बॉम्बे के एक श्मशान घाट में असामान्य सन्नाटा पसरा हुआ था। जनवरी की ठंडी हवा में सैकड़ों लोग खड़े थे, लेकिन किसी की आँखें सूखी नहीं थीं। एक पूरी पीढ़ी का बचपन, जवानी और प्यार उनकी आँखों के सामने से गुजर रहा था। वह दिन था 31 जनवरी, 2004 का। उस दिन जिसे अंतिम विदाई दी जा रही थी, वह सिर्फ एक अभिनेत्री या गायिका नहीं थीं। वह हिंदी सिनेमा का एक जमाना थीं, एक सुनहरी याद थीं, एक ऐसा दर्द था जो हमेशा गीतों में छुपा रहा। उनका नाम था सुरैया जमाल शेख।
सुरैया। बस यही एक नाम ही काफी था 1940 और 50 के दशक में लाखों दिलों की धड़कन बनने के लिए। उनकी मख़मली आवाज़ में एक ऐसी करुणा और मिठास थी जो सीधे दिल के तार छेड़ देती थी। उनकी मासूम सी सुंदरता पर पूरा भारत फिदा था। लेकिन एक हैरान कर देने वाला सच यह है कि जिस शख्स के पीछे पूरा देश दीवाना था, वह खुद अपने जीवन में इतनी तन्हा और उदास क्यों रहीं? उनकी जिंदगी का वह कौन सा अध्याय है, जिसमें प्यार के सभी गीत खामोश हो गए?
यह कहानी सिर्फ एक सितारे के उदय और अस्त की नहीं है। यह प्रेम, त्याग, पारिवारिक बंदिशों और अंतहीन अकेलेपन की वह दास्तान है, जिसने एक चमकते सितारे को धीरे-धीरे एक उदास साये में बदल दिया। आइए, चलते हैं उस सफर पर, जहाँ रोशनी और साये का फास्का बहुत पतला था।
शुरुआत: एक नन्हीं चिड़िया का संगीत से पहला परिचय
सुरैया का जन्म 15 जून 1929 को लाहौर में हुआ था। उनका परिवार एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार था। बचपन से ही उनकी दिलचस्पी गाने में थी। कहा जाता है कि उनकी दादी ने ही पहली बार उनकी प्रतिभा को पहचाना। जब वह महज छह साल की थीं, तभी उन्होंने अल्लामा इकबाल के सामने एक नज़्म गाकर सुनाई थी, जिससे प्रभावित होकर इकबाल ने उन्हें आशीर्वाद दिया था।
परिवार के साथ बंबई आने के बाद उनके चाचा, जो फिल्म निर्देशक थे, ने उन्हें बाल कलाकार के रूप में फिल्मों में अवसर दिया। 1937 में फिल्म ‘मधुरी’ से उन्होंने अपने सिनेमाई सफर की शुरुआत की। लेकिन असली पहचान तब मिली जब 1940 में फिल्म ‘तबस्सुम’ में उन्होंने अपना पहला गाना गया – “पंछी बनूँ उड़ती फिरूँ…”। यह गाना सुपरहिट हुआ और इसके साथ ही सुरैया ने एक गायिका और अभिनेत्री के रूप में अपनी जगह बना ली।
वह जमाना था जब अभिनेता खुद अपने गाने गाया करते थे। सुरैया में यह दुर्लभ खूबी थी कि वह खुद ही अपने गाने गाती थीं। उनकी आवाज़ में एक अलग तरह का जादू और भावनात्मक गहराई थी, जो श्रोताओं को तुरंत बाँध लेती थी।
सितारे का उदय: वह दौर जब पूरा देश था ‘मेरे मेहबूब’
1940 और 50 का दशक सुरैया का स्वर्णिम दौर था। उनकी जोड़ी देव आनंद के साथ जादूई साबित हुई। फिल्में जैसे ‘विद्या’ (1948), ‘शायर’ (1949), ‘नजराना’ (1950) और ‘सैलाब’ (1951) सुपरहिट हुईं। इन फिल्मों के गाने आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी फिल्म ‘मेरे मेहबूब’ (1963) से। इस फिल्म का टाइटल ट्रैक “मेरे मेहबूब तुझे मेरी मोहब्बत की कसम…” तो आज भी प्रेम गीतों का मंत्र माना जाता है। यह गाना सुनकर ऐसा लगता है जैसे सुरैया सीधे दिल से दिल की बात कर रही हों। इस फिल्म ने उन्हें अमरता प्रदान कर दी।
उस दौर में सुरैया की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके फैन न सिर्फ भारत, बल्कि पाकिस्तान और मध्य पूर्व के देशों में भी थे। उन्हें ‘मेलोडी क्वीन’ का खिताब मिला। उनकी फिल्मों के संवाद और गाने आम लोगों की जुबान पर रहते थे।
देव आनंद और सुरैया: प्यार का वह अफसाना जो अधूरा रह गया
सुरैया की जिंदगी का सबसे नाजुक और दर्दनाक पहलू उनका देव आनंद के साथ प्रेम संबंध था। फिल्मों में दिखाए गए प्यार से कहीं ज्यादा गहरा और सच्चा प्यार उन दोनों के बीच हुआ। जब वह ‘विद्या’ फिल्म में एक साथ आए, तो पर्दे के पीछे भी उनके दिल एक हो गए।
देव आनंद उस जमाने के नए और होनहार अभिनेता थे, जबकि सुरैया पहले से ही एक स्थापित स्टार थीं। लेकिन प्यार ने इन सब खाइयों को पाट दिया। दोनों एक-दूसरे के साथ वक्त बिताते, सैर करते और साथ काम करते हुए खुश रहते थे। उनकी जोड़ी दर्शकों को इतनी पसंद आई कि फिल्म निर्माता उन्हें साथ लेना पसंद करते थे।
लेकिन यहाँ आकर कहानी में पारिवारिक विरोध का पहाड़ टकराया। सुरैया एक मुस्लिम परिवार से थीं, जबकि देव आनंद एक हिंदू परिवार से। उस जमाने में धर्म के आधार पर शादी करना आसान नहीं था, खासकर तब जब दोनों परिवार रूढ़िवादी विचारों के हों।

सुरैया की दादी, जिनका परिवार में बहुत प्रभाव था, इस रिश्ते के खिलाफ थीं। कहा जाता है कि उन्होंने सुरैया पर बहुत दबाव डाला। दूसरी तरफ, देव आनंद के परिवार ने भी शुरू में इस रिश्ते को लेकर आपत्ति जताई थी। समाज और परिवार का डर सुरैया के कोमल मन पर हावी हो गया।
आखिरकार, एक मुश्किल फैसला लेना पड़ा। सुरैया ने देव आनंद के सामने शादी का प्रस्ताव ठुकरा दिया। यह फैसला शायद उनकी जिंदगी का सबसे दर्दनाक फैसला था। एक इंटरव्यू में देव आनंद ने बाद में कहा था कि सुरैया ने उनसे कहा था, “मैं तुमसे शादी नहीं कर सकती। मेरे परिवार वाले तुम्हारे धर्म को स्वीकार नहीं करेंगे।”
इस टूटन ने सुरैया के दिल पर एक गहरा जख्म दे दिया, जो कभी भरा नहीं। देव आनंद ने आगे चलकर कल्पना कार्तिक से शादी कर ली, लेकिन सुरैया इस दर्द को जीवन भर अपने सीने में लेकर जिंदा रहीं।
अकेलापन: शोहरत के बीच एक सूनापन
देव आनंद से अलग होने के बाद सुरैया ने कभी शादी नहीं की। उनका दिल टूट चुका था और शायद वह किसी और के लिए जगह ही नहीं बना पाईं। वह धीरे-धीरे अपने आप में सिमटती चली गईं।
बाहर से देखने पर वह एक सफल, मशहूर और संपन्न स्टार थीं। लेकिन अंदर से वह एक उदास और अकेली औरत थीं, जिसने प्यार और साथ की चाहत को हमेशा के लिए दफन कर दिया था। उनकी फिल्मों में भी यह उदासी झलकने लगी। वह रोल करतीं, गातीं, मुस्कुरातीं, लेकिन उनकी आँखों में एक गहरा दर्द साफ देखा जा सकता था।
1960 के दशक तक आते-आते उनकी फिल्मों का दौर धीमा पड़ने लगा। नई अभिनेत्रियाँ आ गई थीं। सुरैया ने 1963 में फिल्म ‘बंदिश’ के बाद फिल्मों से संन्यास ले लिया। उस समय वह महज 34 साल की थीं – एक ऐसी उम्र जब कलाकार अपने करियर के शिखर पर होते हैं।
लेकिन सुरैया ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने खुद को पूरी तरह एकांत में कैद कर लिया। वह मुंबई के अपने घर ‘सुरैया महल’ में रहने लगीं, जहाँ उनकी माँ और बहन भी रहती थीं। लेकिन परिवार का साथ भी उस भावनात्मक खालीपन को नहीं भर सका।
आखिरी दिन: एक सितारे का सुनहरा सफर खत्म होता है
सन्यास के बाद के वर्षों में सुरैया पूरी तरह से मीडिया और जनता की नजरों से दूर रहीं। वह कभी-कभार ही किसी को दिखाई देती थीं। उनके स्वास्थ्य ने भी साथ देना छोड़ दिया। वह कई बीमारियों से जूझ रही थीं।
31 जनवरी 2004 की सुबह, 75 साल की उम्र में, सुरैया ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी मौत की खबर ने पूरे देश को झकझोर दिया। उनके अंतिम दर्शनों के लिए हज़ारों लोग उमड़ पड़े। लोग अपने प्यारे सितारे को आखिरी बार देखना चाहते थे।
उनकी अंतिम यात्रा में एक विचित्र विरोधाभास देखने को मिला। जिस शख्स के पीछे भीड़ दीवानी थी, उसके अपने खून के रिश्तेदार बहुत कम थे। सुरैया ने कभी शादी नहीं की थी, इसलिए उनका कोई बच्चा नहीं था। उनकी बहन और भतीजे ही मौजूद थे। भीड़ उनके परिवार से बड़ी थी। यह दृश्य उनकी पूरी जिंदगी के अकेलेपन को चीख-चीखकर बता रहा था।
विरासत: आवाज़ और दर्द की वह धरोहर जो आज भी जिंदा है
सुरैया आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत आज भी जिंदा है।
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गीत-संगीत: उनके गाए गाने आज भी रेडियो और संगीत प्लेटफॉर्म्स पर सबसे ज्यादा सुने जाते हैं। “मेरे मेहबूब तुझे…”, “जब दिल ही टूट गया…”, “आये ना बलमा…” जैसे गाने प्रेमियों के दिलों पर राज करते हैं।
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एक प्रतीक: सुरैया अन requited love (एकतरफा प्यार) और त्याग की प्रतीक बन गई हैं। उनकी कहानी यह बताती है कि कैसे शोहरत और पैसे के बावजूद इंसान अगर प्यार से वंचित रह जाए, तो उसकी जिंदगी खोखली हो सकती है।
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सिनेमाई इतिहास: वह हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग की एक अमर धरोहर हैं। उन्होंने जिस तरह अपनी आवाज़ और अभिनय से लोगों के दिल जीते, वह आज भी मिसाल है।
लेकिन सबसे बड़ी विरासत शायद एक सबक है। सुरैया की जिंदगी से हमें पता चलता है कि सफलता और शोहरत, प्यार और साथ के बिना अधूरी है। बाहरी चमक-दमक कभी भी अंदर के सूनेपन को नहीं भर सकती।
निष्कर्ष: गुलाब की तरह खिलकर मुरझाने वाली एक कहानी
सुरैया की कहानी एक गुलाब जैसी है, जो पूरी दुनिया को अपनी खुशबू से महका गया, लेकिन खुद कांटों में घिरकर मुरझा गया। वह एक ऐसी दीवानी थीं, जिसने पूरी दुनिया को दीवाना बना दिया, लेकिन खुद अपने प्यार को पाने के लिए तरसती रह गईं।
उनकी जिंदगी हमें यह एहसास दिलाती है कि कभी-कभी सब कुछ पाकर भी कुछ नहीं पाया जाता। करोड़ों की दौलत, शोहरत, मकबूलियत – लेकिन अगर दिल में एक शख्स के लिए जगह खाली रह जाए, तो सब कुछ बेमानी लगता है।
आज भी, जब उनका कोई गाना लगता है, तो लगता है जैसे कोई अपने दर्द को सुरों में पिरोकर सुना रहा हो। शायद यही सुरैया की सबसे बड़ी कला थी – अपने दर्द को दुनिया के लिए एक खूबसूरत तोहफा बना देना।
वह चली गईं, लेकिन अपने पीछे छोड़ गईं एक सदी का दर्द, एक युग की याद और एक आवाज़ जो हमेशा गूँजती रहेगी। सुरैया सिर्फ एक नाम नहीं, एक भावना है, एक याद है, और एक अनकही दास्तान है, जो हमेशा हमारे साथ रहेगी।


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