साइलेंट फ़िल्मों में आवाज़ का जादू: 1920 के दशक के वे ‘बेंशी’ (Benshi) जो परदे के पीछे से कहानी सुनाते थे

MOvie Nurture: साइलेंट फ़िल्मों में आवाज़ का जादू: 1920 के दशक के वे 'बेंशी' (Benshi) जो परदे के पीछे से कहानी सुनाते थे

आज का दौर है डॉल्बी एटमॉस साउंड का। अभिनेता की हर साँस, फुसफुसाहट, तलवार की हर झनकार हमारे कानों तक सीधे पहुँचती है। लेकिन एक जमाना ऐसा भी था जब पर्दे पर बस छायाएँ नाचती थीं और उन्हें आवाज़ देता था एक इंसान। जी हाँ, एक इंसान, जो फिल्म के पर्दे के बगल में, मंच पर खड़ा होकर पूरी कहानी, हर पात्र का संवाद, हर मनोभाव, यहाँ तक कि घोड़े की टापों और तलवारों की आवाज़ तक खुद अपनी वाणी से पैदा कर देता था।

उस जमाने के सिनेमाघरों में सन्नाटा नहीं होता था, बल्कि एक तरह का जीवंत मंचन होता था। और इसके केन्द्र में होता था बेंशी। ‘बेंशी’ यानी ‘व्याख्याकार’। लेकिन वे महज व्याख्याकार नहीं थे; वे फिल्म के जीवित दिल, उसकी आत्मा और उसके ताने-बाने को बुनने वाले कलाकार थे। पश्चिम में साइलेंट फिल्मों के साथ पियानो बजता था, लेकिन जापान में बेंशी का एकछत्र राज था। वह 1920 का दशक था, जब यह कला अपने शिखर पर थी, और बेंशी फिल्म स्टारों से भी ज्यादा लोकप्रिय थे।

आइए, आज एक ऐसी ही यात्रा पर निकलते हैं, जहाँ हम उस खोई हुई दुनिया में जाएँगे, जहाँ सिनेमा दृश्य और श्रव्य का मिलन नहीं, बल्कि एक एकाकी आवाज़ का जादू था।

MOvie Nurture: साइलेंट फ़िल्मों में आवाज़ का जादू: 1920 के दशक के वे 'बेंशी' (Benshi) जो परदे के पीछे से कहानी सुनाते थे

बेंशी की उत्पत्ति: जहाँ काबुकी मिली सिनेमा से

बेंशी की कला अचानक पैदा नहीं हुई। इसकी जड़ें जापान की समृद्ध मौखिक कथा परंपरा और काबुकी नाट्यशैली में हैं। जब पहली बार साइलेंट फिल्में जापान पहुँचीं (किनेमाटोग्राफ या ‘कात्सुदो शशिन’), तो जापानी दर्शकों के लिए यह एक अजीब चीज थी। चलती-फिरती तस्वीरें तो ठीक थीं, लेकिन उनमें आवाज़ नहीं थी, और सबसे बड़ी बात – उनकी व्याख्या करने वाला कोई नहीं था

जापान में, पारंपरिक काबुकी और बुनराकू (कठपुतली) नाटकों में हमेशा एक वाचक (तायू) होता था, जो कहानी सुनाता था, पात्रों के लिए बोलता था, और माहौल बनाता था। दर्शक इसके आदि थे। सो, सिनेमाघर के मालिकों ने एक चतुर समाधान निकाला। उन्होंने फिल्म दिखाते समय एक व्यक्ति को रखना शुरू किया, जो फिल्म की कहानी समझाता, पात्रों के संवाद बोलता, और दृश्यों का वर्णन करता। यही से बेंशी का जन्म हुआ। शुरू में यह व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि खुद थिएटर का मैनेजर या प्रोजेक्शनिस्ट ही होता था, जो जोर-जोर से बोलकर फिल्म समझाता था।

एक कलाकार का उदय: बेंशी सिर्फ बोलने वाला नहीं, एक स्टार बन गया

जैसे-जैसे सिनेमा लोकप्रिय हुआ, बेंशी की भूमिका भी बदलने लगी। अब वह महज एक व्याख्याकार नहीं रहा। वह एक पूर्ण कलाकार बन गया। एक शानदार बेंशी के लिए कई गुण जरूरी थे:

1. शक्तिशाली और लचीली आवाज़: उसे एक ही फिल्म में बूढ़े आदमी, जवान लड़की, बच्चे, खलनायक सभी की आवाजें निकालनी होती थीं। उसकी आवाज़ पूरे थिएटर में गूँजनी चाहिए थी, बिना माइक के।

2. अभिनय का हुनर: सिर्फ आवाज़ नहीं, बल्कि चेहरे के हावभाव और शरीर की भाषा से भी उसे भाव प्रकट करने होते थे। कई बेंशी नाट्यशाला से आए होते थे।

3. स्वर और संगीत का ज्ञान: वह केवल बोलता नहीं था, बल्कि गाता भी था। दुख के दृश्यों में करुण राग छेड़ता, लड़ाई के दृश्यों में आवाज़ की तीव्रता बढ़ाता। कई बेंशी शमिसेन (एक जापानी वाद्य) भी बजाते थे।

4. सहज प्रतिभा और हास्य: अक्सर फिल्म की कहानी से हटकर, वह अपनी ओर से टिप्पणी जोड़ देता, चुटकुले सुना देता, या स्थानीय बातों का जिक्र करता, जिससे दर्शक और जुड़ाव महसूस करते।

इस तरह, बेंशी फिल्म का सह-निर्माता बन गया। एक ही फिल्म अलग-अलग बेंशी के साथ अलग-अलग अनुभव देती थी। दर्शक अक्सर फिल्म देखने नहीं, बल्कि अपने पसंदीदा बेंशी को सुनने आते थे। बेंशी के नाम पर ही फिल्मों का प्रचार होता था। उनकी तनख्वाह स्टार अभिनेताओं से भी ज्यादा होती थी। वे जापान की पहली सिनेमाई सुपरस्टार थे।

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बेंशी का जादू: वह पूरी फिल्म को कैसे जीवंत कर देता था?

एक सफल शो की शुरुआत ही बेंशी के परिचय से होती थी। वह मंच पर आता, दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करता, और फिर फिल्म शुरू होते ही अपना जादू बिखेरना शुरू कर देता।

मान लीजिए पर्दे पर एक सामुराई दिखाई देता है। बेंशी गहरी, गंभीर आवाज़ में बोलेगा: “हेइयन काल का यह योद्धा, ताकेचियो, अपने घोड़े पर सवार, उस जंगल की तरफ बढ़ रहा है जहाँ उसके शत्रु का डेरा है। उसकी आँखों में प्रतिशोध की ज्वाला है।”

फिर एक महिला पर्दे पर आती है। बेंशी की आवाज़ नरम, करुणामयी हो जाती: “ओह, यह है प्रिंसेज किकु, जो अपने खोए हुए प्रेमी की प्रतीक्षा में इस मंदिर में रहती है। उसका हृदय टूटा हुआ है।”

अचानक लड़ाई का दृश्य शुरू होता है। बेंशी तेज आवाज़ में चिल्लाने लगता, तलवारों की झनकार की आवाज़ें निकालता: “शिन्ग! शान्ग! ताकेचियो ने वार किया! दुश्मन ने चक्कर खाया! धाँय! धाँय! घोड़े की टापों की आवाज!”

वह न सिर्फ संवाद बोलता, बल्कि पात्रों के आंतरिक विचार, पृष्ठभूमि, और उन भावनाओं का वर्णन भी करता, जिन्हें चेहरे के भाव पूरी तरह नहीं दिखा पाते थे। वह विदेशी फिल्मों (ज्यादातर हॉलीवुड की) को भी जापानी संदर्भ में ढाल देता, उनके नाम और स्थान बदल देता, ताकि दर्शक उसे आसानी से समझ सकें।

बेंशी के प्रकार: हर स्वाद के लिए एक आवाज

सभी बेंशी एक जैसे नहीं थे। उनकी शैलियों के आधार पर उन्हें मोटे तौर पर तीन वर्गों में बाँटा जाता था:

1. कोवैरो (वर्णनकर्ता): ये सबसे पारंपरिक थे। ये फिल्म की कहानी को एक गंभीर, महाकाव्य शैली में सुनाते, जैसे कोई पौराणिक गाथा कह रहा हो। इनकी आवाज़ में गहराई और सम्मान होता था।

2. नाकाबेंशी (अनुवादक/समझाने वाले): ये विशेष रूप से विदेशी फिल्मों के लिए होते थे। ये न सिर्फ संवाद का अनुवाद करते, बल्कि पश्चिमी संस्कृति, पोशाक और रीति-रिवाजों को जापानी दर्शकों के लिए समझाते थे। वे फिल्म को ‘जापानीकृत’ कर देते थे।

3. त्सुकामिबेंशी (जोड़ने वाले/मनोरंजक): ये सबसे ज्यादा लोकप्रिय और मनोरंजक थे। ये फिल्म की मूल कहानी से हटकर अपनी कल्पना से कहानी में मोड़ ले आते, हास्य जोड़ते, और ताजा टिप्पणी करते। कई बार तो वे फिल्म के पात्रों के संवाद को पूरी तरह बदल देते, एक गंभीर फिल्म को हास्य में तब्दील कर देते। दर्शक इनके इसी सहज और मजेदार अंदाज के दीवाने थे।

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सुनहरे दिन और अचानक अस्त: टॉकी फिल्मों का तूफान

1920 का दशक बेंशी के लिए स्वर्ण युग था। टोक्यो और ओसाका जैसे शहरों में सैकड़ों सिनेमाघर थे और हर एक में एक बेंशी होता था। उनकी प्रतिष्ठा इतनी थी कि दर्शक उनके हस्ताक्षर और तस्वीरें माँगते थे।

लेकिन 1927 में हॉलीवुड में ‘दी जैज सिंगर’ आई, जो पहली टॉकी (बोलती) फिल्म मानी जाती है। यह तूफान जल्दी ही जापान पहुँचा। 1930 के दशक की शुरुआत तक जापान ने भी अपनी टॉकी फिल्में बनानी शुरू कर दीं।

यह बेंशी के लिए घातक झटका था। अब फिल्मों में खुद अभिनेताओं की आवाजें आने लगीं। बेंशी की जरूरत खत्म होती चली गई। सिनेमाघरों के मालिकों ने महँगे बेंशी को रखने के बजाय नई साउंड प्रोजेक्शन तकनीक खरीदना शुरू कर दिया। सैकड़ों बेंशी बेरोजगार हो गए। कुछ ने टॉकी फिल्मों में अभिनेता या निर्देशक बनने की कोशिश की, कुछ सफल भी हुए। लेकिन अधिकतर की आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई।

एक पूरी कला, एक सांस्कृतिक परंपरा, जो सिनेमा को जीवित करती थी, वह खुद सिनेमा की प्रगति का शिकार हो गई।

विरासत और पुनरुद्धार: आज भी जिंदा है बेंशी की याद

हालाँकि बेंशी का युग लगभग समाप्त हो गया, लेकिन उनकी विरासत पूरी तरह मरी नहीं है।

जीवित किंवदंतियाँ: कुछ बुजुर्ग बेंशी आज भी हैं, जो विशेष कार्यक्रमों में, फिल्म महोत्सवों में, या विश्वविद्यालयों में अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। उनके इन प्रदर्शनों को देखना एक जीता-जागता इतिहास देखने जैसा है।

फिल्मों और डॉक्यूमेंटरी में: जापान और विदेशों में बेंशी पर कई डॉक्यूमेंटरी बनी हैं। कुछ आधुनिक फिल्मों में भी बेंशी के किरदार या उनकी कला का जिक्र आता है।

सांस्कृतिक प्रतीक: बेंशी आज जापानी सिनेमा की नायाब और गौरवशाली विरासत का प्रतीक बन चुके हैं। वे उस जमाने की याद दिलाते हैं जब सिनेमा एक सामूहिक, लाइव और अद्वितीय अनुभव हुआ करता था, जहाँ हर शो अलग होता था।

वैश्विक प्रभाव: कुछ विद्वानों का मानना है कि बेंशी की परंपरा ने आधुनिक फिल्म नैरेटर या किसी कथा-वाचक की अवधारणा को प्रभावित किया होगा। मंगलवार की हिंदी फिल्मों में भी कभी-कभी एक पार्श्ववाचक की आवाज़ सुनाई देती है, वह बेंशी की याद दिलाती है, हालाँकि वह लाइव नहीं होती।

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निष्कर्ष: आवाज़ का वह जादू जो पर्दे से बाहर निकल आता था

बेंशी सिर्फ फिल्म का हिस्सा नहीं थे; वे फिल्म और दर्शक के बीच एक जीवित सेतु थे। वही सेतु जो आज के डिजिटल, एकाकी स्ट्रीमिंग के युग में लगभग टूट चुका है। उनकी कला में एक तरह की मासूमियत और जादू था। यह विश्वास कि एक आदमी, अपनी आवाज़ के दम पर, चलती छवियों में प्राण फूँक सकता है।

उन्होंने हमें यह सबक दिया कि कहानी सुनाने की कला में मानवीय स्पर्श सबसे महत्वपूर्ण है। टेक्नोलॉजी चाहे कितनी भी आगे बढ़ जाए, लेकिन एक कलाकार की सजीव उपस्थिति, उसकी सहज प्रतिक्रिया और दर्शकों से सीधा संवाद किसी मशीन से नहीं आ सकता।

‘रशोमोन’ के निर्देशक अकीरा कुरोसावा ने अपनी आत्मकथा में बेंशी को याद करते हुए लिखा था कि कैसे उन्होंने बचपन में बेंशी की आवाज़ में फिल्में देखीं। यह उनकी रचनात्मकता का एक हिस्सा बनी।

तो अगली बार जब आप कोई पुरानी साइलेंट फिल्म देखें, तो बस एक पल के लिए आँखें बंद करके कल्पना कीजिए। कल्पना कीजिए उस सिनेमाघर की, जहाँ पर्दे के पास एक शख्स खड़ा है, और उसकी आवाज़ पूरे हॉल में गूँज रही है – चिल्लाती, रोती, हँसती, डराती। वह आवाज़ जो कहानी नहीं, एक जीवंत अनुभव बना देती थी। वह था बेंशी का असली जादू – आवाज़ का वह जादू जो पर्दे से बाहर निकलकर दर्शकों के दिलों तक पहुँच जाता था

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