ओड़िया सिनेमा की जड़ें: 1936 की पहली फिल्म ‘सीता विवाह’ से आज तक का सफर

Movie Nurture: ओड़िया सिनेमा की जड़ें: 1936 की पहली फिल्म ‘सीता विवाह’ से आज तक का सफर

ओड़िया सिनेमा की कहानी 1936 में बनी पहली फिल्म ‘सीता विवाह’ से शुरू होती है और आज तक यह यात्रा संघर्ष, पहचान, रचनात्मकता और नए प्रयोगों से भरी रही है। यह सिर्फ फिल्मों का इतिहास नहीं, बल्कि ओडिशा की सांस्कृतिक चेतना और भाषा संघर्ष की कहानी भी है।​

ओड़िया सिनेमा की शुरुआत और ‘सीता विवाह’

ओड़िया सिनेमा का जन्म 28 अप्रैल 1936 को हुआ, जब पहली पूर्ण लंबाई की ओड़िया फिल्म ‘सीता विवाह’ पुरी के लक्ष्मी टॉकीज में रिलीज़ हुई। इस फिल्म का निर्देशन थिएटर और रामलीला से जुड़े कलाकार मोहन सुन्दर देब गोस्वामी ने किया था, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद व्यक्तिगत संपत्ति गिरवी रखकर फिल्म का निर्माण किया।​

‘सीता विवाह’ की कहानी रामायण पर आधारित थी और राम–सीता के विवाह प्रसंग को केंद्र में रखती थी, जो उस समय के दर्शकों की धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक भावनाओं से गहराई से जुड़ती थी। लगभग दो घंटे की इस फिल्म का बजट लगभग 30 हजार रुपये था और इसे कोलकाता के काली स्टूडियो में शूट किया गया, क्योंकि उस समय ओडिशा में कोई तकनीकी फिल्म इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध नहीं था।​

Movie Nurture:ओड़िया सिनेमा की जड़ें: 1936 की पहली फिल्म ‘सीता विवाह’ से आज तक का सफर

‘सीता विवाह’ की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अहमियत

1936 वही वर्ष था जब ओडिशा को भाषाई आधार पर एक अलग प्रांत का दर्जा मिला, और उसी महीने के भीतर ‘सीता विवाह’ का बनना ओड़िया पहचान के उभार का प्रतीक बन गया। यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं थी, बल्कि यह संदेश थी कि ओड़िया भाषा और संस्कृति अपनी अलग सिनेमाई अभिव्यक्ति के साथ खड़ी हो सकती है।​

फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल रही, पुरी और कटक के सिनेमाघरों के साथ–साथ घूम–घूम कर लगने वाले टूरिंग सिनेमा शो में भी इसे भारी भीड़ मिली। सीमित प्रिंट्स, तकनीकी चुनौतियों और प्रचार संसाधनों की कमी के बावजूद फिल्म की लोकप्रियता ने यह साबित कर दिया कि ओड़िया भाषा की फिल्मों के लिए एक मजबूत दर्शक वर्ग मौजूद है।​

शुरुआती संघर्ष: 1936 से 1949 का लंबा अंतराल

‘सीता विवाह’ की सफलता के बावजूद अगली ओड़िया फिल्म बनने में लगभग 13 साल लग गए, और 1949 में ‘ललिता’ के रूप में दूसरी ओड़िया फिल्म रिलीज़ हुई। इस लंबे गैप के पीछे मुख्य कारण वित्तीय संसाधनों की कमी, तकनीकी सुविधाओं का अभाव और वितरण–प्रदर्शन की सीमित व्यवस्था थी, जिसकी वजह से नियमित फिल्म निर्माण संभव नहीं हो पाता था।​

1940 के दशक में कुछ प्रयास हुए, लेकिन संगठित स्तर पर उद्योग जैसा ढांचा नहीं बन पाया, जिसके कारण ओड़िया फिल्मों को निरंतर उत्पादन की राह पकड़ने में समय लगा। इसके बावजूद थिएटर, लोकनाट्य और कीर्तन परंपरा में सक्रिय कलाकार आने वाले वर्षों में सिनेमा की नींव मजबूत करने वाले स्तंभ साबित हुए।​

1950 का दशक: पुनर्जागरण और स्थिरता की ओर

1950 के दशक में ओड़िया सिनेमा ने धीरे–धीरे पुनर्जीवन की राह पकड़ी और इस दशक में सालाना आधार पर कई फिल्मों का निर्माण संभव हुआ। ‘अमारी गांव झिअ’ (1953) और ‘केदार गौरी’ (1954) जैसी फिल्मों ने ग्रामीण जीवन, लोककथाओं और सामाजिक रिश्तों को परदे पर लाकर ओड़िया सिनेमा को सिर्फ पौराणिक कथाओं तक सीमित रहने से बचाया।​

तकनीकी स्तर पर कैमरा, साउंड और एडिटिंग में सुधार के साथ–साथ संगीत और अभिनय में भी नए प्रयोग हुए, जिससे ओड़िया फिल्मों की कलात्मक गुणवत्ता बढ़ने लगी। इसी दौर में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर ओड़िया फिल्मों को कुछ आलोचनात्मक सराहना भी मिलने लगी, जिसने आगे के दशकों के लिए मजबूत आधार तैयार किया।​

सहकारी पहल और 1960 के दशक का विस्तार

1958 में ओड़िया सिनेमा में पहली सहकारी पहल शुरू हुई, जिसमें स्थानीय कलाकारों, तकनीशियनों और निवेशकों ने मिलकर प्रोडक्शन का मॉडल खड़ा करने की कोशिश की। इससे निजी पूंजी पर निर्भरता कुछ हद तक कम हुई और क्षेत्रीय स्तर पर फिल्मों के निर्माण की रफ्तार बढ़ने लगी।​

1960 के दशक तक आते–आते हर साल कई फिल्में बनने लगीं, जिनमें सामाजिक विषय, पारिवारिक मेलोड्रामा, ग्रामीण संघर्ष और प्रेम कहानियां प्रमुख रहीं। इस दौर में कुछ बाहरी राज्यों के निर्देशक और संगीतकार भी ओड़िया फिल्मों से जुड़े, जिससे तकनीकी और संगीतात्मक विविधता आई और फिल्मों की प्रोडक्शन वैल्यू बेहतर हुई।​

Movie Nurture:ओड़िया सिनेमा की जड़ें: 1936 की पहली फिल्म ‘सीता विवाह’ से आज तक का सफर

राज्य का हस्तक्षेप और स्टूडियो सिस्टम की शुरुआत

1961 में भुवनेश्वर में ओडिशा फिल्म स्टूडियो लिमिटेड की आधारशिला रखी गई, जो राज्य स्तर पर फिल्म इंडस्ट्री को संरचना देने की दिशा में बड़ा कदम था। हालांकि राजनीतिक और प्रशासनिक कारणों से इसकी प्रगति धीमी रही, फिर भी यह संदेश स्पष्ट था कि सरकार सिनेमा को सांस्कृतिक–औद्योगिक क्षेत्र के रूप में स्वीकार कर रही है।​

1970 में ईस्टर्न इंडिया मोशन पिक्चर एसोसिएशन (EIMPA) की शाखा कटक में खोली गई, ताकि ओड़िया फिल्मों के वितरण और प्रदर्शन को सुव्यवस्थित किया जा सके और क्षेत्रीय फिल्मों को हॉल में स्क्रीन स्पेस मिल सके। इससे स्थानीय निर्माताओं को बाजार और नेटवर्किंग के स्तर पर कुछ संस्थागत सहारा मिलने लगा।​

1970–80 का दौर: विकास, पुरस्कार और सितारों की चमक

1970 के दशक में ओड़िया सिनेमा ने उत्पादन के लिहाज से अच्छा विस्तार देखा और इस दशक में दर्जनों फिल्में बनीं। विषयों की विविधता भी बढ़ी, जहां एक ओर पारिवारिक और सामाजिक ड्रामा थे, वहीं दूसरी ओर साहित्यिक कृतियों पर आधारित फिल्मों और यथार्थवादी सिनेमा की भी शुरुआत हुई।​

1980 के दशक में ओड़िया फिल्मों की तकनीकी गुणवत्ता और बढ़ी, खासकर सिनेमैटोग्राफी, म्यूजिक और एडिटिंग के क्षेत्र में, और कई फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कारों में भी पहचान मिलने लगी। इस दौर में कुछ बड़े प्रोड्यूसरों और निर्देशकों ने मल्टी–स्टार कास्ट और अपेक्षाकृत बड़े बजट की फिल्मों का चलन शुरू किया, जिसने उद्योग की व्यावसायिक क्षमता को नए स्तर पर पहुंचाया।​​

कलिंगा स्टूडियो, OFDC और बुनियादी ढांचे की मजबूती

1982 में भुवनेश्वर में कलिंगा स्टूडियो लिमिटेड की स्थापना हुई, जो ओड़िया सिनेमा के लिए गेम–चेंजर साबित हुआ। पहली बार ऐसा संभव हुआ कि शूटिंग के बाद एडिटिंग, डबिंग और साउंड रिकॉर्डिंग जैसे तकनीकी काम राज्य के भीतर ही हो सकें, जबकि पहले इन कामों के लिए चेन्नई या कोलकाता जाना पड़ता था।​

ओडिशा फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (OFDC) ने निर्माताओं को सॉफ्ट लोन, सब्सिडी और कच्ची फिल्म पर टैक्स रियायत जैसी नीतिगत मदद दी, साथ ही सिनेमाघरों में ओड़िया फिल्मों की अनिवार्य स्क्रीनिंग जैसी नीतियां भी आगे बढ़ाईं। इन कदमों के चलते 1980 के दशक में फिल्म निर्माण की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और उद्योग एक संगठित स्वरूप में दिखने लगा।​

1990 का दशक: उदारीकरण, टीवी और गिरावट की शुरुआत

1990 के दशक में भारत में आर्थिक उदारीकरण और केबल टीवी के प्रसार ने फिल्म उद्योगों की पारंपरिक संरचना को हिला दिया, और ओड़िया सिनेमा भी इससे अछूता नहीं रहा। टेलीविजन और वीडियो कैसेट की वजह से लोगों का ध्यान सिनेमा हॉल से बंटने लगा, जिसके परिणामस्वरूप ओड़िया फिल्मों की थिएट्रिकल रिलीज़ और दर्शक संख्या दोनों में गिरावट आने लगी।​

इसी दशक में ओड़िया सिनेमा ने डायमंड जुबली भी मनाई, लेकिन उत्सव के पीछे आर्थिक संकट और घटती गुणवत्ता की वास्तविकता छिपी रही, क्योंकि 1990–95 के बीच बहुत कम फिल्में बनीं और उनमें से भी कई रिलीज़ तक नहीं पहुंच सकीं। निर्माण लागत बढ़ने, टिकट बिक्री घटने और पाइरेसी जैसी समस्याओं ने उद्योग को अस्थिर कर दिया।​

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2000 के बाद का ‘ओलिवुड’: मसाला, रीमेक और मल्टीप्लेक्स

2000 के बाद ओड़िया फिल्म इंडस्ट्री को लोकप्रिय रूप से ‘ओलिवुड’ कहा जाने लगा और फिल्मों में मसाला एंटरटेनमेंट, डांस नंबर, एक्शन और प्रेम कहानियों का प्रभुत्व बढ़ा। इस दौर में कई फिल्मों ने दक्षिण भारतीय और बंगाली फिल्मों के रीमेक के रूप में अपनी पहचान बनाई, जिससे एक ओर बॉक्स ऑफिस पर कुछ स्थिरता आई, तो दूसरी ओर मौलिकता को लेकर आलोचना भी हुई।​

मल्टीप्लेक्स कल्चर और एनआरआई दर्शकों को ध्यान में रखकर कुछ फिल्मों ने प्रोडक्शन वैल्यू बढ़ाई, बेहतर कैमरा, लोकेशन और म्यूजिक में निवेश किया, लेकिन कंटेंट की कमजोरी के कारण वे लंबे समय तक यादगार नहीं बन पाईं। फिर भी, कुछ स्वतंत्र और प्रयोगशील निर्देशकों ने सामाजिक यथार्थ, माइग्रेशन, महिला–केंद्रित कथानक और समकालीन राजनीति जैसे विषयों पर सार्थक फिल्में बनाईं।​

हाल के वर्ष: चुनौतियां, वेब प्लेटफॉर्म और नई उम्मीद

पिछले कुछ वर्षों में ओड़िया सिनेमा को लो–बजट, सीमित स्क्रीन, रीजनल मार्केट पर निर्भरता और पायरेटेड कंटेंट जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, जिसकी वजह से कई निर्माता हिचकिचा रहे हैं। दूसरी ओर, ओटीटी और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म ने ओड़िया भाषा में वेब फिल्म, शॉर्ट फिल्म और वेब–सीरीज़ के लिए नया स्पेस तैयार किया है, जिसमें युवा क्रिएटर्स कम बजट में भी अलग तरह की कहानियां सुना पा रहे हैं।​

हाल में रिलीज़ कुछ फिल्मों और कंटेंट–ड्रिवन प्रोजेक्ट्स ने यह दिखाया है कि अगर कहानी मजबूत हो, लोक–संस्कृति का संवेदनशील इस्तेमाल हो और मार्केटिंग स्मार्ट तरीके से की जाए, तो ओड़िया कंटेंट क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर भी दर्शक जुटा सकता है। फेस्टिवल सर्किट, नेशनल अवॉर्ड्स और सोशल मीडिया प्रमोशन ने भी ओड़िया फिल्मों को नई दृश्यता दी है।​​

‘सीता विवाह’ से आज तक: निरंतरता और बदलाव

1936 की ‘सीता विवाह’ ने जिस सांस्कृतिक आत्मसम्मान, भाषा–आधारित पहचान और धार्मिक–पौराणिक कथा से शुरुआत की, आज की पीढ़ी की ओड़िया फिल्में उसी परंपरा को नई भाषा और तकनीक में आगे बढ़ा रही हैं। आज भी ओड़िया सिनेमा में लोकगीत, पौराणिक संदर्भ, मंदिर–संस्कृति और ग्रामीण जीवन की झलक दिखती है, लेकिन साथ ही शहरी रिश्ते, प्रवास, बेरोजगारी और डिजिटल जीवन जैसे समकालीन मुद्दे भी कहानी के केंद्र में आने लगे हैं।​

तकनीकी रूप से जहां ‘सीता विवाह’ के लिए ओडिशा को दूसरे राज्यों के स्टूडियो पर निर्भर रहना पड़ा, वहीं आज डिजिटल कैमरा, लोकल स्टूडियो, एडिटिंग सॉफ्टवेयर और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने निर्माण–वितरण की पूरी प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बना दिया है। चुनौतियां अभी भी हैं, लेकिन यह यात्रा बताती है कि सीमित संसाधनों, आर्थिक दबाव और बाज़ार की अनिश्चितता के बावजूद ओड़िया सिनेमा लगातार खुद को reinvent करता रहा है।

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