ब्लैक एंड व्हाइट युग के 5 बेहतरीन विलेन: जब खलनायकों का खौफ़ ही फ़िल्म की जान होता था

Movie Nurture: ब्लैक एंड व्हाइट युग के 5 बेहतरीन विलेन: जब खलनायकों का खौफ़ ही फ़िल्म की जान होता था

आज के दौर में जब स्पेशल इफेक्ट्स की बमबारी और स्टाइलिश एंटी-हीरोज़ का बोलबाला है, मेरा दिल अक्सर उस जमाने को तरस जाता है जब डर सीधे आँखों से आँखें मिलाकर आता था। जब खलनायक की एंट्री पर शहनाई की तेज तान या विज्ञापनों की रहस्यमयी धुन बज उठती थी, और पूरा सिनेमाघर एक सामूहिक सिहरन से गुजरता था। वह जमाना था हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर का, काला-सफेद फिल्मों का वह स्वर्ण युग, जहाँ नायक तो शानदार थे, लेकिन कहानी की असली रगों में जो खून दौड़ाता था, वह था उसका खलनायक

तब और अब में सबसे बड़ा फर्क, मेरी नजर में, खलनायक की परिभाषा और उसकी ताकत का है। आज के विलेन अक्सर एक ‘बैकस्टोरी’ के बोझ तले दबे होते हैं, उनके पास फिलॉसफी के पुलिंदे होते हैं। लेकिन उस पुराने जमाने के हिंदी सिनेमा में, खलनायक सीधा प्रहार करता था। उसका डर शारीरिक था, उसकी बुराई नैतिकता को चुनौती देती थी, और उसकी मौजूदगी ही यह एहसास दिलाती थी कि अच्छाई के लिए लड़ना कितना जरूरी और कितना मुश्किल है।

यह लेख सिर्फ पांच नाम गिनाने का नहीं है। यह उस कल्चरल लैंडस्केप की पड़ताल है, जहाँ ये खलनायक पैदा हुए। उस सिनेमाई माहौल को समझने का है, जहाँ संवाद की गूँज और आँखों के अभिनय पर सब कुछ टिका था। तो चलिए, धुंधले पड़ चुके उस फिल्मी रील के जरिए एक सफर करते हैं, और मिलते हैं उन पांच धुरंधरों से, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में खलनायकी की नींव रखी और एक अमिट विरासत छोड़ गए।

Movie Nurture: ब्लैक एंड व्हाइट युग के 5 बेहतरीन विलेन

वह दौर जब खलनायक ‘बना’ जाता था

आज से पचास-साठ साल पहले, सिनेमा समाज का आईना हुआ करता था। और उस समाज में बुराई को दूर से ही पहचान लिया जाता था। क्लासिक हिंदी सिनेमा के विलेन को ‘ग्रे शेड्स’ में नहीं, बल्कि गहरे काले रंग में दिखाया जाता था। उसकी पोशाक, उसका मेकअप, उसका हावभाव – सब कुछ एक संकेत देता था। मगर इसमें भी एक कला थी। यह कला थी दर्शक के दिमाग में सीधे उतर जाने की। बिना किसी स्पष्टीकरण के, उसकी पहली नजर, उसकी पहली हंसी ही बता देती थी कि यह आदमी खतरनाक है।

ये खलनायक अक्सर समाज की उन बुराइयों का प्रतीक होते थे जो उस जमाने में सबसे भयावह थीं – जमींदार का जुल्म, मिल मालिक का शोषण, तस्कर की बेरहमी, या पारिवारिक षड्यंत्र की गहरी जड़ें। इनका मकसद सिर्फ पैसा या ताकत ही नहीं, बल्कि सामान्य जन के मन में दहशत बिठाना भी होता था। और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। वे हमारे आस-पास के डर का चेहरा बन जाते थे।

1. प्राण: वह नाम जो ‘खलनायक’ का पर्याय बन गया

अगर हिंदी सिनेमा में खलनायकी का एक सबसे ऊँचा खंभा है, तो वह है प्राण सिकंदर ख़ान। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने विलेन की भूमिका को एक आर्ट फॉर्म में बदल दिया। प्राण साहब की खूबी यह थी कि वे सिर्फ खलनायक नहीं थे; वे एक पूर्ण चरित्र अभिनेता थे, जो बुराई को भी इतना सम्मान देते थे कि वह फिल्म के नायक से ज्यादा यादगार हो जाती थी।

उनकी बुराई में अक्सर एक शिष्टाचार झलकता था। वह गरिमामयी थी। ‘मदर इंडिया’ (1957) में उनका मुख्तार सिंह देखिए – एक सूदखोर, लालची जमींदार। उसकी हंसी में एक ठंडापन है, जो रोंगटे खड़े कर देता है। फिर ‘मुगल-ए-आज़म’ (1960) में उनका बहारम खान। यहाँ बुराई सीधी नहीं, राजनीतिक है। वह शहंशाह अकबर के सबसे विश्वस्त सेनापति से, उनके सबसे बड़े विरोधी में तब्दील हो जाता है। उनकी आँखों का जोश और अपनी बात पर अटल विश्वास, उन्हें एक ट्रेजिक विलेन बना देता है।

मगर प्राण की असली महारत वहाँ देखने को मिलती है, जहाँ वे थोड़ा मनोरंजक अंदाज अपनाते हैं। ‘जिस देश में गंगा बहती है’ (1960) का राका हो या ‘उपकार’ (1967) का मलंग चाचा – इन चरित्रों में एक हास्य भी है, एक चालबाजी भी है, जो उन्हें और भी खतरनाक बना देती है। प्राण ने यह साबित किया कि खलनायक को हमेशा गुर्राते हुए नहीं दिखना चाहिए। कभी-कभी एक मुस्कुराता हुआ चेहरा, एक शांत स्वर में बोला गया खतरा, ज्यादा असरदार होता है।

Movie Nurture: Praan

2. अजित: आवाज़ ही जिसका हथियार थी

अगर प्राण की ताकत उनकी स्क्रीन उपस्थिति और आँखों के हावभाव में थी, तो अजित वछाणी की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी आवाज़। उनकी गंभीर, गड़गड़ाहट भरी, धीमी लेकिन भारी आवाज़ एक अलग तरह का मनोवैज्ञानिक भय पैदा करती थी। अजित साहब का अभिनय शैलीबद्ध था, जैसे वे हर संवाद को एक घोषणा की तरह बोल रहे हों।

‘मुगल-ए-आज़म’ में उनका दुर्र मोहम्मद याद कीजिए। उनका वह संवाद – “तानसेन, राग दीपक गाओ…” – उनकी आवाज़ में एक ऐसा आदेश है जिसमें न मानने की कोई गुंजाइश नहीं। वह आवाज़ शाही फरमान जैसी लगती है। फिर ‘ज्वेल थीफ’ (1967) में संग्राम सिंह का किरदार। यहाँ अजित की बुराई और भी स्पष्ट, और भी धमकी भरी है। उनके चेहरे पर भावनाएँ कम, लेकिन आवाज़ में इतना दबाव है कि दर्शक उनके सामने नायक की हिम्मत के लिए दुआ माँगने लगते हैं।

अजित ने खलनायक की छवि को एक शारीरिक बल दिया। वे लंबे-चौड़े, एक दबदबे वाले व्यक्तित्व के मालिक थे। जब वे स्क्रीन पर आते थे, तो लगता था जैसे उन्होंने पूरे फ्रेम पर कब्जा कर लिया है। उनकी बुराई शोर-शराबे वाली नहीं, बल्कि गहरी और स्थिर थी, जैसे कोई पहाड़ जो हिलने का नाम नहीं लेता। उन्होंने यह सिखाया कि चुप्पी और एक टक की नजरें भी डायलॉग से ज्यादा खतरनाक हो सकती हैं।

Movie Nurture: Ajit

3. मदन पुरी: हंसते हुए खलनायक का खौफ

मदन पुरी की खलनायकी एक अलग ही दर्जे की थी। अगर प्राण और अजित की बुराई में एक गंभीरता थी, तो मदन पुरी की बुराई अक्सर उन्माद के कगार पर नाचती हुई दिखती थी। उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक, उनकी हंसी में एक पागलपन का सा स्वर – यह सब मिलकर एक ऐसा डर पैदा करता था जो असहज करने वाला था।

फिल्म ‘मेरा गाँव मेरा देश’ (1971) में उनका जब्बर सिंह इसका बेहतरीन उदाहरण है। वह एक ऐसा जमींदार है जिसे दूसरों का दर्द देखने में मजा आता है। उसकी हंसी सुनकर दिल दहल उठता है। उनकी सबसे बड़ी ताकत थी अपने किरदारों में एक अनपेक्षितता भरना। आप कभी नहीं जान पाते थे कि यह आदमी अगले पल क्या कर बैठेगा। क्या वह गुस्से में आग बरसेगा या शांत होकर कोई और षड्यंत्र रचेगा?

मदन पुरी ने हास्यास्पद और भयानक के बीच की उस पतली रेखा पर बेहतरीन अभिनय किया। ‘शोले’ (1975) में उनका मोहन, गब्बर सिंह का आदमी, भले ही छोटी भूमिका थी, लेकिन उसकी मूर्खता में भी एक खतरा छुपा था। मदन पुरी ने साबित किया कि खलनायक हमेशा तेज दिमाग वाला या शानदार नहीं होता। कभी-कभी एक बेवकूफ, जिद्दी और अप्रत्याशित दुश्मन ज्यादा खतरनाक हो सकता है, क्योंकि उसके कदमों का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है।

MOvie Nurture: Madan Puri

4. कन्हैया लाल: मासूमियत के भेस में छुपा शैतान

हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ ही ऐसे खलनायक हुए हैं जो देखने में एकदम साधारण, यहाँ तक कि भोले-भाले लगते थे, लेकिन अंदर से पत्थर दिल थे। कन्हैया लाल उनमें से एक थे। उनका चेहरा गोल-मटोल, आवाज़ में एक साधारण सा लहजा – ऐसे में जब वे कोई बुरा काम करते थे, तो उसका असर दोगुना हो जाता था।

फिल्म ‘गोपी’ (1970) में उनका उस्ताद याद कीजिए। वह एक संगीत गुरु हैं, लेकिन उनकी महत्वाकांक्षा और ईर्ष्या उन्हें कितना नीचे गिरा देती है। उनकी बुराई दिखावटी नहीं है। वह धीरे-धीरे, एक विश्वासघात की तरह सामने आती है। यही कारण है कि उनके चरित्र ज्यादा यथार्थवादी और इसीलिए ज्यादा डरावने लगते थे। वे हमारे आस-पास के उन लोगों की तरह थे, जिन पर हम भरोसा करते हैं, मगर जो पीठ पीछे छुरा घोंप देते हैं।

कन्हैया लाल की शक्ति सूक्ष्म अभिनय में थी। एक भौंह का हल्का सा उठना, आँखों की चमक का बदलना, होंठों पर आई एक कपटपूर्ण मुस्कान – इन छोटे-छोटे इशारों से वे अपने चरित्र की द्विध्रुवीयता को दर्शा देते थे। उन्होंने यह साबित किया कि खलनायकी के लिए बड़े-बड़े जुमले बोलने की जरूरत नहीं। कभी-कभी चुपचाप किया गया काम, चुपचाप बोला गया झूठ, ज्यादा घातक होता है। उनके खलनायक सामान्य जन के डर का प्रतिनिधित्व करते थे – उस डर का जो एक परिचित चेहरे से आता है।

Movie Nurture: Kanahyi Lala

5. राशिद खान: सहज, प्राकृतिक और बेहद खतरनाक

इस सूची का अंतिम नाम, लेकिन कतई कमजोर नहीं। राशिद खान वह अभिनेता थे जिनकी खलनायकी में एक सहज प्रवाह था। वे इतने प्राकृतिक लगते थे कि लगता ही नहीं था कि अभिनय कर रहे हैं। इसी प्राकृतिकता में उनकी ताकत छुपी थी। उनके चरित्र अक्सर समाज के उस तबके से आते थे जो सत्ता के नजदीक होता है – पुलिस इंस्पेक्टर, मुखबिर, छोटा-मोटा गुंडा।

फिल्म ‘दो बदन’ (1966) में उनकी भूमिका देखने लायक है। वे एक ऐसे इंसान का किरदार निभाते हैं जिसकी बुराई किसी सिद्धांत या लालच से नहीं, बल्कि सिर्फ बुरा होने की प्रवृत्ति से उपजती है। उनका अभिनय शांत, लेकिन नुकीला था। वे ज्यादा नहीं बोलते थे, लेकिन उनकी मौन मौजूदगी ही एक दबाव बनाए रखती थी।

राशिद खान ने मध्यम स्तर के खलनायक के किरदार को एक नई पहचान दी। वे हमेशा मुख्य विलेन नहीं होते थे, लेकिन उनकी उपस्थिति कहानी को एक यथार्थवादी जमीन देती थी। उन्होंने दिखाया कि बुराई हमेशा शानदार महलों में नहीं, बल्कि हमारी गलियों के कोनों, सामान्य दफ्तरों और रोजमर्रा की जिंदगी में भी पनप सकती है। उनकी खलनायकी का डर इसलिए भी ज्यादा था क्योंकि वह हमारे बेहद करीब था।

MOvie Nurture: Rashid Khan

नायक को महान बनाते थे ये खलनायक

आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो एक बात साफ हो जाती है। उस दौर के खलनायक सिर्फ ‘बुरे आदमी’ नहीं थे। वे एक काउंटरप्वाइंट थे। वे नायक की नैतिकता, उसकी ताकत और उसके संघर्ष को परिभाषित करते थे। दिलीप कुमार की संवेदनशीलता तब और चमक उठती थी, जब प्राण का मुख्तार सिंह उन पर हावी होने की कोशिश करता था। राज कुमार की देशभक्ति तब और प्रभावशाली लगती थी, जब अजित का संग्राम सिंह उनके सामने खड़ा होता था।

इन खलनायकों के बिना, उन फिल्मों की कहानियाँ फीकी पड़ जातीं। क्योंकि इन्होंने ही संघर्ष की ऊँचाई तय की थी। इनके खिलाफ लड़ाई नायक के लिए सिर्फ जीवन-मरण का सवाल नहीं, बल्कि मूल्यों और आदर्शों की लड़ाई बन जाती थी। यही वह चीज है जो आज की कई फिल्मों में गायब सी लगती है।

एक विरासत जो धुंधली पड़ गई

समय बदला। सिनेमा बदला। रंग आए, तकनीक आई, और खलनायक की परिभाषा भी बदलने लगी। 70 के दशक में एक नए किस्म का खलनायक आया – गब्बर सिंह, मोगैम्बो – जो सीधे हिंसा और अराजकता का प्रतीक था। फिर धीरे-धीरे भूमिकाएँ और जटिल होती गईं। आज खलनायक अक्सर वह होता है जिसके पास अपनी दर्दभरी कहानी होती है।

मगर उस ब्लैक एंड व्हाइट युग की खलनायकी की मासूमियत और सीधापन कहीं खो सा गया है। आज का दर्शक शायद उस तरह के ‘स्टाइलाइज्ड’ खलनायक को थोड़ा अतिरंजित पाए। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उस समय के सीमित तकनीकी साधनों में, सिर्फ अपने चेहरे, अपनी आवाज़ और अपने शरीर के हावभाव से पूरे सिनेमाघर में दहशत फैलाना कितने बड़े हुनर की बात थी।

अंतिम शब्द: स्मृति में जीवित

आज भी, जब टीवी पर कोई पुरानी काले-सफेद फिल्म दिखती है और प्राण की वह ठंडी मुस्कान या अजित की गड़गड़ाहट भरी आवाज़ सुनाई देती है, तो एक पल के लिए वही पुराना जादू काम कर जाता है। ये खलनायक सिर्फ फिल्मी किरदार नहीं रहे, वे हमारी सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गए हैं। वे हमें याद दिलाते हैं कि डर का एक अपना सौंदर्यशास्त्र भी होता है, और एक अच्छी तरह से निभाया गया नकारात्मक चरित्र, सकारात्मक चरित्र से कहीं ज्यादा गहरी छाप छोड़ सकता है।

तो अगली बार जब आप किसी पुरानी फिल्म को देखने बैठें, तो सिर्फ नायक का जलवा न देखें। उस खलनायक पर भी नजर डालें, जिसकी बदौलत नायक ‘नायक’ बन पाया। उसकी आँखों के इशारे, उसकी आवाज़ के उतार-चढ़ाव और उसकी मौजूदगी के डर को महसूस करें। क्योंकि वह दौर था जब खलनायक सिनेमा की सबसे मजबूत नाड़ी हुआ करता था, और उसकी धड़कन ही फिल्म को जीवित रखती थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *