क्या कोई फिल्म सिर्फ 28 मिनट के टुकड़ों में भी पूरी दुनिया समेट सकती है? क्या एक अधूरी फिल्म भी दर्शकों के दिलों पर वैसा ही असर छोड़ सकती है जैसी कोई पूरी कहानी? 1929 में बनी जापानी मूक फिल्म “टोक्यो मार्च” (Tokyo March) इस सवाल का जवाब है—एक ऐसी फिल्म जो आज केवल 24 से 28 मिनट के टुकड़ों में उपलब्ध है, फिर भी उसमें उस दौर का पूरा जापान समाया हुआ है।
महान जापानी निर्देशक केन्जी मिज़ोगुची (Kenji Mizoguchi) के शुरुआती करियर की यह फिल्म आज भी सिनेप्रेमियों के दिलों में एक खास जगह रखती है। यह सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐतिहासिक दस्तावेज है—1920 के दशक के टोक्यो शहर की झलक, जापानी समाज की विषमताओं का चित्रण, और उस दौर के सिनेमा की तकनीकों का एक जीवंत उदाहरण।
आइए, इस पुरानी जापानी मूक फिल्म (Vintage Japanese Silent Film) की दुनिया में कदम रखें और जानें कि आखिर क्यों यह फिल्म आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 1929 में थी।
परिचय: मिज़ोगुची के सिनेमा का प्रारंभिक अध्याय
केन्जी मिज़ोगुची (1898-1956) का नाम जापानी सिनेमा के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया है। “उगेत्सु” (Ugetsu), “सैंशो द बेलिफ” (Sansho the Bailiff), “द लाइफ ऑफ ओहारू” (The Life of Oharu) जैसी फिल्मों ने उन्हें दुनिया भर में पहचान दिलाई। लेकिन इस महान निर्देशक के शुरुआती करियर के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
1920 के दशक के अंत में मिज़ोगुची ने कई फिल्में बनाईं, जिनमें से ज्यादातर आज खो चुकी हैं (Lost Films)। “टोक्यो मार्च” उन कुछ बची-खुची फिल्मों में से एक है, जो हमें उनके शुरुआती दौर की झलक देती है । यह फिल्म 31 मई 1929 को जापान में रिलीज हुई थी । निक्कात्सू स्टूडियो (Nikkatsu) के बैनर तले बनी इस फिल्म की पटकथा चीओ किमुरा (Chiio Kimura) ने लिखी थी, जो हिरोशी किकुची (Hiroshi Kikuchi) के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित थी ।
एक गाने से पैदा हुई फिल्म
फिल्म की कहानी इसके निर्माण से भी दिलचस्प है। 1929 में चियाको सातो (Chiyako Sato) ने “टोक्यो मार्च” नामक एक गाना गाया, जो जबरदस्त हिट हुआ । इस गाने की सफलता ने हिरोशी किकुची को एक उपन्यास लिखने के लिए प्रेरित किया, और उस उपन्यास पर यह फिल्म बनी । दिलचस्प बात यह है कि फिल्म तब बनकर तैयार हो गई जब उपन्यास अभी अधूरा ही था । यह बताता है कि उस समय भी बाजार की मांग और लोकप्रिय संस्कृति के बीच कितना गहरा तालमेल था।
यह फिल्म मिज़ोगुची की उन फिल्मों में से एक है, जिन्हें “टेंडेंसी फिल्म्स” (Tendency Films) कहा जाता है—अपने समय की सामाजिक असमानताओं पर तीखा व्यंग्य करने वाली फिल्में ।
कहानी का सार: प्रेम, त्रासदी और ग्रीक नाटक का संगम
“टोक्यो मार्च” की कहानी एक अनाथ लड़की मिचियो (Shizue Natsukawa) के इर्द-गिर्द घूमती है । वह एक फैक्ट्री में काम करती है और अपने मजदूर चाचा और उनकी पत्नी के साथ टोक्यो में रहती है ।
एक दिन, दो अमीर युवक—योशिकी (Reiji Ichiki) और साकुमा (Isamu Kosugi)—टेनिस खेल रहे होते हैं। गलती से गेंद बाउंड्री पार कर जाती है और मिचियो के घर के आंगन में जा गिरती है। गेंद लेने आए ये दोनों युवक मिचियो को देखते हैं और दोनों उस पर मोहित हो जाते हैं ।
जीवन का क्रूर मोड़
मिचियो के चाचा की नौकरी छूट जाती है और परिवार आर्थिक संकट से घिर जाता है । मजबूर होकर चाचा मिचियो को गीशा (Geisha) के रूप में बेचने का फैसला करते हैं । मिचियो सपने में अपनी मृत मां को याद करती है, जो खुद एक गीशा थी और एक ग्राहक से प्यार कर बैठी थी, जिसने मिचियो के जन्म के बाद उन्हें छोड़ दिया था ।
कुछ समय बीतता है। मिचियो अब “ओरी” नाम से गीशा बन चुकी है । योशिकी और साकुमा दोनों उससे मिलने आते हैं। योशिकी के पिता फुजिमोटो (Eiji Takagi) भी ओरी पर मोहित हो जाते हैं। एक दिन फुजिमोटो को ओरी की उंगली में एक अंगूठी दिखती है—वही अंगूठी जो उसने सालों पहले मिचियो की मां को दी थी। सच्चाई सामने आती है: फुजिमोटो ही वह व्यक्ति है जिसने मिचियो की मां को गर्भवती छोड़कर त्याग दिया था । योशिकी और मिचियो सगे भाई-बहन हैं !
त्रासदी का अंत
योशिकी इस सच्चाई से टूट जाता है। वह जिससे प्यार करता था, वह उसकी बहन निकली। अंत में, मिचियो साकुमा के शादी के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेती है, और योशिकी भूलने के लिए एक लंबी यात्रा पर निकल पड़ता है ।
एक समीक्षक ने लिखा, “यह फिल्म रोमांस, क्लासिक ड्रामा और ग्रीक त्रासदी का एक अनूठा मिश्रण है” । यह कहानी प्रेम त्रिकोण (Love Triangle), पहचान के संकट (Identity Crisis) और अचानक सामने आए अनाचार (Incest) के संकेतों से भरी हुई है ।
कलाकार: मूक सिनेमा के चेहरे
शिज़ुए नात्सुकावा (मिचियो/ओरी)
शिज़ुए नात्सुकावा (Shizue Natsukawa) ने मिचियो की भूमिका निभाई है । उनका किरदार एक ऐसी लड़की का है जो गरीबी, शोषण और पारिवारिक त्रासदी के बीच अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करती है। एक समीक्षक ने लिखा, “नात्सुकावा का अभिनय देखते ही बनता है—वह बिना संवाद के भी अपनी आंखों से सब कुछ कह देती हैं” ।
रीजी इचिकी (योशिकी)
रीजी इचिकी (Reiji Ichiki) ने अमीर परिवार के बेटे योशिकी का किरदार निभाया है । उनके किरदार का आर्क सबसे नाटकीय है—पहली नज़र के प्यार से लेकर अपनी प्रेमिका को बहन पाने के सदमे तक। एक समीक्षक ने टिप्पणी की, “इचिकी का अभिनय कुछ जगहों पर थोड़ा ओवरएक्टिंग लगता है, लेकिन यह उस दौर की मूक फिल्मों की आम समस्या थी” ।
इसामु कोसुगी (साकुमा)
इसामु कोसुगी (Isamu Kosugi) साकुमा के रोल में हैं —योशिकी के सबसे अच्छे दोस्त और मिचियो के दूसरे प्रेमी। उनका किरदार फिल्म में सबसे स्थिर और संतुलित है। अंत में वही मिचियो से शादी करता है।
ताकाको इरी (सायुरिको)
ताकाको इरी (Takako Irie) ने सायुरिको की भूमिका निभाई है । हालांकि बचे हुए टुकड़ों में उनके किरदार के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती, लेकिन वह उस दौर की मशहूर अभिनेत्री थीं।
सिनेमैटोग्राफी: मिज़ोगुची का दृश्य जादू
“टोक्यो मार्च” की सिनेमैटोग्राफी तात्सुयुकी योकोटा (Tatsuyuki Yokota) ने की थी । 28 मिनट के बचे हुए टुकड़ों में भी हम मिज़ोगुची के उस दृश्य जादू को देख सकते हैं, जो बाद में उनकी पहचान बना।
टेनिस कोर्ट का दृश्य: वर्ग संघर्ष की तस्वीर
फिल्म का सबसे चर्चित दृश्य है टेनिस कोर्ट वाला सीन। डेविड व्हीलर ने अपनी समीक्षा में इस दृश्य का गहन विश्लेषण किया है। कैमरा ऊपर एक ऊंचे टेनिस कोर्ट पर रखा गया है, जहां अमीर युवक खेल रहे हैं। नीचे झुग्गियों में मिचियो रहती है ।
एक टेनिस बॉल गलती से नीचे जा गिरती है। मिचियो उसे वापस फेंकने की कोशिश करती है, लेकिन बाड़ बहुत ऊंची है। मिज़ोगुची का कैमरा बारी-बारी से ऊपर अमीरों की दुनिया और नीचे गरीबों की दुनिया दिखाता है—एक शॉट-रिवर्स-शॉट (Shot-Reverse-Shot) जो दोनों वर्गों के बीच की खाई को दर्शाता है ।
एक समीक्षक ने लिखा, “यह दृश्य मिज़ोगुची के बाद के कामों से अलग है, जहां वह आमतौर पर लंबे टेक (Long Takes) में शूट करते थे। यहां उन्होंने तेज कटिंग (Rapid Cutting) का इस्तेमाल किया है, जो टेनिस के तेज खेल का एहसास देता है” ।
जर्मन एक्सप्रेशनिज्म का प्रभाव
1920 के दशक के जापानी सिनेमा पर पश्चिमी फिल्मों का गहरा प्रभाव था। अमेरिकी फिल्में तो खूब आयात होती थीं, लेकिन जर्मन एक्सप्रेशनिज्म (German Expressionism) का भी असर देखने को मिलता है ।
“टोक्यो मार्च” में एक दृश्य है जहां एक सुपरइम्पोजिशन (Superimposition) दिखता है, दीवार पर एक भूतिया परछाई रेंगती है, और एक दोषी पिता के सिर के पीछे सींगों जैसी परछाइयां बनती हैं । यह सब जर्मन एक्सप्रेशनिज्म की देन है। एक समीक्षक ने डी.डब्ल्यू. ग्रिफिथ (D.W. Griffith) की फिल्मों की भी गूंज महसूस की ।
टोक्यो शहर का दस्तावेज
फिल्म का सबसे बड़ा योगदान यह है कि इसमें 1920 के दशक के टोक्यो शहर की झलक मिलती है । एक समीक्षक ने लिखा, “टोक्यो मार्च सिनेमा में टोक्यो शहर के शुरुआती रिकॉर्ड्स में से एक है” ।
उस समय टोक्यो तेजी से बदल रहा था—पुरानी परंपराएं मर रही थीं, नई औद्योगिक क्रांति आ रही थी। फिल्म में हम यह सब देख सकते हैं: अमीरों की हवेलियां, टेनिस कोर्ट, और उनके ठीक बगल में झुग्गियां, गरीब मजदूर । एक समीक्षक ने इसे “विरोधाभासों का शहर” कहा—”संस्कृति, शिक्षा और कला का घर” भी और “पाप और भ्रष्टाचार की जंजीरों में जकड़ा” भी ।
बेंशी: जापानी मूक सिनेमा की अनोखी परंपरा
जापानी मूक सिनेमा की सबसे अनोखी परंपरा है बेंशी (Benshi)—वे व्याख्याकार जो फिल्म के दौरान सिनेमाघर में बैठकर सभी पात्रों के संवाद बोलते थे, कहानी समझाते थे, और दर्शकों को फिल्म से जोड़ते थे ।
एक समीक्षक ने बताया, “बेंशी सभी पात्रों के लिए आवाजें निकालता है, उनके संवाद बोलता है, और दर्शकों को कहानी समझाने के लिए टिप्पणियां जोड़ता है। यह उस समय शुरू हुआ जब जापान में साक्षरता कम थी, इसलिए इंटरटाइटल्स (Intertitles) ज्यादा मददगार नहीं थे।
“टोक्यो मार्च” के डीवीडी रिलीज में प्रसिद्ध बेंशी कलाकार सावातो मिदोरी (Sawato Midori) ने नैरेशन जोड़ा है, जो फिल्म के अनुभव को और समृद्ध बनाता है । एक समीक्षक ने लिखा, “बेंशी नैरेशन फिल्म को बहुत समृद्ध करता है। अगर आपको कभी किसी फिल्म को बेंशी के साथ देखने का मौका मिले, तो आप इसे मिस नहीं करना चाहेंगे” ।
फिल्म का वर्तमान: 28 मिनट के टुकड़े
यह फिल्म आज पूरी तरह उपलब्ध नहीं है। मूल फिल्म करीब 101 मिनट (या कुछ स्रोतों के अनुसार 75-100 मिनट) लंबी थी । आज इसका केवल 24 से 28 मिनट का टुकड़ा ही बचा है ।
यह टुकड़ा 2007 में डिजिटल मेमे (Digital MEME) द्वारा जारी किए गए डीवीडी पर मिज़ोगुची की दूसरी फिल्म “द वॉटर मैजिशियन” (The Water Magician) के साथ पूरक (Complement) के रूप में शामिल किया गया था ।
अधूरी फिल्म का मूल्यांकन
इस अधूरी फिल्म को रेट करना या समीक्षा करना एक चुनौती है। लेटरबॉक्स पर एक समीक्षक ने लिखा, “इसे रेट करना सही नहीं लगता, क्योंकि यह मूल 101 मिनट की फिल्म का सिर्फ 25 मिनट का टुकड़ा है जो हमेशा के लिए खो गई है” ।
एक अन्य ने लिखा, “यहाँ रेटिंग देखकर हैरानी होती है क्योंकि केवल 24 मिनट ही उपलब्ध हैं। कोई कृपया बाकी की फिल्म ढूंढ़ सकता है?” ।
फिर भी, जो बचा है, वह काफी कीमती है। एक समीक्षक ने लिखा, “हालांकि अधूरी है, फिर भी यह एक दिलचस्प मेलोड्रामा है। मुझे लगता है कि मूल पूरी फिल्म मुझे बहुत पसंद आती” ।
सामाजिक टिप्पणी: मिज़ोगुची का मानवतावादी नजरिया
“टोक्यो मार्च” सिर्फ एक मनोरंजक फिल्म नहीं है, बल्कि यह उस समय के जापानी समाज पर एक गहरी टिप्पणी भी करती है।
वर्ग संघर्ष (Class Struggle)
फिल्म का मुख्य विषय है वर्ग संघर्ष। टेनिस कोर्ट का दृश्य इसका सबसे साफ उदाहरण है। एक समीक्षक ने लिखा, “यह दृश्य बुर्जुआ (Bourgeois) और मजदूर वर्ग के जीवन के बीच की खाई को दर्शाता है” ।
मिज़ोगुची दिखाते हैं कि कैसे गरीब लड़की मिचियो अपनी खूबसूरती के कारण अमीरों की नजरों में आ जाती है, लेकिन वह उनकी दुनिया का हिस्सा नहीं बन सकती। बाड़ (Fence) उनके बीच की अदृश्य दीवार है—वह करीब हैं, फिर भी बहुत दूर ।
गीशा और स्त्री शोषण
मिज़ोगुची की फिल्मों में स्त्री पात्रों का शोषण एक बार-बार आने वाला विषय है। उनकी अपनी बहन को गीशा के रूप में बेच दिया गया था, और यह व्यक्तिगत अनुभव उनकी फिल्मों में झलकता है ।
“टोक्यो मार्च” में दिखाया गया है कि कैसे गरीबी के कारण एक लड़की को गीशा बनने के लिए मजबूर किया जाता है। एक समीक्षक ने टिप्पणी की, “गीशा शब्द का अनुवाद अक्सर गलत समझा जाता है। उसे कोई प्रशिक्षण नहीं मिलता, और उससे पुरुषों के साथ सोने की उम्मीद की जाती है” ।
औद्योगीकरण की आलोचना
फिल्म की शुरुआत में एक टाइटल कार्ड (Title Card) है जो टोक्यो को “पाप और भ्रष्टाचार की राजधानी” बताता है । एक समीक्षक ने इसे “तेजी से औद्योगीकरण (Rapid Industrialization) की अस्वीकृति” कहा ।
1927 में जापान आर्थिक संकट से गुजर रहा था । फैक्ट्री से निकाली गई मिचियो इस आर्थिक मंदी का शिकार है। फिल्म दिखाती है कि कैसे औद्योगीकरण के इस नए दौर में गरीब और मजदूर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ।
समीक्षा: क्या अच्छा है, क्या कमजोर
क्या अच्छा है:
ऐतिहासिक महत्व: यह फिल्म 1920 के दशक के टोक्यो और जापानी समाज का एक अनमोल दस्तावेज है ।
मिज़ोगुची का दृश्य जादू: बचे हुए टुकड़ों में भी निर्देशक के दृश्य कौशल की झलक मिलती है—टेनिस कोर्ट का दृश्य, जर्मन एक्सप्रेशनिज्म का प्रभाव, और शानदार कैमरा वर्क ।
बेंशी नैरेशन: फिल्म को बेंशी के साथ देखना एक अनोखा अनुभव है, जो मूक फिल्मों को एक नया आयाम देता है ।
सामाजिक टिप्पणी: फिल्म वर्ग संघर्ष, स्त्री शोषण और औद्योगीकरण पर गहरी टिप्पणी करती है ।
ट्विस्ट: अनाचार (Incest) का ट्विस्ट बेहद चौंकाने वाला है। एक समीक्षक ने लिखा, “ट्विस्ट कुछ हद तक अनुमानित हो सकता है, लेकिन मैं हैरान रह गया और अपने पजामे में चुप्पी तोड़ते हुए चिल्ला उठा” ।
क्या कमजोर है:
अधूरी फिल्म: सबसे बड़ी कमी यह है कि फिल्म पूरी नहीं है। केवल 28 मिनट के टुकड़ों में पूरी कहानी का आनंद नहीं लिया जा सकता ।
ओवरएक्टिंग: उस दौर की मूक फिल्मों की आम समस्या—ओवरएक्टिंग (Overacting)—यहाँ भी देखने को मिलती है ।
सुस्त गति: कुछ दृश्यों में गति सुस्त है, हालांकि यह फिल्म की अधूरी प्रकृति के कारण भी हो सकता है।
खराब क्वालिटी: फिल्म के बचे हुए प्रिंट्स (Prints) काफी क्षतिग्रस्त हैं। शुरुआती दृश्य विशेष रूप से बुरी हालत में हैं ।
निष्कर्ष: एक अधूरी फिल्म, लेकिन पूरा अनुभव
“टोक्यो मार्च” को देखना एक अजीब अनुभव है। एक तरफ आप जानते हैं कि आप एक अधूरी फिल्म देख रहे हैं, जिसका तीन-चौथाई हिस्सा हमेशा के लिए खो चुका है। दूसरी तरफ, जो बचा है, वह इतना समृद्ध, इतना दिलचस्प, इतना ऐतिहासिक है कि आप उसे देखना नहीं छोड़ सकते।
एक समीक्षक ने लिखा, “हालांकि पूरी नहीं है, फिर भी यह एक दिलचस्प मेलोड्रामा है” । एक अन्य ने कहा, “अगर आपको कभी इस या किसी भी फिल्म को बेंशी के साथ देखने का मौका मिले, तो आप इसे मिस नहीं करना चाहेंगे” ।
यह फिल्म उन भूली-बिसरी जापानी फिल्मों (Forgotten Japanese Films) में से है, जिसे हर सिनेप्रेमी को कम से कम एक बार देखना चाहिए। यह हमें याद दिलाती है कि सिनेमा कितना नाजुक माध्यम है—एक पूरी फिल्म, उसकी कहानी, उसके कलाकार, उनकी मेहनत—सब कुछ कुछ ही दशकों में खो सकता है।
लेकिन जब तक इस फिल्म के ये 28 मिनट बचे हैं, तब तक केन्जी मिज़ोगुची का वह शुरुआती जादू जिंदा है। तो अगली बार जब आप कोई प्राचीन जापानी सिनेमा (Classic Japanese Cinema) देखने का मन बनाएं, तो “टोक्यो मार्च” से शुरू करें। यह आपको एक ऐसे समय में ले जाएगी जब टोक्यो बदल रहा था, जापान बदल रहा था, और सिनेमा अपने सबसे शुद्ध रूप में दिखाई दे रहा था।


