एक पल के लिए सोचिए — दूसरा विश्व युद्ध अपने चरम पर है, लंदन की गलियां बम धमाकों से अभी-अभी उबरी हैं, और ऐसे में कोई फिल्ममेकर आकर एक ऐसी फिल्म बनाता है जिसमें ब्रिटिश सेना के एक अफसर को बूढ़ा, हास्यास्पद और वक्त से पीछे छूटा हुआ दिखाया जाता है। ना कोई जोशीला भाषण, ना दुश्मन को मात देने वाला क्लाइमेक्स। बस एक आदमी की पूरी जिंदगी, उसकी गलतियां, उसकी मोहब्बतें, और वो सवाल जो हर बुजुर्ग होते इंसान से कभी न कभी पूछा जाता है — क्या तुम्हारे उसूल अब भी किसी काम के हैं?
यही है 1943 में आई “द लाइफ एंड डेथ ऑफ कर्नल ब्लिम्प”, जिसे माइकल पॉवेल और एमरिक प्रेसबर्गर ने मिलकर बनाया था। और मजे की बात ये है कि इस फिल्म को खुद विंस्टन चर्चिल ने पसंद नहीं किया था — उन्होंने इसे रोकने की पूरी कोशिश की। एक ऐसी फिल्म जो आज भी ब्रिटिश सिनेमा की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है, उसे बनते वक्त देश की अपनी सरकार ने ही खतरा माना था। ये कहानी वहीं से शुरू होती है।

एक कार्टून से निकला किरदार
कर्नल ब्लिम्प नाम असल में एक कार्टून कैरेक्टर से आया है। डेविड लो नाम के एक ब्रिटिश कार्टूनिस्ट अखबारों में एक मोटे, लाल चेहरे वाले, बड़ी मूंछों वाले अफसर की तस्वीरें बनाया करते थे — एक ऐसा किरदार जो टर्किश बाथ में तौलिया लपेटे बैठा-बैठा उल्टी-सीधी बातें बोलता रहता। ये कार्टून उस दौर के पुराने खयालात वाले, अकड़ू फौजी अफसरों का मजाक था।
पॉवेल और प्रेसबर्गर ने इस नाम को उठाया, इस किरदार की शक्ल-सूरत भी रखी, लेकिन जो कहानी लिखी वो बिल्कुल अलग निकली। उन्होंने इस मजाकिया किरदार को इंसान बना दिया — उसकी अपनी यादें, अपना दर्द, अपनी मोहब्बतें। यही इस फिल्म को खास बनाता है। ये किसी कार्टून पर बनी फिल्म नहीं है, बल्कि उस कार्टून के पीछे छिपे इंसान की तलाश है।
कहानी क्या है
फिल्म की शुरुआत होती है 1943 में, जहां जनरल क्लाइव विन-कैंडी (रॉजर लिवेजी) एक फौजी ट्रेनिंग एक्सरसाइज के दौरान एक जवान अफसर के हाथों बेइज्जत हो जाते हैं। वो जवान अफसर जानबूझकर “खेल के नियम” तोड़ता है ताकि साबित कर सके कि पुराने जमाने की शराफत और ईमानदारी अब नाजी जर्मनी जैसे दुश्मन के सामने बेकार साबित होगी। यहीं से फिल्म एक हैरान करने वाला मोड़ लेती है — कहानी पीछे की तरफ चलनी शुरू होती है, पूरे चालीस साल पीछे।
हम कैंडी को 1902 में देखते हैं, बोअर युद्ध से लौटे एक जोशीले, हसीन जवान अफसर के रूप में। बर्लिन में एक मामूली सी बात पर वो एक जर्मन अफसर थियो क्रेत्श्मार-शुल्डोर्फ से द्वंद्वयुद्ध (duel) लड़ बैठते हैं — दोनों एक-दूसरे को जानते तक नहीं, बस किस्मत से उनका नाम चुना गया था लड़ने के लिए। लेकिन इसी लड़ाई के बाद, जब दोनों एक ही अस्पताल के कमरे में ठीक हो रहे होते हैं, एक ऐसी दोस्ती की शुरुआत होती है जो दो विश्व युद्धों और एक पूरी जिंदगी तक चलती है। एंटन वॉलब्रुक ने थियो का किरदार निभाया है, और फिल्म के आखिरी हिस्सों में जब वो बताता है कि उसे अपने ही देश से क्यों भागना पड़ा, वो सीन आज भी दिल पर असर छोड़ जाता है।
और फिर हैं डेबोरा कैर, जो फिल्म बनते वक्त सिर्फ इक्कीस साल की थीं, और जिन्होंने इस फिल्म में तीन अलग-अलग किरदार निभाए हैं — कैंडी की जिंदगी के अलग-अलग पड़ावों पर आने वाली तीन औरतें, जो दिखने में एक जैसी लगती हैं। ये आइडिया सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन पर्दे पर ये फिल्म का सबसे भावुक हिस्सा बन जाता है — मानो कैंडी अपनी पूरी जिंदगी एक ही खयाल के पीछे भागता रहा, और जब वो उसके सामने खड़ा था, तब उसे पहचान ही नहीं पाया।
चर्चिल को क्यों नहीं भाई ये फिल्म
ये समझना जरूरी है कि 1943 में ये फिल्म बनाना कितना अजीब फैसला था। ब्रिटेन तब भी युद्ध में उलझा हुआ था। लोगों को हीरोगीरी चाहिए थी, साफ-साफ अच्छे-बुरे का फर्क चाहिए था। लेकिन पॉवेल और प्रेसबर्गर ने कुछ बिल्कुल उल्टा परोस दिया — एक ऐसी कहानी जो ये सवाल उठाती है कि क्या ईमानदारी और शराफत, जो एक ब्रिटिश अफसर की पहचान मानी जाती थी, वही उन्हें नाजी जर्मनी जैसे बेरहम दुश्मन के सामने कमजोर बना सकती है।

ब्रिटिश सरकार को ये बिल्कुल पसंद नहीं आया। उन्हें डर था कि ये फिल्म ऐन युद्ध के बीच फौज का मजाक बना रही है, और उससे भी बुरा — एक जर्मन किरदार को हमदर्दी के साथ दिखा रही है। कहा जाता है कि चर्चिल ने खुद इस फिल्म को रुकवाने की कोशिश की और लंबे समय तक इसे अमेरिका में रिलीज होने से रोका, जिसकी वजह से सालों तक दुनिया भर में इसका छोटा किया हुआ वर्जन ही चलता रहा। सोचने वाली बात है — जो फिल्म असल में ब्रिटिश किरदार की तारीफ करती है, उसे उसी देश की सरकार ने खतरनाक मान लिया।
क्योंकि अगर गौर से देखें तो ये फिल्म ब्रिटेन विरोधी बिल्कुल नहीं है। ये सिर्फ ये पूछती है कि ब्रिटिशपन में क्या बचाने लायक है और क्या बदलने का वक्त आ गया है। कैंडी का मजाक नहीं उड़ाया गया — उसके लिए अफसोस जताया गया है, जैसे कोई अपनों को बूढ़ा होते और वक्त से पीछे छूटते देखकर महसूस करता है, वो भी बिना किसी गलती के, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने बदलने से इनकार कर दिया।
वो टेक्निकलर जिसकी बात आज भी होती है
इस फिल्म को देखने वाले किसी से भी पूछिए, सबसे पहले उन्हें कहानी नहीं, बल्कि उसके रंग याद आते हैं। जॉर्ज पेरिनल और जैक कार्डिफ की सिनेमेटोग्राफी को टेक्निकलर के दौर की सबसे खूबसूरत फिल्मों में गिना जाता है। ये पॉवेल-प्रेसबर्गर का रंगीन फिल्मों में पहला काम था, और उन्होंने रंग को सजावट की तरह नहीं, बल्कि एक भावना जताने का जरिया बना दिया — कैंडी की जवानी की गर्माहट भरी सुनहरी रोशनी, धीरे-धीरे युद्ध के दौर की ठंडी, कठोर रोशनी में बदलती जाती है।
फिल्म में एक सीन खासतौर पर याद रखने लायक है — बूढ़े कैंडी से जवान कैंडी में बदलने वाला वो हिस्सा। ये किसी साधारण डिजॉल्व या फेड से नहीं दिखाया गया, बल्कि एक स्विमिंग पूल को इस्तेमाल करके पूरे चालीस साल को एक ही, बिना कट के शॉट में गायब कर दिया गया। फिल्म के छात्र आज भी इस सीन को पढ़ते हैं, इसलिए नहीं कि ये चमकदार है, बल्कि इसलिए कि इसने एक बेहद मुश्किल कहानी कहने की समस्या को इतनी सहजता से हल कर दिया।
युद्ध की फिल्म, जिसमें कोई युद्ध नहीं
शायद इस फिल्म का सबसे साहसी फैसला यही है — बोअर युद्ध से लेकर पहले और दूसरे विश्व युद्ध तक फैली इस कहानी में, कहीं भी असल लड़ाई नहीं दिखाई गई। एक बार भी नहीं। हिंसा के सबसे करीब जो सीन जाता है वो कैंडी और थियो का द्वंद्वयुद्ध है, और वो भी कैमरे के सामने नहीं होता — गिरती हुई बर्फ के पीछे छिपा दिया जाता है, क्योंकि फिल्म को हिंसा को तमाशा बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसे दिलचस्पी है कि युद्ध दोस्ती का क्या करता है, प्यार के आदर्शों का क्या करता है, और उम्र बढ़ने के साथ इंसान अपने आप को बेकार महसूस क्यों करने लगता है।
यही वजह है कि ये फिल्म आज भी उतनी ही असरदार लगती है, जबकि उसी दौर की कई “महान युद्ध फिल्में” अब पुरानी लगने लगी हैं। ये फिल्म कभी युद्ध के बारे में थी ही नहीं। ये एक अच्छे इंसान को धीरे-धीरे ये समझते देखने के बारे में है कि दुनिया उसके बिना आगे बढ़ चुकी है — और अजीब बात ये कि इसमें उतना दुख नहीं है जितना उसे डर था।

क्या ये फिल्म आज भी देखने लायक है
हैरानी की बात ये है कि जवाब है — हाँ, और वो भी बिना किसी नोस्टैल्जिया के। आजकल के दर्शक जो एक्शन से भरी युद्ध फिल्मों के आदी हैं, वो अक्सर इस फिल्म से भी वैसी ही उम्मीद लेकर आते हैं और उन्हें मिलता है एक धीमी, किताब जैसी कहानी — सब्र मांगने वाली, लेकिन बीच-बीच में बेहद खूबसूरत ब्रिटिश तरीके का हल्का-फुल्का मजाक भी। 163 मिनट की ये फिल्म सच में सब्र मांगती है, ये किसी थके हुए, बिखरे हुए शाम के लिए बनी फिल्म नहीं है। लेकिन रॉजर लिवेजी का अभिनय, चालीस साल की उम्र में शारीरिक और भावनात्मक बदलाव को इतनी सच्चाई से दिखाना, आज भी उतना ही छू जाता है।
इसे देखने की एक और वजह है — ये फिल्म बताती है कि समाज उन लोगों के साथ कैसा बर्ताव करता है जो अपने उसूलों को छोड़ने से इनकार कर देते हैं, भले ही वो उसूल अब बेकार हो चुके हों। ये सवाल सिर्फ युद्ध के दौर का नहीं है। ये हर दौर का सवाल है।
आखिरी बात
“द लाइफ एंड डेथ ऑफ कर्नल ब्लिम्प” कोई ऐसी फिल्म नहीं है जिसे तेज कहानी के लिए देखा जाए। इसे देखा जाता है एक पूरी इंसानी जिंदगी के साथ बैठने के लिए — उसके आदर्श, उसकी कमजोरियां, वो दोस्तियां जो जंगों से भी लंबी चलती हैं, और वो छोटे-छोटे नुकसान जो चुपचाप जमा होते जाते हैं। पॉवेल और प्रेसबर्गर ने एक मज़ेदार कार्टून किरदार को उठाया और उसे लगभग ज़िद करके एक आत्मा दे दी। लगभग एक सदी बाद भी, ये फैसला किसी बगावत जैसा ही लगता है।
अगर आप ब्रिटिश सिनेमा की जड़ों को समझना चाहते हैं, या सिर्फ एक ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो जंग के बारे में बात करते हुए भी असल में इंसान के बारे में हो — तो “कर्नल ब्लिम्प” इंतजार करवाने लायक है, बशर्ते आप इसे सबसे अच्छी टेक्निकलर क्वालिटी में, बड़े स्क्रीन पर देखें।