भारतीय सिनेमा का इतिहास जब भी लिखा जाता है, उसमें एक नाम अक्सर धुंधला सा रह जाता है। एक ऐसा चेहरा जिसने पहली बार भारत की पहली सवाक (बोलती) फिल्म में अपनी आवाज़ और अभिनय से दर्शकों को रूबरू कराया, लेकिन फिर इतिहास के पन्नों में कहीं गुम हो गया। वह नाम है मास्टर विट्ठल का। ‘आलम आरा’ नामक वह ऐतिहासिक फिल्म, जिसने 1931 में सिनेमा के दृश्य-श्रव्य युग की शुरुआत की, उसके मुख्य नायक विट्ठल थे। पर क्या आप उनके बारे में जानते हैं? उनका जीवन कैसा रहा? वह कहाँ से आए और फिल्म के बाद कहाँ गए? यह कहानी है उस गुमनाम सितारे की, जिसने सिनेमा की दुनिया में क्रांति ला दी, पर खुद इतिहास की गर्त में समा गया।
वह दौर जब फिल्में गूँगी हुआ करती थीं
1931 से पहले का भारतीय सिनेमा मूक फिल्मों का दौर था। पर्दे पर चेहरे के हाव-भाव, शारीरिक अभिनय और बीच में लगाए गए इंटर-टाइटल कार्ड्स की मदद से कहानी समझाई जाती थी। दर्शकों को पात्रों के संवाद नहीं सुनाई देते थे, न ही पर्दे से कोई आवाज़ निकलती थी। संगीत भी लाइव बजता था, थिएटर में बैंड या संगतकार बैठे होते। फिर वह ऐतिहासिक पल आया जब अर्देशिर ईरानी, जो पहले से ही मूक फिल्में बना रहे थे, ने सवाक फिल्म बनाने का जोखिम उठाया। इसकी प्रेरणा उन्हें अमेरिकी फिल्म ‘शो बोट’ और हॉलीवुड की बोलती फिल्मों से मिली। उन्होंने तय किया कि भारत की पहली बोलती फिल्म एक ऐसी फैंटेसी होगी, जो जनता का मनोरंजन कर सके। और इस फिल्म का नाम रखा गया – ‘आलम आरा’ यानी ‘दुनिया की शोभा’।

फिल्म की कहानी एक राजकुमार और एक खूबसूरत आदिवासी लड़की की प्रेमकथा थी, जिसमें राजदरबार, षडयंत्र, संगीत और नृत्य सब कुछ था। इस फिल्म के नायक के लिए एक ऐसे अभिनेता की तलाश थी, जिसका चेहरा भी प्रभावशाली हो और आवाज़ भी मधुर। उस समय के मूक फिल्मों के सितारे अक्सर आवाज़ के मामले में खरे नहीं उतरते थे। ऐसे में निर्देशक की नजर पड़ी एक युवा, सुंदर और प्रतिभाशाली कलाकार पर – मास्टर विट्ठल।
मास्टर विट्ठल: वह नाम जो इतिहास बन गया
मास्टर विट्ठल का जन्म 1906 में हुआ था। उनके बचपन और प्रारंभिक जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है, जो उनकी गुमनामी का एक कारण भी है। कहा जाता है कि वह नाटकों और रंगमंच से जुड़े हुए थे। उस जमाने में रंगमंच ही वह पहला पड़ाव था, जहाँ से कलाकार फिल्मों में आते थे। विट्ठल में वह सहज प्रतिभा थी, जो निर्देशक अर्देशिर ईरानी को चाहिए थी। उन्हें ‘आलम आरा’ के नायक का रोल दिया गया – राजकुमार की भूमिका।
फिल्म की शूटिंग गुप्त रखी गई थी, क्योंकि ईरानी को डर था कि अगर प्रतियोगियों को पता चल गया तो वे पहले बोलती फिल्म बनाने की होड़ में उनसे आगे निकल जाएंगे। सेट के बाहर पहरा लगा दिया गया। विट्ठल और अन्य कलाकारों को बोलने के नए अंदाज़, आवाज़ के उतार-चढ़ाव और संवाद अदायगी के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी। उस समय रिकॉर्डिंग की तकनीक आदिम थी। माइक्रोफोन को छिपाना पड़ता था, कई बार वह पेड़ों या फूलदानों में छिपा दिए जाते। एक शॉट में गलती हो जाने पर पूरा दृश्य दोबारा शूट करना पड़ता, क्योंकि उस ज़माने में डबिंग की सुविधा नहीं थी।
विट्ठल ने न केवल अभिनय किया, बल्कि फिल्म के गाने भी गाए। फिल्म में कुल सात गाने थे, जिनमें से एक ‘दे दे खुदा के नाम पर’ बेहद मशहूर हुआ। विट्ठल की आवाज़ में यह गाना उस जमाने में लोगों के दिलों में उतर गया। 14 मार्च 1931 को मुंबई के मैजेस्टिक सिनेमा में ‘आलम आरा’ का प्रीमियर हुआ। लाइनें इतनी लंबी थीं कि पुलिस को भीड़ को नियंत्रित करना पड़ा। दर्शक हैरान थे कि पर्दे पर लोग बोल और गा रहे हैं! फिल्म सुपरहिट हुई और महीनों तक चलती रही। मास्टर विट्ठल एक रातों-रात स्टार बन गए। अखबारों में उनके चेहरे और फिल्म की चर्चा थी।
सफलता के बाद का सफर: चमक और फिर धुंधलका
‘आलम आरा’ की सफलता के बाद मास्टर विट्ठल को लगा कि अब उनका करियर सितारों जैसा चमकेगा। शुरुआत में ऐसा ही हुआ भी। उन्हें कई फिल्मों में काम मिला। लेकिन यहाँ से उनकी गुमनामी की कहानी शुरू होती है। दरअसल, बोलती फिल्मों के आने के साथ ही एक नई चुनौती सामने आई – भाषा और उच्चारण की। विट्ठल की मातृभाषा मराठी थी, जबकि हिंदी फिल्मों का बोलबाला बढ़ रहा था। हिंदी उच्चारण में दक्ष न होने के कारण उन्हें धीरे-धीरे भूमिकाएँ मिलनी कम हो गईं।
दूसरा बड़ा कारण था नए चेहरों का आना। बोलती फिल्मों ने अभिनेताओं के लिए नए मापदंड तय किए। के.एल. सहगल जैसे गायक-अभिनेता, जिनकी आवाज़ में जादू था, छा गए। विट्ठल, जो मूलतः एक अभिनेता थे, इस नई प्रतिस्पर्धा में पीछे रह गए। तीसरा कारण था फिल्म इंडस्ट्री का तेजी से बदलता स्वरूप। नए स्टूडियो, निर्माता-निर्देशक और सितारे सामने आ रहे थे। ऐसे में पुराने चेहरे भुला दिए गए।
मास्टर विट्ठल ने 1930 के दशक में कुछ और फिल्में कीं, जैसे ‘शीरी फरहाद’, ‘ज़िंदगी’ आदि, लेकिन वह ‘आलम आरा’ जैसी सफलता हासिल नहीं कर पाए। धीरे-धीरे फिल्मों का सिलसिला थम गया। उनकी आखिरी फिल्म का रिकॉर्ड भी स्पष्ट नहीं है। जिस शख्स ने इतिहास रचा था, वह खुद इतिहास के पन्नों में दब गया।
गुमनामी के कारण: एक विश्लेषण
मास्टर विट्ठल के गुमनाम होने के पीछे कई सामाजिक और औद्योगिक कारण थे।
पहला कारण: उस दौर में फिल्मों को ‘अश्लील’ और ‘अनैतिक’ माना जाता था। सम्मानित परिवारों के लोग फिल्मों से दूरी बनाते। अभिनेताओं और अभिनेत्रियों को समाज में वह दर्जा नहीं मिलता था, जो आज है। ऐसे में फिल्म इतिहासकारों ने भी शुरुआती दौर के कलाकारों के योगदान को गंभीरता से दर्ज नहीं किया। रिकॉर्ड रखने की कोई व्यवस्था नहीं थी। फोटो, पोस्टर, नोट्स – यह सब समय के साथ नष्ट हो गए।
दूसरा कारण: फिल्म पत्रकारिता का अभाव। आज की तरह फिल्म पत्रिकाएँ, इंटरव्यू, बायोग्राफी का चलन नहीं था। कलाकारों के निजी जीवन और करियर पर कोई नज़र नहीं रखता था। जब तक फिल्में चलतीं, नाम चलता; फिल्म बंद हुई तो नाम भी बंद।
तीसरा कारण: स्वयं फिल्म उद्योग की अनिश्चितता। उस जमाने में फिल्म निर्माण एक जोखिम भरा व्यवसाय था। स्टूडियो बनते और बंद हो जाते। कलाकारों के पास दीर्घकालिक अनुबंध नहीं होते थे। एक फिल्म के बाद दूसरी की कोई गारंटी नहीं थी। ऐसे में कई प्रतिभाशाली कलाकार गुमनामी में खो गए।
चौथा और महत्वपूर्ण कारण: भाषाई बदलाव। जैसे-जैसे हिंदी फिल्मों का दायरा बढ़ा, मराठी, बंगाली या दक्षिण भारतीय भाषाओं के कलाकारों के लिए हिंदी में पर्फेक्ट डिलिवरी देना मुश्किल हो गया। मास्टर विट्ठल इसी का शिकार हुए।
‘आलम आरा’ का ऐतिहासिक महत्व और विट्ठल का योगदान
भले ही मास्टर विट्ठल को भुला दिया गया, पर ‘आलम आरा’ और उनके योगदान का ऐतिहासिक महत्व कभी खत्म नहीं हो सकता। इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा की दिशा ही बदल दी।
1. सवाक सिनेमा की नींव: इसने साबित कर दिया कि भारत में भी बोलती फिल्में बन सकती हैं और दर्शक उन्हें पसंद करेंगे।
2. संगीत की शुरुआत: फिल्म के गानों ने भारतीय सिनेमा में संगीत की अहमियत स्थापित की। आज बॉलीवुड जिस गाने-नृत्य की वजह से दुनिया भर में मशहूर है, उसकी शुरुआत ‘आलम आरा’ से हुई।
3. तकनीकी क्रांति: फिल्म ने साउंड रिकॉर्डिंग, सिंक्रोनाइजेशन जैसी नई तकनीकों को भारत में पेश किया।
4. स्टार सिस्टम: मूक फिल्मों में अभिनेता की पहचान उतनी नहीं बन पाती थी। बोलती फिल्मों ने सितारों को एक अलग पहचान दी। मास्टर विट्ठल इसके पहले उदाहरण थे।
विट्ठल ने न केवल एक चरित्र निभाया, बल्कि एक नए युग के लिए दर्शकों को तैयार किया। उनके अभिनय, उनकी आवाज़ और उनकी मौजूदगी ने ही ‘आलम आरा’ को जीवंत बनाया। वह पहले भारतीय अभिनेता थे जिनकी आवाज़ थिएटर की चारदीवारी में गूंजी। यह योगदान किसी भी सूरत में छोटा नहीं है।
आज के संदर्भ में मास्टर विट्ठल की विरासत
आज जब हम बॉलीवुड के शानदार सेट, डॉल्बी डिजिटल साउंड और करोड़ों रुपये के बजट वाली फिल्में देखते हैं, तो हमें उन शुरुआती पायदानों को याद रखना चाहिए, जिन पर चलकर यह इमारत खड़ी हुई। मास्टर विट्ठल उन्हीं पायदानों में से एक हैं।
उनकी विरासत को समझने के लिए कुछ बिंदु:
पथप्रदर्शक की भूमिका: उन्होंने बिना किसी रोल मॉडल के एक नई विधा में काम किया। उनके सामने कोई उदाहरण नहीं था कि सवाक फिल्म में कैसे अभिनय करते हैं। उन्होंने स्वयं रास्ता बनाया।

बहुमुखी प्रतिभा: वह अभिनेता भी थे और गायक भी। उस दौर में कलाकारों को बहुत सारे हुनर सीखने पड़ते थे।
सिनेमा के लिए समर्पण: उस जमाने में फिल्में बनाना आसान नहीं था। बिना एयर कंडीशनिंग के तेज रोशनी वाले स्टूडियो में घंटों काम करना पड़ता। विट्ठल ने यह सब एक नए प्रयोग के लिए किया।
दुख की बात है कि आज ‘आलम आरा’ की कोई प्रति सुरक्षित नहीं है। आग लगने, अनदेखी या खराब संरक्षण के कारण यह ऐतिहासिक फिल्म हमेशा के लिए खो गई है। हमारे पास सिर्फ कुछ तस्वीरें, पोस्टर और समकालीन विवरण ही हैं। ठीक उसी तरह, मास्टर विट्ठल की स्मृतियाँ भी धुंधली पड़ गई हैं।
निष्कर्ष: गुमनामी से बाहर लाने की जरूरत
भारतीय सिनेमा अपने 100 साल से भी अधिक के सफर में कई मोड़ ले चुका है। हम दादासाहब फाल्के, पृथ्वीराज कपूर, अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राज कपूर जैसे नामों को खूब याद करते हैं। लेकिन उस पहले पौधे को भूल जाते हैं, जिसने इस विशाल वृक्ष की जड़ों को पानी दिया था।
मास्टर विट्ठल की कहानी हमें यह याद दिलाती है कि इतिहास केवल विजेताओं का ही नहीं होता। कुछ लोग इतिहास बनाते हैं और फिर खुद उसी में विलीन हो जाते हैं। उन्हें सम्मान देने की जरूरत है।
मास्टर विट्ठल सिर्फ एक नाम नहीं, एक प्रतीक हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि कभी-कभी महान कार्य करने वाले महान नाम नहीं, बल्कि महान विरासत छोड़ जाते हैं। ‘आलम आरा’ की आवाज़ भले ही अब हमें सुनाई न दे, पर उसकी गूँज आज भी हर उस फिल्म में है, जो हम देखते हैं। और उस गूँज के पहले स्वर थे – मास्टर विट्ठल।
आइए, हम उस गुमनाम सितारे को याद करें, जिसने भारतीय सिनेमा के आकाश को रोशन करने वाले अनगिनत सितारों के लिए रास्ता खोला। उन्हें श्रद्धांजलि देने का यही सबसे अच्छा तरीका है कि हम उन्हें भुलाएँ नहीं।
