पुराने लेंस, नई दृष्टि: 1950 के दशक की तमिल फिल्मों की दृश्य भाषा

Movie Nurture:पुराने लेंस, नई दृष्टि: 1950 के दशक की तमिल फिल्मों की दृश्य भाषा

आज के दौर में जब हम ‘RRR’ या ‘पोन्नियिन सेलवन’ के शानदार विजुअल्स देखते हैं, तो उनकी तकनीकी चमक-धमक हैरान कर देती है। CGI, VFX, हाई-रिज़ॉल्यूशन कैमरे – ये सब आज के सिनेमा का अहम हिस्सा हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जब ये सारी सुविधाएँ नहीं थीं, तब फिल्मकार कहानी का जादू कैसे बुनते थे? आइए चलते हैं 1950 के दशक के तमिल सिनेमा की एक ऐसी ही यात्रा पर, जहाँ पुराने लेंस और सीमित संसाधनों के बावजूद एक ऐसी ‘दृश्य भाषा’ विकसित हुई, जिसने न सिर्फ़ तमिल, बल्कि पूरे भारतीय सिनेमा की नींव मज़बूत की।

यह वह दौर था जब स्टूडियो सिस्टम अपने चरम पर था और फिल्में ज़्यादातर ब्लैक एंड व्हाइट में बनती थीं। लेकिन इसी ‘सीमा’ ने फिल्मकारों को असीम रचनात्मकता का रास्ता दिखाया। यह वह ज़माना था जब ‘दृश्य’ सिर्फ़ कहानी दिखाने का ज़रिया नहीं, बल्कि खुद एक ‘भाषा’ था। चलिए, उसी ज़माने के लेंस से देखते हैं यह अनोखी दुनिया।

Movie Nurture:पुराने लेंस, नई दृष्टि: 1950 के दशक की तमिल फिल्मों की दृश्य भाषा

एक नई सुबह का सिनेमा: स्वतंत्रता के बाद का तमिलनाडु

1950 का दशक भारत के लिए नए उत्साह और नई चुनौतियों का दौर था। आज़ादी मिल चुकी थी और देश एक नई पहचान गढ़ने में जुटा था। तमिलनाडु में भी सामाजिक-सांस्कृतिक जागरण की लहर दौड़ रही थी। द्रविड़ आंदोलन तेज़ी पर था और इसका सीधा असर सिनेमा पर पड़ रहा था। फिल्में अब सिर्फ़ मनोरंजन नहीं रह गईं थीं; वे सामाजिक बदलाव का एक शक्तिशाली माध्यम बन रही थीं।

इस माहौल ने फिल्मकारों को नए विषय दिए। अब कहानियाँ पौराणिक महाकाव्यों से निकलकर आम आदमी की गलियों में आ गईं। ‘पराशक्ति’ (1952) जैसी फिल्मों ने सामाजिक रूढ़ियों पर करारी चोट की। और इस नई ‘कहानी’ को कहने के लिए एक नई ‘दृश्य भाषा’ की ज़रूरत थी। यही वह माँग थी जिसने इस दशक के सिनेमा को इतना खास बना दिया।

ब्लैक एंड व्हाइट का जादू: रंग नहीं, भावना थी

आज हम रंगीन दुनिया के इतने आदी हो चुके हैं कि ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों को ‘पुराना’ समझने लगते हैं। लेकिन 1950 के दशक के फिल्मकारों के लिए ब्लैक एंड व्हाइट एक ‘चॉइस’ था, एक ‘माध्यम’ था। उन्होंने इसकी सीमाओं को अपनी ताकत बना लिया।

  • लाइट एंड शैडो का खेल: बिना रंग के, प्रकाश और छाया ही भावनाओं को व्यक्त करने का सबसे बड़ा ज़रिया बन गए। एक विलेन का चेहरा अँधेरे में छिपा रहता था, तो एक नायिका की मासूमियत चेहरे पर पड़ती रोशनी से उभरती थी। फिल्म ‘अंध नाइगल’ (1958) में अँधेरे और रोशनी के इस खेल को बखूबी देखा जा सकता है। यह ‘लो-की लाइटिंग’ नहीं, बल्कि ‘हाई-कॉन्ट्रास्ट लाइटिंग’ का एक जानदार इस्तेमाल था।

  • टेक्सचर और कंपोजिशन: रंग न होने की वजह से दर्शक का ध्यान फ्रेम की संरचना, पात्रों के कपड़ों के टेक्सचर और सेट की बारीकियों पर ज्यादा जाता था। एक पुरानी दीवार पर पड़ी दरार, बारिश में भीगी सड़क, साड़ी की चुन्नट – सब कुछ एक अलग ही अर्थ लेकर आता था। यह ‘विंटेज तमिल सिनेमा’ की वह खूबसूरती है जो आज के रंगीन दौर में कहीं खो सी गई है।

मिथक से यथार्थ की ओर: फ्रेमिंग का बदलता स्वरूप

1950 के दशक में तमिल सिनेमा ने खुद को पौराणिक फंतासी से निकालकर ‘सोशल रियलिज्म’ की ज़मीन पर उतारना शुरू किया। इस बदलाव ने कैमरे के एंगल और फ्रेमिंग को पूरी तरह बदल दिया।

  • लोकेशन शूटिंग का उदय: फिल्में अब सिर्फ़ स्टूडियो के बनावटी सेट्स तक सीमित नहीं रहीं। कैमरा असली गलियों, गाँवों, खेतों और शहरों में पहुँच गया। ‘मदुरै वीरन’ (1956) जैसी फिल्मों ने देहाती पृष्ठभूमि को एक नए अंदाज़ में पेश किया। इससे ‘नैचुरल लाइटिंग’ का इस्तेमाल बढ़ा और दृश्यों को एक सच्चाई मिली।

  • क्लोज-अप्स की ताकत: इस दशक में अभिनेताओं के चेहरे के ‘क्लोज-अप’ पर जोर दिया जाने लगा। एम.जी. रामचंद्रन (एमजीआर) और एस.एस. राजेंद्रन जैसे अभिनेताओं की लोकप्रियता ने इस ट्रेंड को और बढ़ावा दिया। दर्शक अपने हीरो के चेहरे पर हर भाव को देखना चाहते थे – गुस्सा, प्यार, दर्द। यह ‘ऐक्टर की प्रेजेंस’ को बढ़ाने का एक शानदार तरीका था।

  • वाइड शॉट्स में कहानी: सिर्फ़ क्लोज-अप ही नहीं, वाइड शॉट्स का इस्तेमाल भी बहुत सोच-समझकर किया जाता था। एक वाइड शॉट से पूरे गाँव का नज़ारा, एक महल की भव्यता, या एक जुलूस की भीड़ दिखाई जाती थी। ये शॉट्स दर्शक को कहानी के माहौल में पूरी तरह डुबो देते थे।

Movie Nurture:पुराने लेंस, नई दृष्टि: 1950 के दशक की तमिल फिल्मों की दृश्य भाषा

दिग्गज निर्देशक और उनकी दृश्य दास्ताँ

इस दशक की दृश्य भाषा को समझने के लिए उन शिल्पकारों को जानना ज़रूरी है, जिन्होंने इसे गढ़ा।

  1. एवी मायसामी (A. V. Meiyappan): ‘AVM’ स्टूडियो के संस्थापक के तौर पर, मायसामी ने भव्य और दर्शनीय फिल्मों की नींव रखी। फिल्म ‘बहुत कल्याणी’ (1959) में सेट डिज़ाइन और कॉस्ट्यूम की भव्यता उनकी दृश्य समझ का परिचय देती है। उनकी फिल्मों में एक ‘स्कोप’ और ‘स्केल’ नज़र आता था।

  2. के. रामनाथन (K. Ramnoth): उन्हें एक मास्टर सिनेमैटोग्राफर और निर्देशक के रूप में जाना जाता है। फिल्म ‘एल्लाम इनबा मायम’ (1958) में उन्होंने शहरी जीवन की जटिलताओं को बेहद खूबसूरती से कैद किया। उनकी फ़िल्में ‘तमिल सिनेमा का गोल्डन एरा’ की बेहतरीन मिसाल हैं।

  3. टी. आर. रघुनाथ (T. R. Raghunath): उन्होंने ‘अंध नाइगल’ जैसी फिल्मों में नॉयर (फिल्म नकारात्मक) के साथ प्रयोग किए और लाइटिंग के नए तरीके ईजाद किए, जिसने तमिल सिनेमा की दृश्य भाषा को नई ऊँचाइयाँ दीं।

प्रैक्टिकल इफेक्ट्स का ज़माना: जब जादू हाथ से बनता था

आज के CGI के ज़माने में यह सोचकर ही हैरानी होती है कि उस दौर के सारे खास इफेक्ट्स ‘प्रैक्टिकल’ यानी कैमरे के सामने ही बनाए जाते थे।

  • मिनिएचर सेट्स: महानगरों और महलों के बड़े दृश्य अक्सर मिनिएचर सेट्स बनाकर शूट किए जाते थे। कैमरा एंगल और लाइटिंग की मदद से उन्हें असली जैसा दिखाया जाता था।

  • मैट पेंटिंग: दूर के पहाड़, आसमान में उड़ता विमान, या एक ऐतिहासिक इमारत – ये सब अक्सर हाथ से बनाई गई मैट पेंटिंग्स होती थीं, जिन्हें शॉट में इस कदर मिला दिया जाता था कि दर्शक असली और पेंटिंग के बीच का फर्क नहीं समझ पाते थे। यह ‘क्लासिक तमिल सिनेमा टेक्निक’ का एक जबरदस्त नमूना था।

  • विशेष मेकअप और प्रॉप्स: किसी चरित्र के बूढ़ा दिखने के लिए लगाए गए मेकअप से लेकर एक लड़ाई के दृश्य में इस्तेमाल होने वाले हथियार – सब कुछ हाथ से तैयार किया जाता था। इससे फिल्मों में एक ‘हस्तनिर्मित’ जैसा आकर्षण और ईमानदारी नज़र आती थी।

नई तकनीकों की शुरुआत: ध्वनि और रंग का आगमन

1950 का दशक परिवर्तन का दशक था। इसी दशक में तमिल सिनेमा ने ‘प्लेबैक सिंगिंग’ को पूरी तरह से अपना लिया था। एम.एस. विश्वनाथन और जी. रामानाथन जैसे संगीतकारों की धुनों पर एम.के. टी. बालामुरलीकृष्ण, तिरुचि लोगनाथन, पी. लीला और जीक्की जैसे गायकों की आवाज़ें फिल्मों का अहम हिस्सा बन गईं।

इसका सीधा असर दृश्य भाषा पर पड़ा। अब गानों को सिर्फ़ दो लोगों के आपस में देखने भर से ज़्यादा कुछ नहीं दिखाया जाता था। गानों को कहानी से जोड़ते हुए, उन्हें एक ‘दृश्य-श्रव्य कविता’ का रूप दिया जाने लगा। ‘मदुरै वीरन’ के गाने “एन्गिरुंदो वानम” जैसे गाने इसका बेहतरीन उदाहरण हैं।

वहीं दशक के अंत तक रंगीन फिल्मों की शुरुआत भी हो गई। ‘अलिबाबावुम 40 थिरुदारगलुम’ (1956) तमिल की पहली रंगीन फिल्म बनी। हालाँकि रंगीन फिल्में आम बनने में अभी समय लगना था, लेकिन इसने एक नई संभावना का द्वार खोल दिया था।

Movie Nurture:पुराने लेंस, नई दृष्टि: 1950 के दशक की तमिल फिल्मों की दृश्य भाषा

दृश्य भाषा की विरासत: आज के सिनेमा पर असर

1950 के दशक की यह दृश्य भाषा आज के तमिल और दक्षिण भारतीय सिनेमा की नींव है।

  • मणि रत्नम की फिल्मों में जो काव्यात्मकता और फ्रेम की सुन्दरता दिखती है, उसकी जड़ें इसी दशक में खोजी जा सकती हैं।

  • बाला या वेट्रीमारन जैसे डायरेक्टर्स की फिल्मों में जो कच्चा और यथार्थवादी स्टाइल है, वह इसी ‘सोशल रियलिज्म’ की परंपरा से आता है।

  • ‘बाहुबली’ जैसी फिल्मों में दिखने वाली भव्यता और स्केल की भावना, एवीएम जैसे स्टूडियो की भव्य फिल्मों की याद दिलाती है।

निष्कर्ष: एक ऐसा दशक जिसने रास्ता दिखाया

1950 का दशक तमिल सिनेमा का एक ऐसा स्वर्ण युग था, जब तकनीकी सीमाओं ने रचनात्मकता को कुचला नहीं, बल्कि उसे नई उड़ान दी। पुराने लेंस और ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म के रोल के सहारे फिल्मकारों ने एक ऐसी दृश्य भाषा गढ़ी, जो आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने सिखाया कि एक शक्तिशाली फ्रेम, एक सही एंगल और प्रकाश-छाया का सही इस्तेमाल किसी भी विशेष इफेक्ट से ज़्यादा असरदार हो सकता है।

अगली बार जब आप ‘नेतृजी ओका बाली’ या ‘पसंगा मुदलू’ जैसी पुरानी तमिल फिल्में देखें, तो सिर्फ़ कहानी और गानों पर ही नहीं, बल्कि उस ‘फ्रेम’ पर भी गौर करें जिसमें वह कहानी कही गई है। आप पाएँगे कि वे पुराने लेंस आज भी एक ‘नई दृष्टि’ देने का माद्दा रखते हैं। यह दशक सिनेमा के छात्रों, फिल्म शोधार्थियों और ‘तमिल सिनेमा हिस्ट्री’ में दिलचस्पी रखने वाले हर व्यक्ति के लिए एक अनमोल खजाना है। यह वह दौर था जब तमिल सिनेमा ने सचमुच देखना सीखा और दुनिया को दिखाना सिखाया।

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