़िल्म समीक्षा

Ranadheera Kanteerava (1960) Kannada movie

कर्नाटक के इतिहास में एक नाम ऐसा है जो सिर्फ़ किताबों में नहीं, लोकगीतों में भी जीता है। एक नाम जो मैसूर की उस धरती पर आज भी गूँजता है जहाँ कभी उसके क़दम पड़े थे।

रणधीर कंठीरव नरसराज वाडेयर।

यह नाम किसी साधारण राजा का नहीं था। यह उस योद्धा का नाम था जिसने 1638 में बारह वर्षों तक मैसूर पर राज किया, बीजापुर के आदिल शाहियों को युद्ध में पराजित किया, मैसूर का पहला स्वतंत्र सिक्का — ‘कंठीरय फ़णम’ — चलाया, और जिसकी शारीरिक शक्ति के किस्से आज भी कन्नड़ लोककथाओं में सुनाई देते हैं।

1960 में इसी राजा की ज़िंदगी को पर्दे पर उतारा गया। और वो फ़िल्म बनी — रणधीर कंठीरव।

वो फ़िल्म जो कन्नड़ सिनेमा की पहली बड़ी ब्लॉकबस्टर बनी

10 फ़रवरी 1960 को रिलीज़ हुई यह फ़िल्म कोई सामान्य ऐतिहासिक फ़िल्म नहीं थी। Encyclopedia of Indian Cinema के लेखकों Ashish Rajadhyaksha और Paul Willemen ने इसे कन्नड़ सिनेमा की पहली असली “बड़ी हिट” कहा है। 1960 में इसने ₹70 लाख की कमाई की — उस ज़माने में यह रक़म किसी फ़िल्म के लिए असाधारण थी।

लेकिन इस फ़िल्म की असली ख़ासियत इसका box office नहीं था।

1960 की कन्नड़ फ़िल्म रणधीर कंठीरव में डॉ. राजकुमार का काल्पनिक विंटेज ब्लैक एंड व्हाइट पोर्ट्रेट

असली ख़ासियत यह थी कि यह फ़िल्म पूरी तरह मैसूर पैलेस के दस्तावेज़ों पर आधारित थी। उन असली काग़ज़ात पर, जो सदियों से महल की तहख़ानों में बंद थे। इसीलिए इसे भारतीय सिनेमा की सबसे प्रामाणिक ऐतिहासिक फ़िल्मों में से एक माना जाता है।

फ़िल्म के पीछे के लोग — एक असाधारण जोड़

निर्देशक N.C. Rajan मूलतः एक editor थे। यह उनकी पहली बड़ी निर्देशक की कुर्सी थी। और पटकथा लिखी थी G.V. Iyer ने — वही G.V. Iyer जो आगे चलकर कन्नड़ सिनेमा के सबसे प्रतिभाशाली लेखक-निर्देशकों में गिने जाएँगे।

संगीत की ज़िम्मेदारी थी G.K. Venkatesh के कंधों पर। और छायांकन किया था B. Dorairaj ने।

यह फ़िल्म एक अनोखी सहयोगी परियोजना थी। इसे बनाया था “कन्नड़ चलनचित्र कलाविदार संघ” ने — एक ऐसी संस्था जो स्वयं डॉ. राजकुमार, G.V. Iyer, T.R. नरसिम्हाराजू और T.N. बालकृष्ण ने मिलकर बनाई थी। यानी जब कन्नड़ फ़िल्म उद्योग मुश्किल दौर से गुज़र रहा था, इन कलाकारों ने खुद पैसे लगाए, खुद संस्था बनाई, और खुद अपनी भाषा के सिनेमा को बचाने की कोशिश की।

यह सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं थी। यह एक आंदोलन था।

असली राजा — जिसकी कहानी किसी फ़िल्म से कम नहीं

फ़िल्म को समझने के लिए पहले उस इंसान को समझना होगा जिस पर यह फ़िल्म बनी।

कंठीरव नरसराज वाडेयर I का जन्म 2 मई 1615 को हुआ था। वे बेट्टड चामराज वाडेयर के दूसरे पुत्र थे। 1638 में, जब उनके पूर्ववर्ती राजा — उनके चचेरे भाई Raja Wodeyar II — को उनके ही सेनापति विक्रमराय ने षड्यंत्र करके ज़हर दे दिया, तो मात्र 23 वर्ष के कंठीरव को मैसूर की गद्दी मिली।

गद्दी तो मिली, लेकिन साथ मिली एक डगमगाती रियासत, एक षड्यंत्रकारी दरबार, और चारों तरफ़ से आती दुश्मनों की ललकार।

लेकिन यह राजा साधारण नहीं था।

कंठीरव सिर्फ़ राजनीतिज्ञ नहीं थे — वे कुश्ती के उस्ताद भी थे। लोककथाओं में आता है कि तिरुचिरापल्ली के एक मशहूर पहलवान ने उन्हें चुनौती दी थी। राजा ने उसे अखाड़े में पराजित किया। एक और किस्सा है जिसमें तीन पहलवानों ने एक साथ उन्हें चुनौती दी — और राजा ने तीनों को एक साथ हराया।

वे वज्र मुष्टि के भी विशेषज्ञ थे — एक प्राचीन युद्धकला जिसमें हाथ की उँगलियाँ लोहे के खोल में बंद करके प्रतिद्वंदी के माथे पर वार किया जाता है। पहला ख़ून जो बहे — वही जीतता है।

इस राजा की पूरी उपाधि सुनिए — “महा मंडलेश्वर बिरुडान्तेम्बर गंड कर्णाटक चरावर…” — यह उपाधि इतनी लंबी है कि दरबार में पूरी पढ़ने में मिनट लग जाते थे।

और हाँ — इसी राजा ने मैसूर का पहला स्वतंत्र सिक्का चलाया। “कंठीरय फ़णम” नाम का वो सोने का सिक्का आज भी numismatic collectors की पसंदीदा चीज़ है।

फ़िल्म की कहानी — जब पर्दे पर जीवंत हुआ इतिहास

फ़िल्म की शुरुआत होती है मैसूर के उस नाज़ुक दौर से जब युवा कंठीरव को गद्दी तो मिल गई है, लेकिन दरबार में उन्हें कमज़ोर समझा जाता है। सेनापति विक्रमराय — जो पहले ही एक राजा को ज़हर दे चुका है — अब इस नए राजा को भी अपनी कठपुतली बनाना चाहता है।

लेकिन कंठीरव की माँ हैं। और वो कोई साधारण राजमाता नहीं हैं। वे अपने बेटे को राज-काज की बारीकियाँ सिखाती हैं, षड्यंत्रों से बचना सिखाती हैं, और धीरे-धीरे वो कंठीरव जो एक अबोध युवराज था, एक सशक्त, निडर शासक बनता है।

फ़िल्म में कुश्ती के दृश्य हैं — raw, powerful, और उस ज़माने के तकनीकी संसाधनों को देखते हुए बेहद प्रभावशाली। दरबारी षड्यंत्र हैं। युद्ध के दृश्य हैं। और एक ऐसी माँ की कहानी है जो बिना तलवार उठाए, सिर्फ़ अपनी बुद्धि से एक राजवंश को बचाती है।

डॉ. राजकुमार — जब अभिनेता ने राजा को जीया

इस फ़िल्म में डॉ. राजकुमार का नाम लिए बिना बात पूरी नहीं होती।

असली नाम था — सिंगनल्लुरु पुट्टस्वामय्या मुथुराज। जन्म हुआ 24 अप्रैल 1929 को गजनूर के एक छोटे से क़स्बे में। पिता एक मामूली रंगमंच कलाकार थे। बचपन से थिएटर में काम किया। 1954 में बेदर कन्नप्पा से बतौर lead actor debut किया।

और 1960 में जब उन्होंने रणधीर कंठीरव में कंठीरव का किरदार निभाया — तो वो सिर्फ़ अभिनय नहीं कर रहे थे।

मैसूर के राजा कंठीरव नरसराज I द्वारा 1638-1659

राजकुमार ख़ुद इस फ़िल्म के निर्माता भी थे। यह उनकी पहली production थी। यानी उनका इस परियोजना से एक व्यक्तिगत जुड़ाव था — सिर्फ़ कलाकार का नहीं, बल्कि उस इंसान का जो मानता था कि कन्नड़ सिनेमा को ऐसी फ़िल्में चाहिए जो इतिहास को सच्चाई से पेश करें।

पर्दे पर जब वे कंठीरव बनते हैं — वो शाही चाल, वो आँखों में एक राजा का गर्व, और कुश्ती के दृश्यों में एक योद्धा की ऊर्जा — यह सब देखकर समझ आता है कि क्यों उनके प्रशंसक उन्हें सिर्फ़ “अन्नावरु” (बड़े भाई) नहीं, “नरसार्वभौम” (अभिनय के सम्राट) कहते थे।

उल्लेखनीय है कि डॉ. राजकुमार ने अपने करियर में कभी कन्नड़ के बाहर काम नहीं किया — तमिल और तेलुगु उद्योग से बड़े-बड़े प्रस्ताव आए, पर उन्होंने हर बार मना किया। MGR और NTR की तरह राजनीति में भी नहीं गए। वे सिर्फ़ कन्नड़ के थे।

सहायक कलाकार — जिन्होंने फ़िल्म को और गहरा बनाया

R. नागेंद्र राव ने षड्यंत्रकारी दलवाई विक्रमराय का किरदार निभाया — वो villain जिसमें एक ठंडी, हिसाबी क्रूरता है। उनकी आँखों में वो भाव है जो बताता है — यह इंसान सत्ता के लिए कुछ भी कर सकता है।

लीलावती ने फ़िल्म में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे उस दौर की कन्नड़ सिनेमा की प्रमुख अभिनेत्रियों में से एक थीं।

K.S. अश्वथ और T.R. नरसिम्हाराजू ने अपने किरदारों में जो comic और human touch दिया, वो फ़िल्म को एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ से बाहर निकालकर एक जीती-जागती कहानी बना देता है।

और Udaykumar — जो राजकुमार, कल्याण कुमार के साथ कन्नड़ सिनेमा के “कुमार त्रयारु” (तीन कुमार) में से एक माने जाते थे — उन्होंने विश्वनाथ शास्त्री का किरदार निभाया।

G.K. Venkatesh का संगीत — जो फ़िल्म की आत्मा बना

रणधीर कंठीरव का संगीत उस फ़िल्म का सबसे underrated पहलू है।

G.K. Venkatesh ने जो धुनें बनाईं — “संगीत देवते”, “कन्नड़ विजय मुड़ी कंठीरव”, “एनिदु रोष वीरावेश” — इनमें एक royal grandeur है। P.B. Srinivas की आवाज़ में जब ये गाने बजते हैं तो लगता है जैसे किसी दरबार में बैठे हों।

“कबीना बिल्लनु” जैसा छोटा-सा गाना भी फ़िल्म में एक ख़ास क्षण बनाता है। और instrumental theme music — वो आज भी उतना ही ताक़तवर लगता है जितना 1960 में रहा होगा।

वो बात जो इस फ़िल्म को अलग करती है — आज भी

रणधीर कंठीरव एक ऐसी फ़िल्म है जो अपने दौर से आगे की सोच के साथ बनाई गई थी।

जब ज़्यादातर ऐतिहासिक फ़िल्में किसी राजा को सिर्फ़ एक glamorous hero की तरह पेश करती थीं — इस फ़िल्म ने कंठीरव को एक इंसान की तरह दिखाया। एक युवा जो डरता भी है, जो माँ की सलाह पर निर्भर रहता है, जो धीरे-धीरे अपनी ताक़त पहचानता है।

और सबसे बड़ी बात — फ़िल्म की प्रामाणिकता। मैसूर पैलेस के असली दस्तावेज़ों को आधार बनाना, उस दौर के पहनावे, दरबारी शिष्टाचार और युद्ध की तकनीकों को जितना हो सके सच्चाई से पेश करने की कोशिश — यह उस ज़माने में बड़ी बात थी।

IMDb पर इस फ़िल्म की rating है 8.5 — और यह rating उन लोगों ने दी है जिन्होंने इसे दशकों बाद भी देखा और प्रभावित हुए।

Raajmata

आज के दर्शक के लिए यह फ़िल्म क्या मायने रखती है?

अगर आप कभी कन्नड़ सिनेमा के इतिहास को समझना चाहते हैं — उसकी जड़ों को, उस नींव को जिस पर आज का सैंडलवुड खड़ा है — तो रणधीर कंठीरव देखना ज़रूरी है।

इस फ़िल्म को इसलिए न देखें कि यह क्लासिक है। इसलिए देखें कि इसमें एक सच्ची कहानी है। एक ऐसे राजा की कहानी जो कुश्ती के अखाड़े में अजेय था, जिसने षड्यंत्रों से भरे दरबार में अपनी जगह बनाई, जिसने अपने नाम का सिक्का चलाया, और जो कन्नड़ लोककथाओं में आज भी ज़िंदा है।

और एक ऐसे अभिनेता की कहानी जिसने — डॉ. राजकुमार ने — उस राजा को इतनी सच्चाई से जीया कि दोनों एक हो गए।

अंत में

इतिहास की किताबें राजाओं की तारीख़ें और उपाधियाँ तो बता देती हैं। लेकिन एक अच्छी फ़िल्म वो काम करती है जो किताब नहीं कर सकती — वो राजा को एक इंसान बना देती है।

रणधीर कंठीरव ने यही किया।

मैसूर के उस राजा को — जो कुश्ती में अजेय था, जो युद्ध में अपराजित था, जिसका नाम आज भी सोने के सिक्कों पर उकेरा हुआ मिलता है — उसे एक इंसान की तरह, एक बेटे की तरह, एक योद्धा की तरह पर्दे पर जीवित किया।

और यही वजह है कि 65 साल बाद भी यह फ़िल्म याद की जाती है।

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