भारत में सिनेमा सिर्फ तीन घंटे के मनोरंजन का साधन नहीं है; यह एक भावना है, एक उत्सव है, और सच कहें तो यह हमारे जीवन का एक बहुत बड़ा हिस्सा है। जब हम खुश होते हैं, तो हम शादियों में बॉलीवुड के गानों पर नाचते हैं। जब हम पहली बार प्यार में पड़ते हैं, तो हमें हर जगह वायलिन बजते हुए सुनाई देते हैं। और जब दिल टूटता है, तो हम अपने कमरे में बैठकर जगजीत सिंह या अरिजीत सिंह की आवाज़ में अपना दर्द तलाशते हैं।
भारतीय सिनेमा का इतिहास किसी तिलिस्म से कम नहीं है। 1913 में दादा साहब फाल्के की मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ से शुरू हुआ यह सफर आज हॉलीवुड को टक्कर देने वाले पैन-इंडिया (Pan-India) और ग्लोबल सिनेमा तक पहुँच चुका है। 1931 में ‘आलम आरा’ के साथ सिनेमा ने बोलना सीखा, और उसके बाद से जो आवाज़ गूंजी, वह आज तक शांत नहीं हुई है।
इस 100 साल से भी लंबे सफर में बॉलीवुड ने कई रंग देखे हैं। कभी इसने हमें आज़ादी के मायने समझाए, कभी इसने हमें रोमांस करना सिखाया, और कभी इसने समाज की कड़वी सच्चाइयों को बड़े परदे पर उकेरा। आइए, राज कपूर की मासूमियत से लेकर शाहरुख़ खान की बाहें फैलाने वाली अदा तक, बॉलीवुड के इस शानदार और जादुई सफर पर एक गहराई से नज़र डालते हैं।

1. 1940-1950 का दशक: आज़ाद भारत की उम्मीदें और ‘गोल्डन तिकड़ी’
1947 में भारत को अंग्रेज़ों से आज़ादी मिली थी। देश नया था, लोगों की आँखों में एक बेहतर भविष्य के सपने थे, लेकिन साथ ही गरीबी और बेरोजगारी की कड़वी सच्चाई भी थी। इस दौर के सिनेमा ने आम आदमी की इसी जद्दोजहद को परदे पर उतारा। यह वह दौर था जिसे आज भी हिंदी सिनेमा का ‘गोल्डन एरा’ (स्वर्ण युग) कहा जाता है।
इस दौर में तीन सुपरस्टारों ने बॉलीवुड पर राज किया—राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद। इन तीनों का अपना एक अलग अंदाज़ था।
राज कपूर: राज कपूर को भारतीय सिनेमा का ‘शोमैन’ (Showman) कहा जाता है। उन्होंने ‘आवारा’ (1951) और ‘श्री 420’ (1955) जैसी फिल्मों में चार्ली चैपलिन से प्रेरित एक ऐसे आम आदमी का किरदार निभाया, जिसकी जेब खाली थी लेकिन दिल सोने का था। राज कपूर की फिल्में सिर्फ भारत में नहीं, बल्कि सोवियत रूस और मध्य पूर्व में भी ब्लॉकबस्टर साबित हुईं।
दिलीप कुमार और देव आनंद: दिलीप कुमार ने अभिनय में जो गहराई और ठहराव लाए, वे बेमिसाल थे। ‘देवदास’, ‘मधुमती’ और ‘मुगल-ए-आज़म’ जैसी फिल्मों में उनके संजीदा अभिनय के कारण उन्हें ‘ट्रेजेडी किंग’ (Tragedy King) का खिताब मिला। दूसरी तरफ थे देव आनंद, जो अपने कॉलर खड़े करने के स्टाइल, तेज़ी से डायलॉग बोलने और एक बिंदास शहरी बाबू के रूप में युवाओं की धड़कन बन गए थे।
इसी दौर में गुरु दत्त ने ‘प्यासा’ और ‘कागज़ के फूल’ जैसी मास्टरपीस फिल्में बनाईं, जो आज भी दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की लिस्ट में शुमार हैं।
2. 1960 का दशक: ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीन परदे और शम्मी कपूर का डांस
जैसे-जैसे भारत 60 के दशक में पहुँचा, सिनेमा भी बदलने लगा। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्में धीरे-धीरे अपना रंगीन रूप लेने लगीं। यह दशक था कश्मीर की खूबसूरत वादियों का, हिल स्टेशन्स का और सबसे बढ़कर—बेफिक्र रोमांस का।
इस दशक को अगर किसी एक अभिनेता के नाम करना हो, तो वह शम्मी कपूर होंगे। ‘जंगली’ (1961), ‘कश्मीर की कली’ (1964) और ‘तीसरी मंज़िल’ (1966) जैसी फिल्मों में शम्मी कपूर ने नायक की परिभाषा ही बदल दी। वे बर्फ में लेटकर चिल्लाते थे “याहू! चाहे कोई मुझे जंगली कहे”, और दर्शक सिनेमाघरों में तालियां पीटते थे। उनका डांस करने का एक अपना ही आज़ाद और बेतरतीब अंदाज़ था, जिसने उस दौर के युवाओं को अपनी मर्ज़ी से जीना सिखाया।
पहले सुपरस्टार का जन्म: 60 के दशक के बिल्कुल अंत में (1969), ‘आराधना’ फिल्म रिलीज़ हुई और इसी के साथ बॉलीवुड को अपना पहला आधिकारिक सुपरस्टार मिला—राजेश खन्ना। राजेश खन्ना का जादू कुछ ऐसा था कि लड़कियां उनकी सफेद गाड़ी को चूम-चूम कर गुलाबी कर देती थीं, और उनके नाम से खत लिखा करती थीं। उनकी आंखें झपकाने और गर्दन टेढ़ी करने का अंदाज़ पूरे देश का स्टाइल स्टेटमेंट बन गया था।

3. 1970 और 1980 का दशक: सिस्टम से बगावत और ‘एंग्री यंग मैन’ का तूफान
70 के दशक तक आते-आते आज़ाद भारत का वह सुनहरा सपना थोड़ा धुंधला पड़ने लगा था। देश में महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी चरम पर थी। आम आदमी सिस्टम से परेशान था और उसके अंदर एक गहरा गुस्सा पनप रहा था। बॉलीवुड हमेशा समाज का आइना रहा है, इसलिए परदे पर भी अब फूल-पत्तियों वाले रोमांस की जगह एक उबलते हुए गुस्से ने ले ली।
और इस गुस्से को चेहरा दिया सदी के महानायक—अमिताभ बच्चन ने।
लेखक जोड़ी सलीम-जावेद ने ‘ज़ंजीर’ (1973), ‘दीवार’ (1975) और ‘शोले’ (1975) जैसी फिल्मों के ज़रिए एक ऐसा किरदार गढ़ा जो पुलिस और कानून का इंतज़ार नहीं करता था, बल्कि अपने हक के लिए खुद लड़ता था। इसे नाम दिया गया ‘एंग्री यंग मैन’ (Angry Young Man)।
अमिताभ बच्चन की लंबी कद-काठी, उनकी भारी आवाज़ और उनका गुस्सा पर्दे पर इतना असली लगता था कि पूरा देश उनके साथ खड़ा हो गया। ‘शोले’ सिर्फ एक फिल्म नहीं थी, यह एक सांस्कृतिक क्रांति थी। गब्बर सिंह, जय-वीरू और बसंती के डायलॉग्स आज भी लोगों की ज़ुबान पर रटे हुए हैं।
80 के दशक में सिनेमा थोड़ा लड़खड़ाया। वीडियो कैसेट (VCR) के आने से लोग घर में फिल्में देखने लगे थे। इस दौर में डिस्को का क्रेज़ बढ़ा (मिथुन चक्रवर्ती की ‘डिस्को डांसर’), और दक्षिण भारत की रीमेक फिल्मों का बोलबाला रहा। हालांकि, यह दशक कलात्मक दृष्टि से बहुत मज़बूत नहीं माना जाता, लेकिन इसने मनोरंजन के कई नए रास्ते ज़रूर खोले।
4. 1990 का दशक: उदारीकरण, विदेशों में शूटिंग और शाहरुख़ खान का राज
1991 में भारत में आर्थिक उदारीकरण (Economic Liberalization) हुआ। देश के बाज़ार विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिए गए। भारत में एक नया मिडिल क्लास (मध्यम वर्ग) पैदा हो रहा था, जिसके पास पैसा था और जो दुनिया घूमना चाहता था। बॉलीवुड ने इस नब्ज़ को बहुत सही समय पर पकड़ा।
एक्शन और मारधाड़ से थक चुके दर्शकों को 90 के दशक ने फिर से प्यार करना सिखाया। इसी दशक में बॉलीवुड के तीन खानों—आमिर, सलमान और शाहरुख़—का उदय हुआ।
‘कयामत से कयामत तक’ (आमिर खान) और ‘मैंने प्यार किया’ (सलमान खान) ने रोमांस की शानदार वापसी कराई। लेकिन जिस एक फिल्म ने बॉलीवुड की पूरी दिशा ही बदल कर रख दी, वह थी 1995 में आई यश चोपड़ा बैनर की ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ (DDLJ)।
शाहरुख़ खान (राज) और काजोल (सिमरन) की इस फिल्म ने रोमांस को एक नया ग्लोबल रूप दिया। अब हीरो गांव के खेतों में नहीं, बल्कि यूरोप के सरसों के खेतों और लंदन की सड़कों पर रोमांस कर रहा था। शाहरुख़ खान सिर्फ एक अभिनेता नहीं रहे; वे दुनिया भर में फैले एनआरआई (NRI – अप्रवासी भारतीयों) के लिए भारत से जुड़ने का एक इमोशनल पुल बन गए। अपनी बाहें फैलाकर प्यार का इज़हार करने वाले शाहरुख़ ने बॉलीवुड को ग्लोबल मैप पर हमेशा के लिए स्थापित कर दिया।

5. 2000 का दशक: मल्टीप्लेक्स का उदय और कहानियों में प्रयोग
जैसे ही सदी बदली, भारत के सिनेमाघरों का रूप भी बदल गया। सिंगल-स्क्रीन टॉकीज़ की जगह अब बड़े और वातानुकूलित ‘मल्टीप्लेक्स’ (Multiplex) ले रहे थे। मल्टीप्लेक्स में जाने वाले दर्शक थोड़े शहरी थे, और वे घिसी-पिटी फॉर्मूला फिल्मों से कुछ अलग चाहते थे।
फरहान अख्तर की ‘दिल चाहता है’ (2001) ने दोस्तों के बीच की बातचीत और रिश्तों को इतना नैचुरल तरीके से पेश किया, जितना बॉलीवुड में पहले कभी नहीं हुआ था। आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ (2001) ने ऑस्कर की टॉप 5 विदेशी फिल्मों में जगह बनाकर इतिहास रच दिया।
यह दशक प्रयोगों का था। एक तरफ संजय दत्त ने ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ (2003) से गांधीगिरी का पाठ पढ़ाया, तो दूसरी तरफ ‘रंग दे बसंती’ (2006) ने युवाओं के अंदर देश की राजनीति को लेकर एक नई आग पैदा की। इस दशक ने यह साबित कर दिया कि दर्शक अब सिर्फ स्टार्स को नहीं, बल्कि एक अच्छी कहानी को देखने के लिए टिकट खरीद रहे हैं।
6. 2010 से अब तक: ‘कंटेंट इज़ किंग’ और पैन-इंडिया का महासंग्राम
पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड ने अपने सबसे बड़े बदलाव देखे हैं। आज के दर्शक बहुत स्मार्ट हो गए हैं। उनके हाथ में स्मार्टफोन है और ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म्स के ज़रिए वे पूरी दुनिया का बेहतरीन कंटेंट देख रहे हैं। ऐसे में अब कोई भी फिल्म सिर्फ एक बड़े हीरो के नाम पर नहीं चल सकती। आज बॉलीवुड का सबसे बड़ा मंत्र है—’कंटेंट इज़ किंग’ (Content is King)।
इस दशक में आयुष्मान खुराना जैसे अभिनेताओं ने भारत के छोटे शहरों (जैसे बरेली, कानपुर, हरिद्वार) की उन कहानियों को मुख्यधारा में ला खड़ा किया, जिन्हें पहले नज़रअंदाज़ कर दिया जाता था। ‘विक्की डोनर’, ‘बधाई हो’ और ‘अंधाधुन’ जैसी फिल्मों ने साबित किया कि आम आदमी की ज़िंदगी की आम समस्याएं भी ब्लॉकबस्टर हो सकती हैं।
साउथ सिनेमा की चुनौती और बॉलीवुड की वापसी: इसी दशक में बॉलीवुड को दक्षिण भारतीय सिनेमा (टॉलीवुड, कॉलीवुड) से सबसे बड़ी चुनौती मिली। ‘बाहुबली’ (Baahubali), ‘केजीएफ’ (KGF), और ‘आरआरआर’ (RRR) जैसी फिल्मों ने बॉलीवुड के हिंदी गढ़ में घुसकर कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। एक समय ऐसा लगने लगा था कि बॉलीवुड अब खत्म हो रहा है।
लेकिन बॉलीवुड की फितरत ही बाउंस बैक (Bounce Back) करने की है। 2023 में शाहरुख़ खान ने 4 साल के ब्रेक के बाद ‘पठान’ (Pathaan) और ‘जवान’ (Jawan) के साथ जो ऐतिहासिक वापसी की, उसने आलोचकों के मुंह बंद कर दिए। रणबीर कपूर की ‘एनिमल’ (Animal) और सनी देओल की ‘गदर 2’ ने दिखा दिया कि बॉलीवुड का ‘मास’ (Mass) सिनेमा आज भी दर्शकों को थिएटर तक खींचने की पूरी ताकत रखता है।

सिनेमा सिर्फ परदे पर नहीं, हमारे दिलों में चलता है
राज कपूर की ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों से लेकर आज की भारी वीएफएक्स (VFX) वाली एक्शन फिल्मों तक, बॉलीवुड ने एक लंबा और खूबसूरत सफर तय किया है। तकनीक बदल गई है, कैमरे डिजिटल हो गए हैं, गाने रिकॉर्ड करने का तरीका बदल गया है, और हीरो के कपड़े पहनने का अंदाज़ भी बदल गया है।
लेकिन एक चीज़ जो आज भी नहीं बदली है, वह है दर्शकों का सिनेमा के प्रति पागलपन। हम आज भी शुक्रवार का इंतज़ार करते हैं। हम आज भी अंधेरे थिएटर में बैठकर तीन घंटे के लिए अपनी सारी परेशानियां भूल जाना चाहते हैं।
बॉलीवुड ने हमें सपने देखना सिखाया है। इसने हमें सिखाया है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी खराब क्यों न हों, “पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!” अंत में सब कुछ ठीक हो जाता है, और अगर ठीक न हो, तो वह अंत नहीं है। भारतीय सिनेमा की यह 100 साल की यात्रा सिर्फ फिल्मों की यात्रा नहीं है; यह भारत के बदलते समाज, हमारे सपनों और हमारी उम्मीदों का एक जीता-जागता दस्तावेज़ है। और सबसे अच्छी बात यह है कि यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ है!