एक सवाल पूछना चाहता हूं आपसे।
क्या आप जानते हैं कि भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री को फिल्म में काम करने के लिए अपना असली नाम तक छुपाना पड़ा था? क्या उनके पड़ोसियों ने उनसे बात करना बंद कर दिया था? कि उनके अपने रिश्तेदार उन्हें मृत मान चुके थे — सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने कैमरे के सामने खड़े होने की हिम्मत की थी?
यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है। यह सच है। और यह सच इतना असहज है कि इतिहास की किताबों ने इसे बड़े करीने से नजरअंदाज कर दिया।
हम 1920s के भारत की बात कर रहे हैं — वो दौर जब सिनेमा एक नई और अजीब चीज थी, जब परदे पर किसी औरत का चेहरा दिखना समाज के लिए एक झटके से कम नहीं था। जिन औरतों ने उस दौर में कैमरे के सामने खड़े होने की हिम्मत की, उन्होंने सिर्फ अभिनय नहीं किया — उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी दांव पर लगाई।
यह लेख उन्हीं औरतों की कहानी है।

जब अभिनय करना “इज्ज़तदार” औरत का काम नहीं माना जाता था
आज हम किसी अभिनेत्री को देखते हैं तो तालियां बजाते हैं, पोस्टर लगाते हैं, सोशल मीडिया पर फॉलो करते हैं। लेकिन सौ साल पहले यही तस्वीर बिल्कुल उलटी थी।
1913 में जब दादासाहेब फाल्के भारत की पहली फीचर फिल्म “राजा हरिश्चंद्र” बना रहे थे, तब उन्हें एक बड़ी समस्या थी — फिल्म में महिला किरदार के लिए कोई औरत तैयार नहीं थी। फाल्के साहब मुंबई की गलियों में घूमे, दुकानों पर गए, परिचितों से गुज़ारिश की। हर जगह से एक ही जवाब मिला — “नहीं।”
इतनी मुश्किल क्यों थी यह बात? क्योंकि उस वक्त के भारतीय समाज में यह मान्यता गहरी जड़ें जमाए बैठी थी कि “शरीफ घर की औरत” कभी सार्वजनिक मनोरंजन का हिस्सा नहीं बन सकती। थिएटर और नाटक पहले से ही संदेह की नजर से देखे जाते थे। फिल्म तो उससे भी नई और उससे भी “खतरनाक” चीज थी।
धर्म का हवाला दिया जाता था। जाति का सवाल उठाया जाता था। परिवार की इज्ज़त की दुहाई दी जाती थी। और इन सबके बीच, पर्दे पर महिला किरदार निभाने का काम पुरुष करते थे — साड़ी पहनकर, चेहरे पर मेकअप लगाकर।
सोचिए जरा। भारतीय सिनेमा की शुरुआत ऐसे हुई थी।
फिल्मों में काम किया तो घर का दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो गया
दुर्गाबाई कामत का नाम आपने शायद नहीं सुना होगा। लेकिन यह नाम भारतीय सिनेमा के इतिहास में उतना ही अहम है जितना दादासाहेब फाल्के का।
दुर्गाबाई कामत भारतीय सिनेमा की पहली महिला अभिनेत्री थीं। उन्होंने 1913 में फाल्के साहब की फिल्म “मोहिनी भस्मासुर” में काम किया। उनकी बेटी कमलाबाई ने भी उसी फिल्म में काम किया — वो भारत की पहली बाल अभिनेत्री बनीं।
लेकिन यह फैसला लेना आसान नहीं था।
दुर्गाबाई विधवा थीं। उनके पास कोई सहारा नहीं था। समाज की नजर में वो पहले से ही “कमजोर” थीं। जब उन्होंने फिल्म में काम करने का फैसला किया, तो जो थोड़े-बहुत रिश्तेदार उनके साथ थे, उन्होंने भी मुंह फेर लिया। पड़ोसियों ने बात करना बंद कर दिया। उनकी बेटी को लेकर लोग तरह-तरह की बातें करने लगे।
यह सिर्फ दुर्गाबाई की कहानी नहीं थी। यह उस पूरे दौर की कहानी थी।
जिन परिवारों से कोई लड़की या औरत फिल्मों में गई, उन परिवारों ने अक्सर उसे मृत मान लिया। कुछ परिवारों ने तो सचमुच मातम मनाया — जैसे घर में किसी की मौत हो गई हो। औरत जिंदा थी, काम कर रही थी, पैसा कमा रही थी — लेकिन परिवार के लिए वो अस्तित्वहीन हो चुकी थी।
और इसीलिए बहुत सी अभिनेत्रियों ने अपना नाम बदल लिया। अपनी पहचान छुपाई। ताकि परिवार को पता न चले। ताकि किसी पुराने जानने वाले की नजर न पड़े।
अपना नाम छुपाकर जीना — यह कितना भारी बोझ रहा होगा, सोचकर ही दिल भारी हो जाता है।
जब “अच्छे घर की औरतें” नहीं आईं तो तवायफों ने स्क्रीन संभाली
एक कड़वी सच्चाई है जिसे इतिहास ने हमेशा किनारे रखा।
जब “इज्जतदार” घरों की औरतें फिल्मों में आने से इनकार कर रहीं थीं, तब वो काम किसने किया? तवायफ समुदाय की औरतों ने। नाचने-गाने का पेशा पहले से करने वाली उन महिलाओं ने, जिनके लिए सार्वजनिक मंच पर उतरना कोई नई बात नहीं थी।

इन औरतों में बेहतरीन कलाकार थीं। उनकी आवाज में जादू था, उनकी अदाओं में भाव था, उनमें अभिनय की एक नैसर्गिक प्रतिभा थी। उन्होंने भारतीय सिनेमा के शुरुआती सालों को संभाला — जब कोई और आगे आने को तैयार नहीं था।
लेकिन बदले में उन्हें क्या मिला?
दोहरा तिरस्कार। पहले तो समाज में उनकी जाति और पेशे की वजह से वो हेय दृष्टि से देखी जाती थीं। और जब फिल्मों में आईं, तो “फिल्मी औरत” का ठप्पा लग गया — जो किसी गाली से कम नहीं था उस जमाने में।
उनकी कला को सराहा गया। उनके किरदारों को पसंद किया गया। लेकिन उन्हें इंसान का दर्जा देने में समाज को बहुत तकलीफ थी।
उनके नाम आज किसी को याद नहीं हैं। उनकी तस्वीरें नहीं बचीं। उनकी कहानियां नहीं लिखी गईं। भारतीय सिनेमा की नींव जिन हाथों ने रखी, उन हाथों को इतिहास ने पहचाना तक नहीं।
कैमरे के सामने मुस्कुराओ, पर्दे के पीछे रोओ — सेट पर क्या होता था
अगर किसी तरह घर वालों को मनाकर, समाज की परवाह किए बिना कोई औरत फिल्मों तक पहुंच भी जाती थी, तो वहां हालात कुछ बेहतर नहीं थे।
पैसों की बात करें तो पुरुष अभिनेताओं और महिला अभिनेत्रियों के बीच जमीन-आसमान का फर्क था। एक पुरुष कलाकार जितना एक दिन में कमाता था, एक अभिनेत्री को उतने के लिए हफ्ते भर काम करना पड़ता था। और शिकायत करने का कोई रास्ता नहीं था — क्योंकि कोई लिखित अनुबंध ही नहीं होता था।
जी हां। कोई contract नहीं। कोई agreement नहीं। जो निर्माता ने कहा, वो मानो। जितना दिया, ले लो। नहीं चाहिए तो दरवाजा खुला है — और दरवाजे के बाहर समाज खड़ा है, जो वापस नहीं लेगा।
शूटिंग की परिस्थितियाँ भी कठिन थीं। 1920s में फिल्म स्टूडियो आज जैसे नहीं थे। खुले में शूटिंग होती थी। तेज धूप में घंटों खड़े रहना पड़ता था। साइलेंट फिल्मों के लिए चेहरे पर भारी मेकअप लगाया जाता था जो गर्मी में पिघलता रहता था। न पीने का साफ पानी, न आराम करने की जगह, न कोई बुनियादी सुविधा।
और इन सबके बीच, ऊपर से निर्देशकों और निर्माताओं का दबाव अलग। “यह scene ऐसे करो।” “इतने बजे तक तैयार रहो।” “अगर नहीं करोगी तो किसी और को ले आएंगे।”
किसी और को ले आना आसान था। क्योंकि बाहर ऐसी कई औरतें थीं जिनके पास कोई विकल्प नहीं था।
भारतीय सिनेमा की वो भूली-बिसरी नायिकाएं जिन्हें आज कोई नहीं जानता
इतिहास की सबसे बड़ी ज्यादती यह है कि जिन औरतों ने सब कुछ सहा, सब कुछ खोया, वो आज गुमनाम हैं।
दुर्गाबाई कामत — भारत की पहली अभिनेत्री। 1913 में पर्दे पर आई, तब जब यह काम किसी के लिए भी आसान नहीं था। आज उनकी एक भी तस्वीर ठीक से उपलब्ध नहीं है। उनकी जिंदगी कैसे गुजरी, यह भी ठीक से दर्ज नहीं है।
कमलाबाई गोखले — भारत की पहली बाल अभिनेत्री। महज कुछ सालों की उम्र में पर्दे पर आईं। बड़े होकर उन्होंने अपने बचपन के उन अनुभवों के बारे में बात की — कि कैसे लोग उन्हें और उनकी मां को अजीब नजरों से देखते थे।
सुलोचना, यानी रूबी मायर्स — एक यहूदी महिला जो 1920s की सबसे बड़ी स्टार बनीं। उनकी खूबसूरती और अभिनय प्रतिभा का जवाब नहीं था। लेकिन उनके लिए भी रास्ता आसान नहीं था। एक विदेशी पृष्ठभूमि की महिला, हिंदुस्तान की फिल्मी दुनिया में — हर कदम पर एक नई चुनौती।
जुबैदा — एक नवाब परिवार से ताल्लुक रखती थीं। घर में दौलत थी, रुतबा था। फिर भी फिल्मों में आने पर परिवार और समाज ने जो सवाल उठाए, वो कम तकलीफदेह नहीं थे। उन्होंने भारत की पहली बोलती फिल्म “आलम आरा” में 1931 में काम किया — और उनकी आवाज ने इतिहास रच दिया। लेकिन उनकी अपनी कहानी आज भी अधूरी दर्ज है।
इन सबमें एक बात कॉमन है — इन्होंने दिया बहुत, मिला कम। और इतिहास ने याद भी नहीं रखा।

धीरे-धीरे बदला समाज — पर कीमत बहुत बड़ी चुकानी पड़ी
1930s में जब फिल्मों में आवाज आई — जब साइलेंट फिल्मों की जगह बोलती फिल्मों ने ली — तब कुछ बदलाव जरूर आया।
संगीत और गाने ने अभिनेत्रियों को एक नई पहचान दी। जब लोगों ने पर्दे पर गाती हुई औरतों को देखा, तो धीरे-धीरे नजरिया बदलने लगा। गाना सुनना लोगों को पसंद था — और गाने वाली से नफरत करना थोड़ा मुश्किल हो गया।
देविका रानी का आना एक बड़ा मोड़ था। वो पढ़ी-लिखी थीं, अंग्रेजी बोलती थीं, London में पढ़ाई की थी। उनके आने से फिल्मी दुनिया की “image” बदलने लगी — कम से कम शहरी और पढ़े-लिखे तबके में।
लेकिन यह बदलाव बहुत धीमा था। और यह बदलाव उन औरतों के बलिदान पर टिका था जो 1920s में आईं और सब कुछ झेला। जिन्होंने घर गंवाया, रिश्ते गंवाए, नाम गंवाया — ताकि आगे आने वाली पीढ़ी के लिए रास्ता थोड़ा कम कठिन हो।
उस बदलाव का श्रेय उन्हें कभी नहीं मिला।
उन औरतों को सलाम जिन्होंने सब कुछ खोकर हमें सिनेमा दिया
आज जब हम किसी बड़े पर्दे पर अपनी पसंदीदा अभिनेत्री को देखते हैं, तो शायद हम सोचते भी नहीं कि यह सब मुमकिन कैसे हुआ।
यह मुमकिन हुआ उन औरतों की वजह से जिनके नाम हम नहीं जानते। जिन्होंने 1920s के उस बंद और कठोर समाज में एक दरवाजा खटखटाया — जानते हुए कि दरवाजा खुला तो भी मुश्किल है, और नहीं खुला तो भी।
उन्होंने घर गंवाया। परिवार गंवाया। इज्जत गंवाई। नाम गंवाया।
और हमें दिया — एक पूरी सदी का सिनेमा।
अगली बार जब कोई फिल्म देखें, एक पल के लिए उन गुमनाम चेहरों को याद करें जिन्होंने वो पहला कदम उठाया था। जो न उठाते, तो शायद यह सफर इतना आगे न आता।
क्या आप इन अभिनेत्रियों की कहानी पहले जानते थे? नीचे comment में जरूर बताएं — और अगर यह कहानी आपको छू गई हो, तो किसी ऐसे इंसान के साथ share करें जो इतिहास की इन भूली-बिसरी नायिकाओं के बारे में जानना चाहे।
भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्रियां — एक नजर में
| अभिनेत्री का नाम | खास पहचान | दौर |
|---|---|---|
| दुर्गाबाई कामत | भारत की पहली अभिनेत्री | 1913 |
| कमलाबाई गोखले | पहली बाल अभिनेत्री | 1913 |
| सुलोचना (रूबी मायर्स) | 1920s की सबसे बड़ी स्टार | 1925–1935 |
| जुबैदा | पहली बोलती फिल्म की अभिनेत्री | 1931 |
| देविका रानी | पहली mainstream educated अभिनेत्री | 1930s |