एडिसन के पेटेंट से भागे दीवाने: कैसे कैलिफ़ोर्निया के एक गाँव ने दुनिया की फ़िल्म राजधानी बनाई

1910 के दशक के कैलिफ़ोर्निया में संतरे के बाग़ों के पास पुराने फ़िल्म कैमरे के साथ खड़े शुरुआती फ़िल्मकार, हॉलीवुड की शुरुआत का दृश्य।

सोचिए, साल है 1909, न्यूयॉर्क के एक तंग कमरे में कुछ लोग चुपचाप एक कैमरा सँभाले खड़े हैं। खिड़कियाँ बंद हैं और पर्दे खिंचे हुए हैं। बाहर गली में कोई भी अजनबी दिखे तो सबकी साँस अटक जाती है। वजह यह नहीं कि वे कोई जुर्म कर रहे हैं। वजह यह है कि वे बिना इजाज़त के फ़िल्म बना रहे हैं। उस दौर में अमेरिका में फ़िल्म बनाने का हक़ एक ताक़तवर कंपनी के पास था, और उसके पीछे था बल्ब वाला मशहूर आविष्कारक थॉमस एडिसन।

आज हम हॉलीवुड को चमक-दमक, रेड कार्पेट और ऑस्कर से जानते हैं। लेकिन इसकी शुरुआत चमक से नहीं, डर, मुक़दमों और जुगाड़ से हुई थी। यह कहानी है उन लोगों की, जिन्होंने एक बंद दरवाज़े के सामने झुकने के बजाय पश्चिम की तरफ़ रुख़ कर लिया।

जब सिनेमा एक “निकल” में मिलता था

पहले यह समझिए कि उस वक़्त सिनेमा क्या था। 1900 के आसपास फ़िल्में मेलों और थिएटरों में एक-दो मिनट के “नज़ारे” की तरह दिखाई जाती थीं। कभी ट्रेन आती हुई, कभी किसी का छींकना।

1900 के दशक के अमेरिका में निकलोडियन थिएटर के बाहर टिकट के लिए कतार में खड़े मज़दूर और प्रवासी परिवार।

फिर 1905 में अमेरिका के पिट्सबर्ग शहर में हैरी डेविस और जॉन हैरिस ने एक छोटी सी दुकान को थिएटर बना दिया। टिकट की क़ीमत थी एक निकल यानी पाँच सेंट। इसी से नाम पड़ा “निकलोडियन”। यह जुगाड़ ऐसा चला कि कुछ ही सालों में अमेरिका भर में हज़ारों निकलोडियन खुल गए। मज़दूर, प्रवासी और बच्चे, सब इनके ग्राहक थे। अंग्रेज़ी न आने वाले प्रवासियों के लिए यह वरदान था, क्योंकि यहाँ भाषा की ज़रूरत ही नहीं थी। परदे पर चलती तस्वीरें सबकी समझ में आती थीं।

जहाँ इतनी भीड़ हो, वहाँ पैसा भी होता है। और जहाँ पैसा हो, वहाँ कब्ज़े की कोशिश भी होती है।

एडिसन ट्रस्ट: जब एक कंपनी ने पूरा सिनेमा बाँध लिया

एडिसन और कुछ दूसरी कंपनियों के पास फ़िल्म कैमरे और प्रोजेक्टर से जुड़े कई पेटेंट थे। सालों तक ये आपस में मुक़दमे लड़ती रहीं। फिर दिसंबर 1908 में इन्होंने समझदारी दिखाई। सबने मिलकर एक साझा संगठन बना लिया, जिसका नाम था मोशन पिक्चर पेटेंट्स कंपनी (MPPC)। लोग इसे सीधे “एडिसन ट्रस्ट” कहते थे।

इसमें एडिसन, बायोग्राफ़, विटाग्राफ़, एसानी, सेलिग, लुबिन, कालेम और फ्रांस की पाथे जैसी कंपनियाँ थीं। कैमरे से लेकर कच्ची फ़िल्म तक, हर चीज़ पर इनका नियंत्रण था। कच्ची फ़िल्म बनाने वाली कंपनी ईस्टमैन कोडक से भी ट्रस्ट ने ख़ास करार कर लिया, ताकि बाहरी लोगों को फ़िल्म का रोल तक न मिले। थिएटर मालिकों को हर हफ़्ते लाइसेंस फ़ीस देनी पड़ती थी, जो उस दौर में लगभग दो डॉलर प्रति हफ़्ता थी। जो नहीं देता, उसे फ़िल्में मिलनी बंद हो जाती हैं।

सोचिए, आज कोई एक कंपनी कहे कि कैमरा, स्टोरेज और थिएटर सब उसी के होंगे, और बाक़ी सब उससे किराए पर लें। ट्रस्ट का इरादा कुछ ऐसा ही था। कहा जाता है कि इस दबदबे को बनाए रखने के लिए उनके एजेंट बिना लाइसेंस वाले फ़िल्मकारों को धमकाते थे और उनके उपकरण तक तोड़ देते थे। इन क़िस्सों में कुछ बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बातें भी होंगी, लेकिन इतना तय है कि स्वतंत्र फ़िल्मकारों के लिए हालात बेहद कठिन थे।

वे “इंडिपेंडेंट्स” जिन्होंने हार नहीं मानी

लेकिन हर दीवार में कोई न कोई दरार होती है। जिन्हें ट्रस्ट ने बाहर रखा, वे “इंडिपेंडेंट्स” कहलाए, और उनमें कुछ बेहद ज़िद्दी लोग थे।

कार्ल लेमली इनमें सबसे रोचक थे। जर्मनी से आए इस प्रवासी ने पहले फ़िल्म दिखाने का कारोबार किया और फिर 1909 में अपनी कंपनी बनाई। उन्होंने ट्रस्ट को खुली चुनौती दी। आगे चलकर यही कंपनी यूनिवर्सल पिक्चर्स बनी।

लेमली की एक चाल आज भी मार्केटिंग की कहानियों में सुनाई जाती है। उस ज़माने में फ़िल्मों के कलाकारों के नाम पर्दे पर नहीं दिखाए जाते थे, ताकि वे मशहूर होकर ज़्यादा पैसे न माँगने लगें। दर्शक बस एक अभिनेत्री को “बायोग्राफ़ की लड़की” कहकर पुकारते थे। यह अभिनेत्री थीं फ़्लोरेंस लॉरेंस। 1910 में लेमली ने उन्हें अपने साथ जोड़ा और अफ़वाह उड़वा दी कि “बायोग्राफ़ की लड़की” की एक हादसे में मौत हो गई है। कुछ दिन बाद उन्होंने अख़बारों में विज्ञापन देकर कहा कि यह झूठी ख़बर थी और वह ज़िंदा हैं और अब उनकी कंपनी की फ़िल्म में आ रही हैं। यह सब एक सोची-समझी तरकीब थी, लेकिन काम कर गई। इसी के साथ हॉलीवुड में “स्टार सिस्टम” की नींव पड़ी।

1909 के न्यूयॉर्क में पर्दे बंद कमरे में चोरी-छिपे फ़िल्म बनाते स्वतंत्र फ़िल्मकार, एडिसन ट्रस्ट के डर का दृश्य।

पश्चिम की ओर: सच और किंवदंती

अब वह मशहूर क़िस्सा, जो हॉलीवुड की शुरुआत के बारे में सबसे ज़्यादा सुनाया जाता है: “एडिसन के गुंडों से बचने के लिए फ़िल्मकार कैलिफ़ोर्निया भाग गए, क्योंकि वहाँ से मेक्सिको की सीमा पास थी।” यह कहानी दिलचस्प है, पर पूरी सच नहीं।

सच थोड़ा उलझा हुआ है। शुरुआत में फ़िल्म उद्योग का केंद्र न्यूयॉर्क और न्यू जर्सी का फ़ोर्ट ली इलाक़ा था, कैलिफ़ोर्निया नहीं। पर कैलिफ़ोर्निया के पास कुछ ऐसी चीज़ें थीं जो पूरब में नहीं थीं। सबसे बड़ी चीज़ थी साल भर की धूप। उस समय कैमरे को भरपूर रोशनी चाहिए थी, और ज़्यादातर शूटिंग खुले में या शीशे की छत वाले स्टूडियो में होती थी। पूरब के कड़ाके की ठंड और बारिश वाले महीनों में काम ठप हो जाता था। दूसरी चीज़ थी विविधता। एक ही इलाक़े में समुद्र, रेगिस्तान, पहाड़ और जंगल मिल जाते थे। पश्चिमी फ़िल्म बनानी हो या रोमांटिक कहानी, लोकेशन आसपास ही मिल जाती थी। तीसरी चीज़ थी सस्ती ज़मीन और सस्ते मज़दूर।

और हाँ, दूरी का फ़ायदा भी था। एडिसन के वकील और एजेंट हज़ारों किलोमीटर दूर पूरब में थे। लॉस एंजेलिस में उनकी पकड़ कमज़ोर थी। तो ट्रस्ट से बचना असली वजहों में से एक ज़रूर था, पर अकेली वजह नहीं।

शुरुआती क़दम भी ट्रस्ट के बाहर वालों के नहीं, बल्कि उसके सदस्यों के ही थे। सेलिग कंपनी ने 1907 के आसपास लॉस एंजेलिस में शूटिंग की। 1910 में मशहूर निर्देशक डी. डब्ल्यू. ग्रिफ़िथ अपनी बायोग्राफ़ टीम को लेकर सर्दियों में कैलिफ़ोर्निया आए और वहाँ “इन ओल्ड कैलिफ़ोर्निया” बनाई। इसे हॉलीवुड नाम के छोटे से गाँव में शूट हुई पहली फ़िल्म माना जाता है। उस समय हॉलीवुड सचमुच एक शांत गाँव था, जहाँ संतरे के बाग़ और धूल भरी सड़कें थीं।

फिर 1913-14 में सेसिल बी. डेमिल, जेसी लास्की और सैमुअल गोल्डफ़िश (जो बाद में सैमुअल गोल्डविन कहलाए) ने हॉलीवुड में एक अस्तबल किराए पर लिया और वहीं अपनी फ़िल्म “द स्क्वॉ मैन” बनाई। यह हॉलीवुड की पहली फ़ीचर-लेंथ फ़िल्मों में गिनी जाती है। एक अस्तबल से शुरू हुई कंपनी आगे चलकर पैरामाउंट का हिस्सा बनी।

ट्रस्ट की हार

इधर पूरब में ट्रस्ट अपनी ही ज़िद में उलझ रहा था। एक तरफ़ वह छोटी-छोटी रील वाली फ़िल्मों पर अड़ा रहा, जबकि दर्शक अब लंबी कहानियाँ देखना चाहते थे। यूरोप से आई लंबी फ़िल्मों ने साबित कर दिया था कि लोग दो घंटे बैठने को तैयार हैं। दूसरी तरफ़ एडोल्फ़ ज़ुकर जैसे लोग “फ़ेमस प्लेयर्स” जैसी कंपनियाँ बनाकर बड़े नाम वाले कलाकारों की पूरी-पूरी फ़िल्में पेश कर रहे थे।

क़ानून भी ट्रस्ट के ख़िलाफ़ मुड़ गया। अमेरिकी सरकार ने इस पर एकाधिकार विरोधी क़ानून (शर्मन एंटीट्रस्ट एक्ट) के उल्लंघन का मुक़दमा दायर किया। 1915 में निचली अदालत ने फ़ैसला सरकार के हक़ में दिया और 1918 तक ट्रस्ट का दौर लगभग ख़त्म हो चुका था। जिस चीज़ को बचाने के लिए इतनी दीवारें खड़ी की गई थीं, वह अंदर से ही खोखली हो चुकी थी।

सितारों का दौर: जब चेहरे बिकने लगे

ट्रस्ट के गिरते ही हॉलीवुड में जो आया, वह था सितारों का ज़माना। अब दर्शक कहानी से ज़्यादा चेहरों के दीवाने थे।

मैरी पिकफ़ोर्ड कनाडा से आई थीं और लोग उन्हें “अमेरिका की प्यारी” कहते थे। पर वह सिर्फ़ चेहरा नहीं थीं। वह बेहद तेज़ कारोबारी थीं, जो अपनी फ़िल्मों के अनुबंध पर बारीकी से मोल-भाव करती थीं।

चार्ली चैप्लिन इंग्लैंड की ग़रीबी से निकले थे। 1914 में उन्होंने कीस्टोन कंपनी से शुरुआत की। कुछ ही साल में उनकी माँग इतनी बढ़ गई कि 1916-17 तक वे दस लाख डॉलर के अनुबंध की बात कर रहे थे। उस ज़माने में यह रक़म अविश्वसनीय थी। उनका बिना बोले हँसाना और रुलाना दुनिया की हर भाषा में समझ आता था।

1919 में एक और ऐतिहासिक फ़ैसला हुआ। मैरी पिकफ़ोर्ड, चैप्लिन, डगलस फ़ेयरबैंक्स और डी. डब्ल्यू. ग्रिफ़िथ ने मिलकर यूनाइटेड आर्टिस्ट्स कंपनी बनाई। कहते हैं कि इस पर एक स्टूडियो अधिकारी ने तंज़ कसा था कि “पागल लोग अब पागलख़ाने के मालिक बन गए हैं।” पर यह पागलपन नहीं था। यह उन कलाकारों की बग़ावत थी जो नहीं चाहते थे कि कोई और उनकी कला की क़ीमत तय करे।

हॉलीवुड के एक पुराने अस्तबल में बना शुरुआती फ़िल्म स्टूडियो, जहाँ से अमेरिकी फ़ीचर फ़िल्मों का नया दौर शुरू हुआ।

पर्दे के पीछे की दुनिया: वे नाम जो भुला दिए गए

हॉलीवुड की चमक में कई ऐसे लोग खो गए जिनके बिना यह सब मुमकिन ही नहीं था।

एलिस गाय-ब्लाशे को अक्सर दुनिया की पहली महिला फ़िल्म निर्देशकों में गिना जाता है। उन्होंने फ़्रांस में कहानी वाली फ़िल्में बनाईं और बाद में अमेरिका में “सोलैक्स” नाम का स्टूडियो चलाया। पर इतिहास की किताबों ने उनका नाम लंबे समय तक दबाए रखा।

लोइस वेबर उस दौर की सबसे कामयाब निर्देशकों में थीं और समाज के मुद्दों पर फ़िल्में बनाती थीं। फ़्रांसेस मैरियन ने पटकथा लेखन में बड़ा नाम कमाया। सिनेमा के शुरुआती सालों में महिलाएँ पर्दे के पीछे भी काफ़ी सक्रिय थीं, जो बाद के दशकों में लगभग ग़ायब हो गया।

और वे अनगिनत पियानो वादक और ऑर्केस्ट्रा के कलाकार, जिनके बिना “मूक” फ़िल्म कभी मूक थी ही नहीं। हर शो में साथ बजता संगीत ही दर्शकों को डराता, हँसाता और रुलाता था। “साइलेंट सिनेमा” नाम असल में बहुत ग़लत है। वह शोर से भरा हुआ था।

एक दाग़ जिसे भूलना ठीक नहीं

इस दौर की बात हो और “द बर्थ ऑफ़ अ नेशन” (1915) का ज़िक्र न हो, तो कहानी अधूरी रहेगी। ग्रिफ़िथ की इस फ़िल्म ने कैमरे के काम, संपादन और कहानी कहने के तरीक़े में नई मिसालें क़ायम कीं। लेकिन इसकी कहानी नस्लवादी थी और उसमें अश्वेत लोगों को बेहद अपमानजनक ढंग से दिखाया गया था। इतिहासकार मानते हैं कि इस फ़िल्म ने अमेरिका में कू क्लक्स क्लान जैसे नस्लवादी संगठन को फिर से ताक़त दी। यह हमें याद दिलाता है कि सिनेमा की तकनीक जितनी आगे बढ़ी, उसकी ज़िम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ी।

जब फ़िल्मों ने बोलना सीखा

1927 में वार्नर ब्रदर्स की “द जैज़ सिंगर” आई, जिसमें कुछ हिस्सों में आवाज़ें और गाने थे। इसे पहली सफल “टॉकी” फ़िल्मों में गिना जाता है। कुछ ही सालों में मूक फ़िल्मों का दौर ख़त्म हो गया। कई मशहूर सितारों का करियर भी इसके साथ थम गया, क्योंकि कुछ की आवाज़ें माइक्रोफ़ोन पर वैसी नहीं जँचीं जैसी उनकी छवि थी।

भारत में यही बदलाव कुछ साल बाद आया। दादासाहेब फाल्के की “राजा हरिश्चंद्र” 1913 में बनी थी, यानी हॉलीवुड के उभार के लगभग उसी दौर में। और 1931 में “आलम आरा” ने हमारे सिनेमा को आवाज़ दी। दुनिया के दो कोनों में, अलग-अलग हालात में, सिनेमा एक जैसे रास्ते से गुज़र रहा था।

पुराने तहख़ाने में धूल भरे डिब्बों में रखी क्षतिग्रस्त नाइट्रेट फ़िल्म की रील, खो चुकी मूक फ़िल्मों का प्रतीक।

जो हमेशा के लिए खो गया

इस पूरी कहानी का सबसे दुखद हिस्सा यह है कि हम इसका बड़ा हिस्सा आज देख ही नहीं सकते। 2013 में अमेरिका की लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका में बनीं लगभग 70 प्रतिशत मूक फ़ीचर फ़िल्में पूरी तरह खो चुकी हैं। बहुत कम फ़िल्में अपने मूल 35 मिमी रूप में बची हैं।

क्यों? उस दौर की फ़िल्में नाइट्रेट नाम की चीज़ पर बनती थीं, जो बेहद ज्वलनशील थी और आसानी से जल जाती थी। और उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि ये फ़िल्में “विरासत” हैं। स्टूडियो पुरानी फ़िल्मों को कूड़ा समझकर फेंक देते थे, या उनमें मौजूद चाँदी निकालने के लिए उन्हें गला देते थे। गोदामों में आग लगती रही और रीलें राख होती रहीं।

आज कई फ़िल्में तहख़ानों, निजी संग्रहों और दूर देशों के पुराने डिब्बों से अचानक मिल भी जाती हैं। हर खोज एक छोटा चमत्कार होती है।

आख़िर में

हॉलीवुड की कहानी अक्सर चमकदार सितारों की कहानी की तरह सुनाई जाती है। पर असल में यह किसी एकाधिकार के ख़िलाफ़ खड़े हुए छोटे लोगों की कहानी है, जिन्होंने पश्चिम के एक धूल भरे गाँव में अपना नया संसार बसाया। उनके पास न बड़े स्टूडियो थे, न सुरक्षा। पर उनके पास ज़िद थी, और यह यक़ीन कि कहानियों को किसी कंपनी के दायरे में क़ैद नहीं किया जा सकता।

अगली बार जब आप कोई पुरानी मूक फ़िल्म देखें, तो परदे के पीछे छिपी उस लड़ाई को याद कीजिएगा। हर टिमटिमाती तस्वीर के पीछे कोई ऐसा इंसान था जिसने कहा था: “मैं यह फ़िल्म बनाऊँगा, चाहे क़ीमत कुछ भी हो।”

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