क्या किसी औरत का बदला सिर्फ उसके जीवन तक सीमित होता है, या वह मौत के बाद भी जारी रह सकता है? क्या एक कंकाल (सिर्फ हड्डियों का ढांचा) किसी हत्यारे का पीछा कर सकता है और उसे उसके किए की सजा दे सकता है? 1950 में आई बंगाली फिल्म ‘कंकाल’ (Kankal) ने इन सवालों का जवाब दिया और साथ ही बंगाली सिनेमा के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया ।
यह फिल्म सिर्फ एक हॉरर कहानी नहीं थी, बल्कि यह उस दौर की सामाजिक विसंगतियों, लालच, बदले की भावना और एक स्त्री के अदम्य साहस की गाथा थी। ‘कंकाल’ को बंगाली भाषा की पहली हॉरर फिल्म होने का गौरव प्राप्त है । नरेश मित्रा (Naresh Mitra) के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने उस समय के सीमित संसाधनों में भी एक ऐसी डरावनी दुनिया रची कि दर्शक आज भी उसे याद करते हैं।
आइए, इस पुरानी बंगाली हॉरर फिल्म (Vintage Bengali Horror Film) की दुनिया में कदम रखें और जानें कि आखिर क्यों यह फिल्म आज भी बंगाली सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर (Milestone) मानी जाती है।
परिचय: कैसे बनी बंगाली सिनेमा की पहली हॉरर फिल्म
1950 का दशक भारतीय सिनेमा के लिए एक संक्रमणकालीन दौर था। एक तरफ देश आजाद हुआ था, नए-नए विचार आ रहे थे, और सिनेमा भी बदल रहा था। ऐसे समय में जब ज्यादातर फिल्में सामाजिक मुद्दों या पौराणिक कथाओं पर बन रही थीं, नरेश मित्रा ने एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना—हॉरर ।
‘कंकाल’ 14 अप्रैल 1950 को रिलीज हुई थी । इसे शिशिर मल्लिक (Shishir Mallik) ने मधुचक्र लिमिटेड (Madhuchakra Limited) बैनर के तहत प्रोड्यूस किया था । यह फिल्म करीब 114 मिनट लंबी है और इसकी कहानी, संवाद और निर्देशन सभी नरेश मित्रा ने ही किए थे ।
उस समय न तो आधुनिक वीएफएक्स (VFX) थे, न ही डर पैदा करने के लिए कोई बड़े-बड़े सेट। बावजूद इसके, फिल्म ने दर्शकों के दिलों में ऐसा डर बिठाया कि लोग सिनेमाघरों से बाहर निकलते हुए भी इधर-उधर देखते थे। यह फिल्म इस बात का सबूत थी कि अगर कहानी में दम हो, तो सीमित संसाधनों में भी एक अमर कृति रची जा सकती है।
कहानी का सार: लालच, बलात्कार और बदले की आग
‘कंकाल’ की कहानी एक युवती तरला (Tarala) के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे मलया सरकार (Malaya Sarkar) ने निभाया है ।
तरला एक खूबसूरत और जीवन का आनंद लेने वाली युवती है । फिल्म की शुरुआत में हम देखते हैं कि तरला अपने भाई पर आर्थिक रूप से निर्भर है, जिसके कारण उसे अपनी भाभी के ताने सुनने पड़ते हैं । इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए वह शादी करना चाहती है। उसके पास 29 प्रेम पत्र हैं, जो अलग-अलग प्रेमियों ने उसे लिखे हैं, और वह इनमें से किसी एक को चुनने को तैयार है ।
तभी उसके जीवन में दो पुरुष आते हैं—अभय (Abhay) और रतन (Ratan)। अभय (धीरज भट्टाचार्य) एक बदमिजाज और कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति है, जिसे तरला पसंद नहीं करती । दूसरी ओर, रतन (परेश बंद्योपाध्याय) एक अमीर, अच्छे और दयालु व्यक्ति हैं । तरला रतन को चुनती है और दोनों शादी कर लेते हैं।
लेकिन अभय को यह स्वीकार नहीं है। बदला लेने के लिए वह रतन की बहन से शादी कर लेता है और उसके परिवार में घुस जाता है । धीरे-धीरे वह रतन को अपने प्रभाव में लेकर उसकी सारी संपत्ति हड़प लेता है । एक दिन वह तरला को अपने खेत-खलिहान (फार्महाउस) में ले जाता है, शराब के नशे में उसके साथ बलात्कार की कोशिश करता है और हादसे में उसे मार डालता है । वह उसकी लाश नदी में फेंक देता है ।
तरला को खोजते-खोजते रतन पागल हो जाता है और सड़कों पर भटकने लगता है । पुलिस भी उसे ढूंढती है, लेकिन कोई सुराग नहीं मिलता। तभी रहस्यमय तरीके से तरला का कंकाल (सिर्फ हड्डियां) एक डॉक्टर संयाल (Sisir Batabyal) के क्लिनिक में पहुंच जाता है, जो अध्यात्म (Theosophy) में भी रुचि रखते हैं ।
संयोग से, अभय को एक्स-रे कराने के लिए उसी क्लिनिक में आना होता है । और फिर वहां वह दृश्य होता है जिसका सबको इंतजार था—तरला का कंकाल अचानक जीवित हो उठता है और अभय का पीछा करते हुए उसे मौत के घाट उतार देता है । डॉक्टर संयाल ही अंत में सभी पहेलियों के टुकड़े जोड़ते हैं और इस न्याय की कहानी को पूरा करते हैं ।
कलाकार: जब हर अभिनेता ने किरदार में जान फूंकी
‘कंकाल’ के कलाकारों ने अपने दमदार अभिनय से फिल्म को अविस्मरणीय बना दिया।
मलया सरकार (तरला)
मलया सरकार (Malaya Sarkar) ने तरला की भूमिका निभाई है । यह उनका सबसे यादगार किरदार है। एक समीक्षक ने लिखा, “मलया सरकार इस देश की सबसे बेहतरीन अभिनेत्रियों में से एक हैं—जिस दृश्य में उनकी मृत्यु होती है, वह इस देश के सिनेमा के सबसे भयावह (Haunting) दृश्यों में से एक है” ।
तरला के किरदार में उन्होंने जो मासूमियत और बाद में जो प्रतिशोध की भावना दिखाई, वह देखते ही बनती है। खासकर जब वह कंकाल के रूप में स्क्रीन पर आती हैं, तो सिर्फ उनके हाव-भाव (Body Language) से ही डर पैदा हो जाता है।
धीरज भट्टाचार्य (अभय)
धीरज भट्टाचार्य (Dhiraj Bhattacharya) ने फिल्म के खलनायक अभय की भूमिका निभाई है । उनका किरदार इसलिए और भी खतरनाक लगता है क्योंकि वह बाहर से एक साधारण व्यक्ति लगता है, लेकिन उसके इरादे बेहद गंदे हैं। एक समीक्षक के अनुसार, अभय का किरदार उस समय के समाज में मौजूद उन पुरुषों का प्रतिनिधित्व करता है जो औरतों को सिर्फ भोग्या समझते थे ।
परेश बंद्योपाध्याय (रतन)
परेश बंद्योपाध्याय (Paresh Bandyopadhyay) ने रतन का किरदार निभाया है —एक अमीर, भोला-भाला और अच्छा इंसान, जो अभय की साजिशों का शिकार हो जाता है। उनके अभिनय की सबसे खास बात है फिल्म के अंतिम हिस्से में उनका पागलपन (Madness)। जब वह अपनी पत्नी को खोजते हुए सड़कों पर भटकते हैं, तो उनकी आंखों में छलकता दर्द देखते ही बनता है।
सहायक कलाकार
जीबेन बोस (Jiben Bose): अग्रवाला के रोल में
सिशिर बटब्याल (Sisir Batabyal): डॉक्टर संयाल के रोल में, जो पूरी पहेली को सुलझाते हैं
केतकी दत्ता (Ketaki Dutta): अनिमा के रोल में
प्रभा देवी (Prabha Debi): कात्यायनी के रोल में
निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी: अंधेरे में पनपता डर
नरेश मित्रा (Naresh Mitra) ने न सिर्फ इस फिल्म का निर्देशन किया, बल्कि इसकी पटकथा भी लिखी । उनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि उन्होंने डर पैदा करने के लिए बाहरी चीजों पर निर्भर न रहकर माहौल (Atmosphere) बनाने पर जोर दिया।
प्रकाश और छाया का जादू
लेटरबॉक्स (Letterboxd) पर एक समीक्षक ने लिखा, “फिल्म की असली ताकत इसकी शैली है—तेज संपादन (Crisp Editing), प्रकाश और अंधेरे का शानदार इस्तेमाल, और असामान्य कैमरा एंगल (Obscure Camera Angles) फिल्म को सीधे डरावना और ग्रिपिंग बनाते हैं” ।
1950 में जब फिल्म बनी थी, तब चित्रकला में काइरोस्कोरो (Chiaroscuro) तकनीक का इस्तेमाल होता था—गहरी परछाइयां और तीखी रोशनी। ‘कंकाल’ में इसी तकनीक का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ है। अंधेरे कोनों में छिपा खतरा, दीवारों पर बढ़ती परछाइयां, और अचानक सामने आता कंकाल—यह सब मिलकर दर्शकों को सीट से बांधे रखता है।
संपादन
एक और समीक्षक ने माना कि फिल्म के बीच के हिस्से में कुछ सुस्ती (Sagging) है, जो पारिवारिक नाटक (Domestic Melodrama) पर ज्यादा फोकस करती है । लेकिन जब भी फिल्म हॉरर में प्रवेश करती है, संपादन इतना तेज और प्रभावी हो जाता है कि आप सांस रोककर देखते रह जाते हैं। एक समीक्षक ने लिखा, “जब काइरोस्कोरो और इफेक्ट्स हावी होते हैं, तो लगता है मानो कोई बिल्कुल अलग फिल्म देख रहे हैं” ।
कंकाल का इफेक्ट
फिल्म का सबसे चुनौतीपूर्ण हिस्सा था चलता-फिरता कंकाल दिखाना। आज के सीजीआई (CGI) के जमाने में यह आसान लग सकता है, लेकिन 1950 में यह एक बड़ी चुनौती थी। एक समीक्षक ने बताया कि फिल्म निर्माताओं ने कंकाल को दिखाने के लिए जो तकनीक इस्तेमाल की, वह उस समय के हिसाब से क्रांतिकारी थी और बाद में रे हैरीहाउज़ेन (Ray Harryhausen) जैसे मास्टर्स ने भी ऐसी ही तकनीकों का इस्तेमाल किया ।
फिल्म का ऐतिहासिक महत्व
‘कंकाल’ सिर्फ एक फिल्म नहीं है, यह बंगाली सिनेमा के इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
पहली बंगाली हॉरर फिल्म
टाइम्स ऑफ इंडिया (Times of India) के अनुसार, ‘कंकाल’ को बंगाली भाषा की पहली हॉरर फिल्म माना जाता है । यह एक प्रयोगात्मक (Experimental) हॉरर फिल्म थी, जिसने ब्लैक-एंड-व्हाइट बंगाली सिनेमा के स्वर्णिम दौर में जबरदस्त प्रतिक्रिया हासिल की ।
सामाजिक मुद्दों पर टिप्पणी
एक समीक्षक ने बताया कि फिल्म ने कई ऐसे मुद्दे उठाए जो उस समय के हिसाब से बेहद साहसिक थे :
सिक्योरिटी ट्रेडिंग: फिल्म में दिखाया गया कि कैसे बेईमान ब्रोकर शेयर बाजार में लोगों को ठगते हैं—एक ऐसा मुद्दा जो आज भी प्रासंगिक है ।
बलात्कार का चित्रण: फिल्म भारतीय सिनेमा की उन शुरुआती फिल्मों में से है, जिसमें बलात्कार या बलात्कार के प्रयास (Rape/Attempted Rape) के दृश्य दिखाए गए ।
औरत का बदला: फिल्म एक औरत की उस बदले की कहानी है, जिसे ‘नारी का कोप’ (Hell hath no fury like a woman scorned) कहा जाता है ।
माध्यम (Medium) का चित्रण
फिल्म में डॉक्टर संयाल का किरदार अध्यात्म (Theosophy) और माध्यम (Medium) में रुचि रखता है । यह उस समय हॉलीवुड में भी एक लोकप्रिय विषय था, और ‘कंकाल’ ने इसे भारतीय परिप्रेक्ष्य में पेश किया ।
समीक्षा: क्या अच्छा है, क्या कमजोर
हर फिल्म की तरह, ‘कंकाल’ की भी अपनी खूबियाँ और कमियाँ हैं।
क्या अच्छा है:
ऐतिहासिक महत्व: बंगाली की पहली हॉरर फिल्म होने का गौरव ही इसे देखने लायक बनाता है ।
माहौल और सिनेमैटोग्राफी: प्रकाश-छाया का शानदार इस्तेमाल और असामान्य कैमरा एंगल फिल्म को डरावना बनाते हैं ।
मलया सरकार का अभिनय: उनका अभिनय, खासकर मृत्यु वाला दृश्य, भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार दृश्यों में से है ।
सामाजिक संदेश: फिल्म लालच, शेयर बाजार में धोखाधड़ी और औरतों के शोषण जैसे मुद्दों पर गहरी टिप्पणी करती है ।
बेहतरीन क्लाइमेक्स: फिल्म का अंतिम 20-30 मिनट, जहां कंकाल जीवित होकर अभय का पीछा करता है, बेहद रोमांचक है।
क्या कमजोर है:
धीमी गति: फिल्म का मध्य भाग पारिवारिक नाटक (Domestic Melodrama) में उलझकर काफी सुस्त हो जाता है । एक समीक्षक ने लिखा, “ज्यादातर हिस्सा लंबा और बिना किसी दिलचस्पी के घरेलू नाटक है—बीच में अविश्वसनीय रूप से ढीला” ।
तकनीकी सीमाएं: 1950 में बनी इस फिल्म की तकनीक आज के मानकों से काफी पुरानी है। कुछ दृश्यों में कंकाल का इफेक्ट थोड़ा अटपटा लग सकता है।
लंबाई: 114 मिनट की यह फिल्म आज के मानकों से थोड़ी लंबी लग सकती है, खासकर जब बीच का हिस्सा धीमा हो।
उपलब्धता: पुरानी फिल्म होने के कारण इसका अच्छी क्वालिटी वाला प्रिंट (Print) ढूंढना मुश्किल हो सकता है। कई प्रिंट्स खराब हालत में हैं।
फिल्म की विरासत: बंगाली सिनेमा पर अमिट छाप
‘कंकाल’ ने बंगाली सिनेमा में हॉरर विधा (Horror Genre) की नींव रखी। इसके बाद ‘हनाबाड़ी’ (Hanabari, 1952), ‘जिघांशा’ (Jighangsha, 1951), ‘कालो छाया’ (Kalo Chhaya, 1948) जैसी कई हॉरर और थ्रिलर फिल्में बनीं ।
लेकिन दुख की बात यह है कि आज के बंगाली निर्देशक उस विरासत को संभाल नहीं पाए हैं। एक समीक्षक ने लिखा, “यह देखकर दुख होता है कि आज के ज्यादातर बंगाली निर्देशक बड़े बजट और नवीनतम इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद लगभग कुछ नहीं कर पा रहे हैं। हम उस विरासत को बनाए रखने में विफल रहे हैं जो हमें अपने पूर्वजों से मिली थी” ।
एक अन्य समीक्षक ने इसे “अग्रदूत (Pioneer) भले ही न हो, लेकिन गेम-चेंजर जरूर” कहा । उनके अनुसार, फिल्म ने कई ऐसे विषयों को छुआ, जो उस समय के हिसाब से बेहद साहसिक थे।
निष्कर्ष: एक ऐसी फिल्म जिसे देखना चाहिए
‘कंकाल’ सिर्फ एक फिल्म नहीं है, यह बंगाली सिनेमा के उस सुनहरे दौर की याद दिलाती है जब फिल्मकार सीमित संसाधनों में भी अनंत संभावनाएं तलाश रहे थे। हां, यह फिल्म लंबी है। हां, इसके कुछ हिस्से सुस्त हैं। लेकिन जब यह फिल्म अपने असली रंग में आती है—हॉरर मोड में—तो यह आज भी उतनी ही डरावनी है जितनी 1950 में रही होगी।
एक समीक्षक ने लिखा, “कुछ उत्साही बंगाली कलाकारों ने लगभग 75 साल पहले छोटे बजट और बहुत विकसित इंफ्रास्ट्रक्चर न होने के बावजूद यह फिल्म बनाई। फिर भी, फिल्म रूह कंपा देने वाली है” ।
अगर आप पुरानी बंगाली फिल्मों (Vintage Bengali Films) के शौकीन हैं, या फिर सिनेमा के इतिहास में रुचि रखते हैं, तो ‘कंकाल’ आपके लिए एक जरूरी फिल्म है। यह उन भूली-बिसरी बंगाली क्लासिक (Forgotten Bengali Classic) फिल्मों में से है, जिसे एक बार देखने के बाद आप कभी नहीं भूलेंगे।
तो अगली बार जब आप किसी पुरानी हॉरर फिल्म की तलाश में हों, तो ‘कंकाल’ को याद कीजिए—वह कंकाल जिसने बंगाली सिनेमा में डर के नए आयाम गढ़े।


