कभी-कभी टीवी चैनल बदलते हुए या ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म की गहराइयों में खोज करते हुए हमारी नज़र किसी ऐसी फिल्म पर पड़ जाती है जो सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक भावनात्मक अनुभव बनकर उभरती है। ऐसी ही एक फिल्म है वी. शांताराम द्वारा निर्देशित और राजश्री प्रोडक्शन्स की ‘नवरंग’, साल 1959 में रिलीज़ हुई यह फिल्म आज भी उतनी ही ताज़ा और प्रासंगिक लगती है, जितनी उस ज़माने में रही होगी। यह सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है; यह कला, समर्पण, सामाजिक रूढ़ियों के टकराव और इंसानी जज़्बातों का एक ऐसा कैनवास है, जिस पर नौ रंगों की तरह जीवन के कई रंग बिखरे पड़े हैं।
अगर आप ‘नवरंग 1959 मूवी रिव्यू‘ ढूंढ रहे हैं, तो आप सही जगह पर आए हैं। यह लेख सिर्फ फिल्म की कहानी सुनाने तक सीमित नहीं होगा, बल्कि हम गहराई में जाएंगे और जानेंगे कि आखिर क्यों यह फिल्म ‘वी. शांताराम की अनमोल कृति’ मानी जाती है और कैसे इसने ‘महेंद्र कपूर और मन्ना डे के गाए गाने’ इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में दर्ज हो गए।
एक सपना जिसने ‘नवरंग’ को जन्म दिया: कहानी का सार
फिल्म की कहानी शुरू होती है उसके नायक, दिवाकर (महेश कौल), जो ब्रिटिश काल का एक भारतीय कवि है। वह अपनी पत्नी जमुना से बेहद प्रेम करता है मगर उसकी पत्नी को लगता है कि वह एक गैर जिम्मेदार इंसान है और काल्पनिक दुनिया में जीता है। और कुछ समय बाद उसकी कल्पना से एक प्रेरणा बनती है जिसको वो मोहिनी नाम देता है, वह नृत्य और गायन में पारंगत है और वह उसकी पत्नी की तरह दिखती है। और धीरे – धीरे वह सब चीज़ों से दूर हो जाता है।
दिवाकर का समय तब बदलता है जब ब्रिटिश सरकार के खिलाफ उसकी कविताओं से राजा खुश नहीं होता और उसको नौकरी से निकाल देता है। नौकरी ना होने पर ना तो वह अपने बीमार पिता की देखभाल कर पता है और ना ही अपने बेटे का पालन पोषण। बस वह अपनी कल्पनाओं में खोया रहता है। यह सब देखकर जमुना उसको छोड़कर चली जाती है और कुछ समय बाद दिवाकर के पिता का भी निधन हो जाता है।
यहीं से फिल्म का असली दिलचस्प ट्विस्ट शुरू होता है। जमुना जो कि उसकी प्रेरणा होती है उसके चले जाने के बाद दिवाकर अपनी कविताओं से भी दूर हो जाता है और ऐसे ही सड़कों पर घूमता रहता है। उसकी दयनीय हालत का पता एक दिन राजा को चलता है तो वो दिवाकर को गाने के लिए फिर से बुलाता है अपने महल में मगर बिना प्रेरणा के वह मना कर देता है। राजा के सैनिकों द्वारा दिवाकर गिरफ्तार हो जाता है और सजा सुनाने के लिए राजा के महल लाया जाता है। और वहीँ पर दिवाकर की नज़र जमुना पर पड़ती है और अपने आप ही उसके मुँह से गाना निकलने लगता है यह देखकर जमुना को अहसास होता है कि दिवाकर उससे बहुत प्रेम करता है और मोहिनी ही जमुना है।
यह पूरा दृश्य ‘नवरंग फिल्म का सामाजिक संदेश’ बहुत ही बारीकी से उजागर करता है। एक तरफ तो दिवाकर अपनी पत्नी को एक नया रूप और पहचान दे रहे हैं, उसे घर की चारदीवारी से निकालकर सार्वजनिक मंच पर ला रहे हैं, जो अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है। लेकिन दूसरी तरफ, वह इस प्रक्रिया में उसकी भावनाओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर देते हैं। जमुना अपने पति के इस रवैये से आहत होती है, लेकिन फिर भी उसके प्रति अपने प्रेम और समर्पण के कारण वह हर पीड़ा सहन करती है। यह एक तरह से ‘संध्या का किरदार में पूर्ण विलय’ का उदाहरण बन जाता है।
आखिरकार, दोनों को अपनी गलती का अहसास होता है और कहानी एक मार्मिक सुलह के साथ खत्म होती है।
वी. शांताराम: एक विजनरी डायरेक्टर जिसने सिनेमा को नए आयाम दिए
‘नवरंग मूवी डायरेक्शन एनालिसिस’ की बात करें तो वी. शांताराम सिर्फ एक निर्देशक नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी कलाकार थे। उनकी हर फिल्म में कुछ न कुछ प्रयोगशीलता ज़रूर दिखाई देती थी। ‘नवरंग’ में भी उन्होंने ‘प्ले विदिन ए प्ले’ (एक नाटक के भीतर दूसरा नाटक) की अवधारणा को बखूबी पेश किया है। फिल्म की संरचना खुद एक नाटक जैसी है, जहां दर्शक असल जिंदगी के एक नाटक और फिर उसके भीतर के कल्पनिक नाटक, दोनों को एक साथ देखते हैं।
शांताराम ने ‘नवरंग सिनेमैटोग्राफी’ पर विशेष ध्यान दिया था। फिल्म के रंग-संयोजन (कलर पैलेट) बेहद सोचे-समझे हैं। काल्पनिक दृश्यों में नरम, स्वप्निल रंगों का इस्तेमाल हुआ है, जबकि वास्तविक दुनिया के दृश्यों में ज़मीनी रंग दिखाई देते हैं। यह ‘ब्लैक एंड वाइट युग में कलरफुल सिनेमा’ की एक मिसाल थी।
उनकी दूरदर्शिता का एक और उदाहरण है फिल्म का सामाजिक पक्ष। 1959 का दौर वह दौर था जब महिलाओं की भूमिका मुख्य रूप से घर तक सीमित मानी जाती थी। ऐसे में एक पति द्वारा अपनी पत्नी को सार्वजनिक मंच पर लाना और उसे एक कलाकार के रूप में स्थापित करना, एक साहसिक और प्रगतिशील विचार था। शांताराम ने इसके माध्यम से पुरुष के अहं और महिला के त्याग के जटिल रिश्ते को भी बहुत ही संवेदनशील तरीके से दिखाया है।
संगीत जो आत्मा में उतर जाए: नवरंग के गाने
अगर ‘नवरंग’ का दिल कहीं है, तो वह है इसका संगीत। ‘सी. रामचंद्र का संगीत’ और ‘भरत व्यास के बोल’ की जोड़ी ने इस फिल्म के गानों को अमर बना दिया। फिल्म का संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि कहानी को आगे बढ़ाने और किरदारों की भावनाओं को व्यक्त करने में अहम भूमिका निभाता है।
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“आधा है चन्द्रमा , रात आधी “: यह गाना फिल्म की रोमांटिक धुरी है। यह दिवाकर और जमुना के प्रेम को दर्शाता है, लेकिन जिस सीन में यह गाना फिल्माया गया है, वह और भी खास है। दिवाकर जमुना को नृत्य सिखाते हुए उसे घूमते हुए देखकर यह गाना गाते हैं। यह दृश्य इस बात का प्रतीक है कि कैसे वह उसे अपने सपने की दुनिया में ले जा रहे हैं। ‘महेंद्र कपूर , आशा भोसले का आवाज़ में जादू’ इस गाने को और भी स्वर्गिक बना देता है।
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“आ दिल से दिल मिला ले“: यह एक शानदार समूह गाना है जो नाटक के मंचन के दौरान होता है। इसकी धुन और ऑर्केस्ट्रेशन इतना जीवंत और शक्तिशाली है कि दर्शक खुद को उस माहौल में महसूस करने लगते हैं। यह गाना ‘नवरंग के नृत्य दृश्य’ की शान को चार चांद लगा देता है।
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“अरे जा रे हट नटखट, ना छू रे मेरा घूँघट“: यह एक लोक शैली का मस्ती भरा गाना है, जो फिल्म में हल्कापन लेकर आता है। यह गाना भारतीय लोक संगीत की समृद्धि को दर्शाता है।
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“रंग दे रे, जीवन की चुनरिया रंग दे रे“: इसकी मधुरता की शुरुआत यहीं से हुई। यह गाना जीवन की सुंदरता और यात्रा के आनंद को बयां करता है।
इन गानों में ‘आशा भोसले की आवाज का जादू’ भी शामिल है, जिन्होंने संध्या के लिए प्लेबैक दिया था। उनकी मधुर और भावपूर्ण आवाज ने जमुना के किरदार को एक नया ही आयाम दिया।
अभिनय जिसने किरदारों में जान डाल दी
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संध्या (जमुना): संध्या ने जमुना के किरदार को सिर्फ अदा नहीं किया, बल्कि उसमें जीवंत हो गईं। एक साधारण, पति-भक्त गृहिणी से लेकर एक आत्मविश्वास से भरी पेशेवर कलाकार तक के उनके सफर को उन्होंने बेहद शिद्दत से पेश किया है। उनके चेहरे के हाव-भाव, आंखों में छुपा दर्द और अंत में मंच पर किए गए नृत्तरूपी आत्मविश्वास को देखकर कोई भी दर्शक मंत्रमुग्ध हो सकता है। यह भूमिका ‘संध्या की बेस्ट परफॉर्मेंस’ में से एक मानी जाती है।
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महेश कौल (दिवाकर): दिवाकर का किरदार बेहद जटिल है। एक तरफ वह एक प्यार करने वाला पति है, तो दूसरी तरफ एक कला के प्रति इतना समर्पित है कि वह अपनी पत्नी की भावनाओं को भूल जाता है। महेश कौल ने इस अंतर्द्वंद्व को बखूबी captured किया। उनके अहं और बाद में पश्चाताप के दृश्य बहुत ही प्रभावशाली हैं।
नवरंग की विरासत: आज के दौर में इसकी प्रासंगिकता
आज के दौर में, जब रिश्तों की परिभाषाएं बदल रही हैं और महिला सशक्तिकरण एक बड़ा मुद्दा है, ‘नवरंग’ और भी ज्यादा प्रासंगिक हो जाती है। फिल्म सवाल उठाती है:
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क्या कला के लिए प्यार को तरजीह देना, अपने करीबी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के बराबर है?
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क्या एक पत्नी का अपने पति के सपने को पूरा करने के लिए खुद को पूरी तरह झोंक देना उसका फर्ज है, या फिर यह एक तरह का शोषण है?
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क्या एक महिला को उसकी पहचान देने की प्रक्रिया में उस पर दबाव डालना जायज है?
ये ऐसे सवाल हैं जिनके आसान जवाब नहीं हैं, और शायद यही इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। यह दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है। यह फिल्म ‘क्लासिक बॉलीवुड सिनेमा का गौरवशाली इतिहास’ की एक जीती-जागती मिसाल है।
निष्कर्ष: क्या आज भी देखने लायक है नवरंग?
अगर आप ‘रियल बॉलीवुड सिनेमा’ के शौकीन हैं, जहां कहानी, चरित्र चित्रण, संगीत और दृश्यों में एक सामंजस्य हो, तो ‘नवरंग’ आपके लिए ही है। यह फिल्म उस जमाने का एक दस्तावेज है जब फिल्में सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं, बल्कि कला का एक रूप हुआ करती थीं।
हां, इसकी गति आज की फिल्मों के मुकाबले थोड़ी धीमी लग सकती है, लेकिन अगर आप धैर्य से इसे देखेंगे, तो यह फिल्म आपको अपने रंगों में इस कदर रंग लेगी कि आप खुद को ‘नवरंग’ होता हुआ महसूस करेंगे। यह एक ऐसी ‘भावनात्मक यात्रा’ है जो आपको हंसाएगी, रुलाएगी और सबसे बढ़कर, कला और प्रेम के असली मायने समझाएगी।
तो अगली बार जब आपको लगे कि आधुनिक सिनेमा में कुछ खास नहीं रह गया है, तो एक बार ‘नवरंग’ को जरूर देखें। यह फिल्म आपको याद दिलाएगी कि असली सिनेमाई जादू किसे कहते हैं। यह वी. शांताराम, संध्या, महेश कौल और पूरी टीम की अमर कृति है, जो आज भी ‘हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग’ गर्व से गुंजायमान करती है।


