कोरियन सिनेमा की बात करते ही ज़्यादातर लोगों के दिमाग में “पैरासाइट”, “ओल्डबॉय” या हाल की नेटफ्लिक्स सीरीज़ का नाम आता है, लेकिन 1970 के दशक में भी कोरिया में ऐसे साहसी और प्रयोगधर्मी निर्देशक काम कर रहे थे जिन्होंने घरेलू जिंदगी, सेक्सुअलिटी और वर्ग संघर्ष को मिलाकर साइकोलॉजिकल थ्रिलर की एक बिल्कुल अलग दुनिया बना दी। इन्हीं निर्देशकों में सबसे बड़ा नाम है किम की‑यंग, और उनकी सबसे चर्चित फिल्मों में से एक है “वुमन ऑफ फायर” (Woman of Fire, 1971)।
आपने कभी सोचा है कि एक आग कितने रंग दिखा सकती है? कभी विनाश का लाल तो कभी शुद्धिकरण का नीला। 1971 में आई कोरियाई फिल्म ‘वूमन ऑफ फायर’ (ह्वाल뱀, Hwaryeom) ठीक वैसी ही एक बहुरंगी, बहुआयामी ज्वाला है। यह कोई साधारण लव स्टोरी या मेलोड्रामा नहीं है। यह एक ऐसा दर्पण है जो 70 के दशक के दक्षिण कोरिया के सामाजिक ताने-बाने, औरत की इच्छाओं की जटिलता और एक राष्ट्र की सामूहिक बेचैनी को बेहद बारीकी से दिखाता है।
यह फिल्म ‘ओल्ड बॉय’ या ‘पैरासाइट’ जितनी चर्चित तो नहीं है, लेकिन अगर आप कोरियाई सिनेमा की गहरी जड़ों को समझना चाहते हैं, तो यह आपकी ‘मस्ट वॉच’ लिस्ट में सबसे ऊपर होनी चाहिए।
वो दौर जब कोरिया सपने देखना सीख रहा था: फिल्म का ऐतिहासिक-सामाजिक संदर्भ
1970 का दशक दक्षिण कोरिया के लिए एक अजीबोगरीब दौर था। एक तरफ देश तेजी से औद्योगीकरण और आर्थिक विकास की रेस में दौड़ रहा था (जिसे “हान नदी का चमत्कार” कहा गया), वहीं दूसरी तरफ राष्ट्रपति पार्क चुंग-ही का सैन्य तानाशाही शासन चल रहा था। सेंसरशिप सख्त थी, लोगों के मौलिक अधिकार दबे हुए थे। ऐसे में कला और सिनेमा के लिए जगह बहुत छोटी थी। फिर भी, इसी दौर में ‘वूमन ऑफ फायर’ जैसी फिल्म बनी।
फिल्म के निर्देशक, किम की-योंग (Kim Ki-young), को आज कोरियाई सिनेमा का एक ‘कल्ट’ फिगर माना जाता है। उनकी फिल्में अक्सर गहरे मनोवैज्ञानिक, कामुक और सामाजिक रूप से चुनौतीपूर्ण हुआ करती थीं। ‘वूमन ऑफ फायर’ में वो पहली बार एक महिला की कामुकता और उसकी आंतरिक आग को केंद्र में लाए। यह उस जमाने में एक साहसिक कदम था, जब औरतें फिल्मों में या तो पवित्र माँ का रोल करती थीं या बलि की बकरी बनती थीं।
कहानी: एक साधारण घर से पागलपन तक
शुरुआती सेट‑अप: गाँव की लड़की, शहर की चमक
फिल्म की शुरुआत दो गाँव की लड़कियों से होती है जो बेहतर जिंदगी की तलाश में सियोल आती हैं। इनमें से एक है म्योंग‑जा (Myungja / Myeong‑ja), जिसे यौन‑हिंसा और सामाजिक शोषण का सामना करना पड़ता है।
शहर में आते ही उन्हें काम की तलाश में एजेंट शोषित करते हैं।
रास्ते में एक सीन में लोहारों की दुकान और लाल‑गर्म लोहे के क्लोज‑अप्स के साथ पुरुषों की नज़र और हिंसा का मिश्रण दिखाया जाता है, जो बाद की हिंसा का विजुअल फोरशैडो बन जाता है।
यहीं से फिल्म यह साफ कर देती है कि “Women of Fire Korean movie” केवल घरेलू मेलोड्रामा नहीं, बल्कि सामाजिक कमेंट्री भी है – खासकर गरीब और गाँव से आई महिलाओं की असुरक्षा पर।
घर में प्रवेश: चिकन फार्म और कम्पोज़र दंपति
म्योंग‑जा को एक मिडल‑क्लास दंपति के घर में बतौर नौकरानी काम मिल जाता है। यह परिवार चिकन फार्म चलाता है, और पति डोंग‑सिक (Dong‑sik) सस्ते, पॉपुलर गाने लिखने वाला कम्पोज़र है, जबकि पत्नी जोंग‑सुक (Jeong‑suk) बिज़नेस की रीढ़ है।
घर का स्पेस ही फिल्म का मुख्य युद्ध‑क्षेत्र है: नीचे का हिस्सा फैमिली और काम के लिए, ऊपर का कमरा नौकरानी के लिए।
सीढ़ियाँ एक प्रतीक बन जाती हैं – ऊपर‑नीचे जाने वाली सत्ता, इच्छा और कंट्रोल।
पाप की शुरुआत: शोषण, आकर्षण और अफेयर
एक हिंसक घटना के बाद म्योंग‑जा गर्भवती हो जाती है और डोंग‑सिक के साथ उसका संबंध उलझता चला जाता है। कई रिव्यूज़ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि फिल्म में यह रिश्ता “सिर्फ अफेयर” नहीं, बल्कि ट्रॉमा से उपजा हुआ एक जटिल पावर‑डायनैमिक है।
डोंग‑सिक का चरित्र कमजोर और स्वार्थी है, जो इच्छा और अपराधबोध के बीच झूलता रहता है।
पत्नी जोंग‑सुक आर्थिक रूप से मजबूत, लेकिन निजी जिंदगी में असुरक्षित और नियंत्रक है।
म्योंग‑जा शुरू में पीड़िता दिखती है, लेकिन धीरे‑धीरे वह घर की पावर स्ट्रक्चर को चुनौती देने लगती है।
धीरे‑धीरे बढ़ती पागलपन की आग
किम की‑यंग की फिल्म‑स्टाइल की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह छोटी‑छोटी घटनाओं से तनाव को धीरे‑धीरे बढ़ाते हैं, और फिर अचानक ग्रोतेस्क (भयावह‑अजीब) स्थितियों में उछाल देते हैं।
घर में बच्चे का जन्म, गर्भपात, ब्लैकमेल, लगातार झगड़े – ये सब मिलकर माहौल को जहरीला बनाते हैं।
चिकन फार्म का रोज़मर्रा का काम, खून, पंख, जानवरों का मांस – ये सब घरेलू हिंसा और मानसिक टूटन के विज़ुअल एक्सटेंशन बन जाते हैं।
ऊपरी कमरे, सीढ़ियों पर होने वाले झगड़े, लाल लाइट्स और ज़बरदस्त कैमरा एंगल पूरी फिल्म को domestic horror जैसा बना देते हैं।
फिल्म के क्लाइमेक्स तक आते‑आते घर एक तरह से क्राइम सीन में बदल जाता है, जहाँ आत्महत्या, हत्या और पागलपन की सीमाएँ धुंधली हो जाती हैं।
अभिनय और पात्र: यौन‑राजनीति का तीखा चित्रण
म्योंग‑जा (Youn Yuh‑jung) – मासूमियत से पागलपन तक
“वुमन ऑफ फायर 1971 रिव्यू” लिखते समय सबसे ज्यादा तारीफ़ जिस चीज़ की होती है, वह है यौन यु‑जंग (Youn Yuh‑jung) का दमदार अभिनय।
यह उनकी शुरुआती फिल्मों में से है, और बाद में उन्होंने “मिनारी” के लिए ऑस्कर भी जीता – इस लिहाज़ से यह फिल्म सिनेफाइल्स के लिए ऐतिहासिक महत्व रखती है।
म्योंग‑जा का सफर एक शोषित गाँव की लड़की से लेकर हिंसक, मानसिक रूप से अस्थिर और बदले की आग में झुलसी औरत तक जाता है।
कई समीक्षाएँ कहती हैं कि यहाँ हाउसमेड महज़ “सेडक्ट्रेस” नहीं, बल्कि समाज और पुरुषों द्वारा लगातार धकेली गई एक महिला है जो अंततः खुद भी विनाश का कारण बन जाती है।
डोंग‑सिक – कमजोर पुरुष, मजबूत इच्छाएँ
डोंग‑सिक का किरदार उन पुरुषों का प्रतिनिधि है जो खुद को कलात्मक और संवेदनशील मानते हैं, लेकिन असल में वे भावनात्मक रूप से बेहद कमजोर और स्वार्थी होते हैं।
वह न तो पत्नी के प्रति पूर्णतः वफ़ादार है, न ही म्योंग‑जा के प्रति न्यायपूर्ण।
आर्थिक दबाव, रचनात्मक असफलता और शारीरिक इच्छा – इन सबके बीच वह बार‑बार नैतिक पतन की ओर झुकता है।
जोंग‑सुक – पत्नी, बिज़नेस पार्टनर, और प्रतिद्वंद्वी
जोंग‑सुक का चरित्र बहुत दिलचस्प है क्योंकि वह सिर्फ “पीड़ित पत्नी” नहीं, बल्कि एक प्रैक्टिकल, सख्त और महत्वाकांक्षी औरत भी है।
वह घर और चिकन फार्म दोनों संभालती है, पति की आय से ज़्यादा खुद कमाती है, और इसलिए घर की सत्ता अपने हाथ में रखना चाहती है।
म्योंग‑जा के आने के बाद वह धीरे‑धीरे उसे एक खतरे की तरह देखने लगती है, और दोनों के बीच एक मनोवैज्ञानिक युद्ध शुरू हो जाता है।
निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी: रंग, कोण और आग
रंगों का खेल: लाल और नीला
किम की‑यंग ने “द हाउसमेड” को ब्लैक‑एंड‑व्हाइट में बनाया था, लेकिन “वुमन ऑफ फायर” में वे रंगों के ज़रिए किरदारों की मानसिक स्थिति को विज़ुअली व्यक्त करते हैं।
लाल रंग – खून, इच्छा, पाप, खतरा;
नीला या ठंडे शेड – अपराधबोध, दूरी, उदासी।
कैमरा मूवमेंट और एंगल
फिल्म में कई जगह डच एंगल्स (तिरछे कैमरा शॉट्स) इस्तेमाल किए गए हैं, जो किरदारों के डगमगाते मानसिक संतुलन को दर्शाते हैं।
सीढ़ियों के शॉट्स बार‑बार दिखते हैं – ऊपर‑नीचे दौड़ते किरदारों के साथ सत्ता, वर्ग और इच्छा की चालें भी ऊपर‑नीचे होती रहती हैं।
घर के संकरे स्पेस में कैमरा लगातार घूमता, क्लोज‑अप और वाइड शॉट्स के बीच स्विच करता है, जिससे क्लॉस्ट्रोफोबिक, घुटन भरा माहौल बनता है।
क्यों यह फिल्म आज भी प्रासंगिक है? एक गहन समीक्षा
1. कामुकता का एक अलग ही चित्रण:
1970 के दशक में भी, यह फिल्म सीधे-सीधे स्त्री कामुकता (female sexuality in Korean cinema) को दिखाने से नहीं डरती। लेकिन यहाँ कामुकता हॉलीवुड की तरह भौंडी नहीं है। यह मनोविज्ञान में गहरे उतरती है। मिसेज ओह का जोंग-जा पर आकर्षण सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि उसकी अपनी खोई हुई मासूमियत को पाने की इच्छा है। वह जोंग-जा को एक कच्ची मिट्टी की तरह गढ़ती है, जिसमें वो अपने सपने और इच्छाएँ भर सके। यह ‘फेमेल गेज’ (स्त्री दृष्टि) का एक दुर्लभ उदाहरण है 70 के दशक के सिनेमा में।
2. वर्ग और लैंगिक राजनीति का मकड़जाल:
फिल्म सियोल के उच्च वर्ग (योंगसान district society) और ग्रामीण जीवन के अंतर को बहुत खूबसूरती से दिखाती है। जोंग-जा का सादा सूती हंबोक (पारंपरिक पोशाक) और मिसेज ओह का महँगा, पश्चिमी स्टाइल के कपड़े इस अंतर को बिना शब्दों के ही व्यक्त कर देते हैं। मिसेज ओह की शादी एक बूढ़े प्रोफेसर से हुई है, जो शायद धन और सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए थी। इसलिए वह अपनी कामुक ऊर्जा और बौद्धिक क्षमता को जोंग-जा में डालकर खुद को अभिव्यक्त करती है। यहाँ औरत की इच्छा, उसकी सामाजिक हैसियत और उसके शोषण के बीच एक गहरा नाता दिखता है।
3. किम की-योंग का अनूठा निर्देशन:
किम की-योंग की शैली (Kim Ki-young filmmaking style) बहुत ही नाटकीय और थिएटरिकल है। वह क्लोज-अप शॉट्स का बहुत इस्तेमाल करते हैं, खासकर चेहरों के। जोंग-जा की मासूम, हैरान आँखें और मिसेज ओह की तीखी, मंत्रमुग्ध कर देने वाली नजरें कैमरे में कैद होकर कहानी खुद बयान कर देती हैं। उनके सेट डिजाइन (अक्सर उनका अपना घर) भी अजीबोगरीब होते हैं – जंगली पौधे, एक्वेरियम में मछलियाँ, अजीब सी मूर्तियाँ – जो किरदारों की उलझी हुई मानसिक दशा को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाते हैं। इसे ‘किम की-योंग गोथिक’ कहा जाता है।
4. ओ जंग-ही और यून इल-बोंग का कालजयी अभिनय:
ओ जंग-ही (Yeo Jeong-hye) ने जोंग-जा का किरदार इतनी तीव्रता से निभाया है कि आप उसकी पीड़ा, उलझन और बदलाव को सीधे महसूस करते हैं। वहीं यून इल-बोंग (Yoon Il-bong) का अभिनय तो और भी शानदार है। बिना ज्यादा शोर मचाए, सिर्फ अपने चेहरे के भावों और शारीरिक भाषा से वह मिसेज ओह की पूरी जटिलता – उसका अहं, उसकी तड़प, उसका अकेलापन – दर्शा देती हैं। यह कोरियाई सिनेमा (1970s Korean cinema) के इतिहास की सबसे यादगार अभिनय प्रस्तुतियों में से एक है।
5. वो अंत जो बहस छोड़ जाता है:
फिल्म का अंत बहुत ही विवादास्पद और खुला हुआ (ambiguous ending) है। इसे स्पॉइलर से बचाते हुए इतना कह सकता हूँ कि यहाँ ‘आग’ अपने चरम पर पहुँचती है। क्या यह प्रतिशोध है? आत्म-विनाश है? मुक्ति है? किम की-योंग कोई आसान जवाब नहीं देते। वो दर्शक को उलझा देते हैं, ताकि वह फिल्म छोड़ने के बाद भी उसके बारे में सोचता रहे। यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है।
भारतीय सिनेमा के संदर्भ में: एक तुलनात्मक दृष्टि
अगर हम भारतीय सिनेमा की बात करें, तो 70 का दशक यहाँ भी सामाजिक बदलाव का दौर था। अमिताभ बच्चन का ‘एंग्री यंग मैन’ उसी सिस्टम के खिलाफ गुस्सा था जिसमें ‘वूमन ऑफ फायर’ की नायिकाएँ फंसी हैं। लेकिन महिला-केंद्रित, उसकी कामुकता को इतने खुलेपन से दिखाने वाली फिल्में उस दौर में भारत में भी दुर्लभ थीं। शायद ‘अर्थ’ (1978) या ‘भूमिका’ (1977) जैसी फिल्में इसकी थोड़ी-बहुत समकक्ष हो सकती हैं, जहाँ औरतें अपनी पहचान और इच्छाओं के लिए संघर्ष करती दिखती हैं।
‘वूमन ऑफ फायर’ की तरह की मनोवैज्ञानिक जटिलता और गहराई शायद रित्विक घटक या मृणाल सेन की फिल्मों में मिले। लेकिन कोरियाई सिनेमा का यह अपना एक अलग ही रंग है – ज्यादा क्लॉस्ट्रोफोबिक, ज्यादा आंतरिक और ज्यादा प्रतीकात्मक।
दुर्भाग्य से, यह फिल्म आसानी से स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध नहीं है। कुछ कोरियन आर्काइव वेबसाइट्स या यूट्यूब पर इसके टुकड़े मिल सकते हैं। अगर आपको कोरियाई सिनेमा में गहरी दिलचस्पी है, तो इसे ढूंढने की कोशिश जरूर करें।
अंतिम शब्द: एक अमिट छाप
‘वूमन ऑफ फायर 1971’ सिर्फ एक फिल्म नहीं है; यह एक अनुभव है। यह आपको असहज कर सकती है, आपको हैरान कर सकती है, लेकिन इंडिफरेंट (उदासीन) नहीं छोड़ेगी। यह फिल्म कोरियाई सिनेमा की उस सोने की धारा का हिस्सा है जिसने आज के ‘कोरियन वेव’ की नींव रखी। बोंग जून-हो, पार्क चान-वूक जैसे निर्देशकों की फिल्मों में आपको इसी तरह की सामाजिक टकराव, अजीबोगरीब रिश्ते और शानदार सिनेमेटोग्राफी के दर्शन होंगे।
तो अगली बार जब आप कोई आधुनिक कोरियन फिल्म देखें और उसकी बारीकियों से हैरान हों, तो याद रखिए कि इसकी जड़ें ‘वूमन ऑफ फायर’ जैसी फिल्मों में गहरी धंसी हुई हैं। यह वो ज्वाला थी जिसने रास्ता रोशन किया।
क्या आपने ‘वूमन ऑफ फायर’ देखी है? या कोरियाई सिनेमा की कोई और पुरानी क्लासिक फिल्म पसंद है? कमेंट में अपनी राय जरूर साझा करें।


