Serge (1960) रिव्यू: एक बच्चे की नज़र से देखी गई सोवियत दुनिया

बच्चों की नज़र से कहानी

पाँच साल का एक बच्चा अपनी माँ को किसी अजनबी के साथ देखता है, और घर में एक नया आदमी आ जाता है। बच्चे के लिए इसका मतलब सिर्फ़ इतना है कि उसकी दुनिया की जगह किसी और ने ले ली है। इसी सीधी-सादी बात से 1960 की सोवियत फ़िल्म सेर्योझा (Seryozha) शुरू होती है।

अंग्रेज़ी में इसे Serge, A Summer to Remember और Splendid Days भी कहा जाता है। सत्तर मिनट की ये फ़िल्म न बड़े डायलॉग सुनाती है, न बड़ा ड्रामा रचती है। फिर भी इसके कुछ हिस्से देखने वाले के भीतर बहुत देर तक टिके रहते हैं।

फ़िल्म का बुनियादी परिचय

फ़िल्म का निर्देशन जॉर्जी दानेलिया और इगोर तालांकिन ने किया था, और दोनों की ये पहली फ़ीचर फ़िल्म थी। इसे मोसफ़िल्म ने बनाया। कहानी वेरा पनोवा के 1955 के उपन्यास सेर्योझा पर आधारित है। मुख्य भूमिकाओं में बोरिस बारखातोव, सर्गेई बोंदारचुक और इरीना स्कोबत्सेवा हैं। सिनेमैटोग्राफ़ी अनातोली नितोचकिन की है और संगीत बोरिस चाइकोव्स्की का।

फ़िल्म जुलाई 1960 में कार्लोवी वारी फ़िल्म फ़ेस्टिवल में दिखाई गई और अगस्त 1960 में सोवियत संघ में रिलीज़ हुई। बाद में अमेरिका पहुँचकर इसने आलोचकों का ध्यान खींचा। TCM के रिकॉर्ड के अनुसार 1961 में नेशनल बोर्ड ऑफ़ रिव्यू ने इसे उस साल की पाँच सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा की फ़िल्मों में गिना, और न्यूयॉर्क टाइम्स के आलोचकों ने इसे दस बेहतरीन विदेशी फ़िल्मों में जगह दी। IMDb पर इसकी रेटिंग 7.7 है।

बच्चे की नज़र

कहानी: बिना ज़्यादा खोले

सेर्योझा अपनी माँ मार्याना के साथ एक छोटे प्रांतीय कस्बे में रहता है। माँ विधवा है। एक दिन वो दोबारा शादी कर लेती है, और घर में दिमित्री कोरोस्तेल्योव आ जाता है। सेर्योझा उसे “पापा” नहीं कहता, बल्कि उसके सरनेम से बुलाता है।

यहीं कहानी का सबसे अच्छा मोड़ है। आम तौर पर ऐसे किस्सों में सौतेला बाप या तो खलनायक होता है या फ़रिश्ता। यहाँ ऐसा कुछ नहीं होता। शुरू में बच्चा उस पर भरोसा नहीं करता, पर कोरोस्तेल्योव तोहफ़ों और नरमी से धीरे-धीरे उसका दिल जीत लेता है। और वो बच्चे को बच्चा समझकर टालता नहीं, एक इंसान की तरह उसकी बात सुनता है। यही रिश्ता फ़िल्म की धुरी है।

फिर घर में एक नया बच्चा आता है। सेर्योझा बीमार पड़ जाता है। सर्दियों में कोरोस्तेल्योव का तबादला किसी दूर-दराज़ इलाक़े में हो जाता है, और तय होता है कि कमज़ोर सेहत की वजह से बच्चा गर्मियों तक मौसी के पास रहेगा। बाक़ी कहानी इसी बात के इर्द-गिर्द घूमती है कि एक बच्चे को अपने अकेले छूट जाने का डर कैसे महसूस होता है। अंत में कोरोस्तेल्योव जो फ़ैसला करता है, वो फ़िल्म का भावनात्मक शिखर है। उसे मैं यहाँ नहीं खोलूँगा।

बोरिस बारखातोव: फ़िल्म की असली जान

बच्चों से अभिनय करवाना दुनिया के किसी भी सिनेमा में मुश्किल काम रहा है। Letterboxd पर एक समीक्षक ने लिखा है कि छह साल के बोरिस बारखातोव की अदाकारी में स्वाभाविकता है, और ये बात फ़िल्म देखकर आसानी से समझ आती है।

सेर्योझा जो कुछ करता है, उसमें कोई बनावट नहीं दिखती। वो गुस्सा भी करता है, अकड़ भी दिखाता है, और अपनी छोटी-सी दुनिया में बड़ों की तरह गंभीर भी रहता है। एक जगह की एक कल्पना के बारे में बताया जाता है, जिसमें वो सोचता है कि अगर वो मर जाए तो माँ और कोरोस्तेल्योव रोएँगे और पछताएँगे कि उसे साथ क्यों नहीं ले गए। ये बच्चों वाला तर्क है। मासूम भी और थोड़ा डरावना भी। ऐसे लम्हे किसी स्क्रिप्ट से नहीं, बल्कि बच्चे को देखकर, समझकर फ़िल्माने से आते हैं।

सर्गेई बोंदारचुक: एक शांत, मज़बूत पिता

कोरोस्तेल्योव का किरदार निभाने वाले सर्गेई बोंदारचुक बाद में सोवियत सिनेमा के बड़े नामों में गिने गए। IMDb की ट्रिविया के मुताबिक़ इस भूमिका के लिए पहले किसी और अभिनेता को बुलाया गया था, पर स्टूडियो की कलात्मक परिषद ने उसे मंज़ूर नहीं किया और बोंदारचुक का नाम सुझाया। नए निर्देशकों को शक था कि इतना नामी अभिनेता एक डेब्यू फ़िल्म में काम करने को राज़ी होगा या नहीं, पर स्क्रिप्ट पढ़ने के बाद बोंदारचुक ने ख़ुद हाँ कह दी।

ये कास्टिंग सही साबित हुई। कोरोस्तेल्योव कोई नाटकीय हीरो नहीं है। वो एक सीधा-सादा, ज़िम्मेदार आदमी है, जो सामूहिक फ़ार्म के काम में लगा रहता है और घर आकर एक बच्चे के सवालों का जवाब देता है। बोंदारचुक उसे चुपचाप निभाते हैं, बिना आवाज़ ऊँची किए। पिता होने का एक पूरा नक़्शा उनके हाव-भाव से बनता है।

माँ और घर

इरीना स्कोबत्सेवा ने मार्याना का किरदार निभाया है। माँ दो पाटों के बीच फँसी है। एक तरफ़ नई शादी और नया परिवार, दूसरी तरफ़ पहला बेटा, जो चुपचाप सब देख रहा है। फ़िल्म उसे किसी की ग़लती नहीं ठहराती। वो सिर्फ़ इतना दिखाती है कि बड़े जब अपनी ज़िंदगी सँवारते हैं, तो बच्चे की ज़मीन हिल सकती है।

सहायक कलाकार भी कहानी को भरपूर सहारा देते हैं। सेर्योझा के दोस्त वास्का (सेर्गेई मेतेलित्सिन) और झेन्का (यूरी कोज़लोव), लीदका (नतालिया चेच्योतकिना), अंकल कोस्त्या (वासिली मेर्कुरेव) और आंटी पाशा (अलेक्सान्द्रा पनोवा) उस कस्बे को ज़िंदा बनाते हैं जिसमें ये कहानी घटती है।

सोवियत फ़िल्म रिव्यू

कैमरा, संगीत और खाली जगहें

अनातोली नितोचकिन की सिनेमैटोग्राफ़ी की तारीफ़ कई समीक्षकों ने की है। Letterboxd पर एक समीक्षक ने उसे “गहराई और अर्थ से भरी तस्वीरों” वाला काम बताया है। बच्चे की ऊँचाई से खींचे गए दृश्य इस फ़िल्म की सबसे बड़ी ताक़त हैं। बड़ों की दुनिया ऊपर से दिखती है, और खिड़कियाँ, दरवाज़े, खेत, सब कुछ बच्चे के नज़रिए से बड़ा लगता है।

बोरिस चाइकोव्स्की का संगीत ज़्यादा शोर नहीं करता। वो भावनाओं को उभारता है, थोपता नहीं। कहीं-कहीं पूरी ख़ामोशी है, और वही ख़ामोशी कई बार संवाद से ज़्यादा कहती है। कुछ दर्शकों ने ये भी बताया है कि पुरानी कॉपियों में आवाज़ की क्वालिटी कमज़ोर है और फ़िल्म थोड़ी दानेदार दिखती है। ये कमी तकनीकी है, कहानी की नहीं।

सोवियत दुनिया, जो पर्दे के पीछे है

फ़िल्म का नाम भले “सोवियत” हो, पर ये किसी प्रचार-फ़िल्म जैसी नहीं लगती। IMDb के एक दर्शक ने लिखा है कि इसमें राजनीतिक रंग हो सकता है, पर ये उपदेश देने वाली नहीं है।

कहानी का सामाजिक ताना-बाना फिर भी वहीं है। कोरोस्तेल्योव एक सामूहिक फ़ार्म (कोलख़ोज़) से जुड़ा है, और उसका एक जगह से दूसरी जगह तबादला होना उस दौर की व्यवस्था का हिस्सा है। उपन्यास की समीक्षाएँ बताती हैं कि वेरा पनोवा ने ग्रामीण सोवियत ज़िंदगी को काफ़ी सूखी और तंगी वाली दिखाया है, जहाँ पैसा और मौक़े दोनों कम थे। फ़िल्म इस पृष्ठभूमि को नारे बनाकर नहीं दिखाती, बल्कि बच्चे की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घुला देती है।

पनोवा ने ख़ुद कहा था कि उन्हें एक बच्चे की आत्मा का अनुभव हुआ, और उसी से सेर्योझा पैदा हुआ। शायद इसी वजह से ये कहानी किसी विचारधारा से ज़्यादा एक बच्चे के भावनात्मक सच पर टिकी है।

इतिहास के लिहाज़ से भी ये दौर दिलचस्प है। स्तालिन के बाद का समय था, जब सोवियत कलाकारों को निजी और घरेलू कहानियों पर काम करने की थोड़ी और छूट मिलने लगी थी। इसी दौर में ऐसी नरम, मानवीय फ़िल्में सामने आईं।

कमज़ोरियाँ और आलोचना

हर फ़िल्म की तरह इसमें भी कुछ सवाल हैं। एक Letterboxd समीक्षक ने कहा कि ये फ़िल्म कहानी के स्तर पर कोई नई ज़मीन नहीं तोड़ती। सौतेले बाप और बच्चे के रिश्ते पर बनी कहानियाँ पहले भी आई हैं। पर उसी समीक्षक के मुताबिक़ यही इसकी ख़ासियत भी है, क्योंकि फ़िल्म कुछ नया साबित करने की कोशिश ही नहीं करती।

सबकी राय एक जैसी भी नहीं थी। Esquire के मशहूर अमेरिकी आलोचक डवाइट मैकडोनल्ड को ये फ़िल्म बिल्कुल पसंद नहीं आई और उन्होंने इसे शौक़िया दर्जे का काम कहकर ख़ारिज कर दिया। यानी कोई भी क्लासिक सबके लिए क्लासिक नहीं होती।

रफ़्तार भी कहीं-कहीं धीमी लग सकती है। जो दर्शक तेज़ कहानी और मोड़ों के आदी हैं, उन्हें शुरू में ये फ़िल्म ठहरी हुई लगेगी। पर जो थोड़ा ठहरकर देखते हैं, उन्हें वही धीमापन अपनी तरफ़ खींचता है।

आज इसे क्यों देखा जाना चाहिए

इसका जवाब बहुत सीधा है। सेर्योझा का डर, यानी “मुझे पीछे छोड़ दिया जाएगा”, आज भी उतना ही असली है, जितना 1960 में था। भाषा, देश और दौर बदल जाते हैं, पर बचपन की बेचैनी नहीं बदलती।

अगर आप माता-पिता हैं, तो ये फ़िल्म एक आईना है। बच्चे के सवालों को हल्के में लेना कितनी आसानी से हो जाता है, और उन्हें गंभीरता से सुनना कितना बड़ा फ़र्क़ डाल देता है, ये बात यहाँ बिना भाषण के समझ आती है। अगर आप सिनेमा के विद्यार्थी हैं, तो दानेलिया की शुरुआत देखिए। वही दानेलिया जिन्होंने आगे चलकर मिमिनो और ऑटम मैराथन जैसी फ़िल्में बनाईं, इस फ़िल्म से अपने सफ़र पर निकले थे। और अगर आप बस अच्छी, सादी, दिल को छूने वाली कहानी ढूँढ रहे हैं, तो सत्तर मिनट की ये फ़िल्म आपके समय की क़ीमत वसूल कर देगी।

(यहाँ अपनी राय जोड़ें: आपको फ़िल्म कैसी लगी, और किसी करीबी रिश्ते की याद आई या नहीं।)

पेरेंटिंग और रिश्ते फ़िल्में

कुछ सवाल जो अक्सर पूछे जाते हैं

Seryozha (1960) किस भाषा की फ़िल्म है?
ये रूसी भाषा की सोवियत फ़िल्म है। इसे मोसफ़िल्म ने बनाया था।

Seryozha का दूसरा नाम क्या है?
इसे Serge, A Summer to Remember और Splendid Days भी कहा जाता है।

फ़िल्म किस किताब पर आधारित है?
वेरा पनोवा के 1955 के उपन्यास सेर्योझा पर, जो लेनिनग्राद में प्रकाशित हुआ था।

क्या ये बच्चों की फ़िल्म है?
ये बच्चे की नज़र से कही गई है, पर इसकी भावनाएँ बड़ों के लिए ज़्यादा गहरी हैं। पूरा परिवार साथ बैठकर देख सकता है।

फ़िल्म कितनी लंबी है?
लगभग 76 से 80 मिनट। अलग-अलग स्रोतों में थोड़ा फ़र्क़ मिलता है।

फ़िल्म कहाँ देखें?
स्ट्रीमिंग की उपलब्धता बदलती रहती है। किसी भी सेवा पर देखने से पहले JustWatch जैसी साइट या MUBI और Letterboxd जैसे प्लेटफ़ॉर्म पर जाँच लें।

आख़िरी बात

सेर्योझा इसलिए याद रह जाती है कि वो एक बच्चे को गंभीरता से लेती है। बड़ों की दुनिया के बीच पाँच साल के एक इंसान की भावनाएँ भी उतनी ही असली होती हैं, और फ़िल्म यही बात बिना शोर के कह देती है।

बच्चे की नज़र से देखी गई सोवियत दुनिया आख़िर में सोवियत नहीं रहती। वो हर उस घर की दुनिया बन जाती है, जहाँ कोई छोटा बच्चा दरवाज़े पर खड़ा होकर सोच रहा हो कि उसे साथ ले जाया जाएगा या नहीं।

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