एक इस्तीफा, चार पंख और एक जिंदगी भर का बदनुमा दाग — The Four Feathers Review

The Four Feathers Review

कभी-कभी एक फिल्म देखते वक्त लगता है कि ये सिर्फ किस्सा नहीं है, बल्कि एक सवाल है जो सीधा आपके अंदर उतर जाता है — बहादुरी असल में होती क्या है? “The Four Feathers” (1939) ऐसी ही एक फिल्म है। पहली नज़र में ये एक ब्रिटिश साम्राज्य की जंग की कहानी लगती है, मगर गहराई से देखो तो असल में ये एक आदमी की उस लड़ाई की कहानी है जो उसने खुद अपने अंदर के डर से लड़ी।

मैंने जब पहली बार ये फिल्म देखी, तो सच कहूं तो शुरुआत के बीस मिनट में ही समझ आ गया कि ये कोई मामूली एडवेंचर फिल्म नहीं है। ये उस दौर की फिल्म है जब सिनेमा अभी रंगों के साथ प्रयोग करना सीख ही रहा था, और डायरेक्टर्स के पास टेक्नीकलर जैसा नया हथियार हाथ में आया था। उस हथियार का इस्तेमाल जिस तरह इस फिल्म में हुआ है, वो आज भी हैरान करता है।

A.E.W. Mason's novel

कहानी की शुरुआत — एक बच्चे की आंखों से

फिल्म हमें ले जाती है 1885 के इंग्लैंड में। हैरी फेवरशैम नाम का एक पंद्रह साल का लड़का अपने पिता, एक रिटायर्ड जनरल, की डाइनिंग टेबल पर बैठा है। पिता के पुराने फौजी दोस्त जंग की कहानियां सुना रहे हैं — खून, बारूद, और वीरता की कहानियां। लेकिन ये बच्चा सहम जाता है। उसके चेहरे पर डर साफ झलकता है।

यही वो पल है जो पूरी फिल्म की नींव रखता है। क्योंकि हैरी सिर्फ एक फौजी परिवार में पैदा नहीं हुआ — उसे इस परिवार की विरासत ढोनी है, चाहे वो चाहे या न चाहे।

सालों बाद, 1895 में, हैरी अब एक जवान लेफ्टिनेंट बन चुका है। उसकी रेजिमेंट को सूडान भेजा जा रहा है, सूडान की उस जंग में जहां जनरल गॉर्डन की मौत का बदला लेना है। और ठीक तैनाती से एक रात पहले, हैरी अपना इस्तीफा दे देता है।

चार पंख जो बदल देते हैं सब कुछ

यहीं से कहानी अपना असली रंग दिखाती है। हैरी का ये फैसला उसके तीन सबसे करीबी दोस्तों — कैप्टन जॉन डुरांस, लेफ्टिनेंट बरोज़ और लेफ्टिनेंट विलॉबी — को गहरा झटका देता है। वो समझते हैं कि हैरी डर के मारे भागा है। नाराज़गी और शर्मिंदगी में तीनों उसे एक-एक सफेद पंख भेजते हैं — कायरता की निशानी।

तीन पंख तो फिर भी झेले जा सकते थे। असली चोट तब लगती है जब हैरी की मंगेतर एथने भी उससे कोई हमदर्दी नहीं दिखाती। हैरी खुद उसके पंखे से चौथा पंख निकाल लेता है — मानो कह रहा हो, “अगर तुम भी यही सोचती हो, तो ये लो, पूरी बात कर लो।”

ये सीन देखते वक्त एक अजीब सी बेचैनी होती है। क्योंकि हैरी का डर कोई काल्पनिक चीज़ नहीं था — वो बचपन से उस डर को अपने अंदर ढो रहा था। लेकिन उसके आसपास कोई ये समझने को तैयार नहीं था। यही वो जगह है जहां फिल्म असल में सिर्फ जंग की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि समाज के उस दबाव की कहानी बन जाती है जो मर्दानगी और बहादुरी को एक ही तराजू में तौलता है।

भेस बदलकर, अकेले जंग में

अपमान से टूटा हुआ हैरी हार नहीं मानता। वो चुपचाप सूडान का रुख करता है, खुद को एक स्थानीय व्यक्ति के रूप में छिपाकर। मकसद साफ है — अपने उन दोस्तों की जान बचाना जिन्होंने उसे कायर कहा था, और खुद को साबित करना, न सिर्फ उनके सामने, बल्कि खुद अपने सामने भी।

यहां से फिल्म असली एडवेंचर मोड में आ जाती है। रेगिस्तान की तपती धूप, खतरनाक जंग के मैदान, दुश्मन की कैद, भागने की कोशिशें — सब कुछ एक के बाद एक आता रहता है। जॉन क्लीमेंट्स ने हैरी के किरदार को जिस संयम से निभाया है, वो काबिले-तारीफ है। शुरुआत में एक कमज़ोर, डरा हुआ इंसान, और धीरे-धीरे वही इंसान अपने अंदर की ताकत खोजता हुआ नज़र आता है।

लेकिन अगर इस फिल्म का असली दिल कहीं धड़कता है, तो वो है राल्फ रिचर्डसन के किरदार जॉन डुरांस में। जंग के दौरान वो सूरज की तेज़ गर्मी और चमक की वजह से अपनी आंखों की रोशनी खो बैठता है। ये सीन इतना मार्मिक है कि जॉन क्लीमेंट्स का किरदार भी थोड़ा फीका पड़ जाता है उसके सामने। रिचर्डसन ने अंधेपन में डूबते एक मज़बूत फौजी के दर्द को इतनी बारीकी से दिखाया है कि उनका किरदार फिल्म खत्म होने के बाद भी दिमाग में अटका रहता है।

Heath Ledger

तकनीक की बात करें तो

अब बात करते हैं उस चीज़ की जो इस फिल्म को असल मायनों में यादगार बनाती है — इसकी सिनेमैटोग्राफी। जॉर्ज पेरिनल और ऑस्मंड बोराडेल ने जिस तरह सूडान की असली लोकेशन पर टेक्नीकलर में शूटिंग की, वो 1939 के हिसाब से एक बहुत बड़ा जोखिम था। ये कोई स्टूडियो में बना नकली रेगिस्तान नहीं है — ये असली धूप, असली रेत, और असली गर्मी है जो पर्दे से बाहर तक महसूस होती है।

इस सिनेमैटोग्राफी को ऑस्कर नॉमिनेशन भी मिला था, और ईमानदारी से कहूं तो ये पूरी तरह जायज़ है। आज के दौर में भी जब हम बड़े-बड़े VFX वाले एपिक्स देखते हैं, तो इस फिल्म के असली लोकेशन शॉट्स एक अलग ही असर छोड़ते हैं — क्योंकि जो दिख रहा है, वो असली है।

मिक्लोस रोज़्सा का बैकग्राउंड स्कोर भी फिल्म के हर बड़े पल को और गहरा बना देता है। जंग के दृश्यों में जो गूंजता हुआ म्यूज़िक बजता है, वो आपको सीट से बांधे रखता है।

तीन Korda भाइयों की साझा मेहनत

एक दिलचस्प बात ये है कि इस फिल्म को बनाने में तीनों कोर्डा भाई शामिल थे — अलेक्जेंडर कोर्डा प्रोड्यूसर थे, ज़ोल्तान कोर्डा ने डायरेक्शन संभाला, और विंसेंट कोर्डा प्रोडक्शन डिज़ाइनर थे। हंगरी से आकर इंग्लैंड में बसे इन तीनों भाइयों ने मिलकर London Films नाम की कंपनी बनाई थी, और ये फिल्म उनकी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनी जाती है।

ये फिल्म A.E.W. Mason के 1902 के उपन्यास पर आधारित है, और ये कोई पहली फिल्मी एडाप्टेशन नहीं थी। इससे पहले 1915, 1921 और 1929 में भी इस कहानी पर फिल्में बन चुकी थीं। लेकिन ज्यादातर फिल्म समीक्षक और इतिहासकार इसी 1939 वाले वर्जन को सबसे बेहतरीन मानते हैं — और देखने के बाद समझ आता है क्यों।

अब बात करते हैं उस पहलू की जो अनदेखा नहीं किया जा सकता

ईमानदारी से बात करें तो इस फिल्म को आज के नज़रिए से देखना थोड़ा असहज भी करता है। ये फिल्म साफ तौर पर ब्रिटिश साम्राज्यवाद को महिमामंडित करती नज़र आती है। सूडान के स्थानीय लोगों और महदी विद्रोहियों को जिस तरह पेश किया गया है, वो आज के दर्शक को असहज कर सकता है। कई किरदार ऐसे भी हैं जिन्हें गोरे एक्टर्स ने ही मेकअप लगाकर निभाया है, जो आज के मापदंडों पर बिल्कुल फिट नहीं बैठता।

ये कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म की जड़ें उस दौर की सोच में गहराई से धंसी हुई हैं — जहां साम्राज्य का विस्तार वीरता का प्रतीक माना जाता था। अगर आप इस फिल्म को देखने जा रहे हैं, तो ये संदर्भ ध्यान में रखना ज़रूरी है। फिल्म की कहानी, इसका इमोशनल कोर बेहद मज़बूत है, लेकिन इसका राजनीतिक ढांचा उस दौर की एक तस्वीर भर है, आज के मूल्यों की नहीं।

फिर भी, अगर आप इसे उस दौर के प्रोडक्ट के तौर पर देखें, तो ये समझ आता है कि क्यों ये फिल्म 1939 में ब्रिटेन की सबसे कामयाब फिल्मों में गिनी गई थी।

Zoltan Korda Director

किरदारों की गहराई और कमजोरियां

स्क्रिप्ट की बात करें तो R.C. Sherriff, Lajos Biro और Arthur Wimperis ने उपन्यास को पर्दे पर उतारने का बेहतरीन काम किया है। फिल्म के पहले हिस्से में, जब हैरी के डर और समाज की अपेक्षाओं के बीच का टकराव दिखाया जाता है, वो हिस्सा सबसे मज़बूत लगता है। लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, कहानी की गहराई थोड़ी कम होती जाती है, और ये एक सीधी-सादी एडवेंचर कहानी में बदल जाती है।

June Duprez ने एथने के किरदार में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, हालांकि फिल्म में महिला किरदारों की गुंजाइश बेहद सीमित रखी गई है। C. Aubrey Smith अपने रिटायर्ड जनरल के किरदार में हल्के-फुल्के पलों के लिए याद रह जाते हैं।

आखिर में क्या कहें इस फिल्म के बारे में

“The Four Feathers” (1939) एक ऐसी फिल्म है जो आपको सोचने पर मजबूर करती है — बहादुरी क्या सच में जंग के मैदान में साबित होती है, या फिर वो खुद के डर का सामना करने में छुपी होती है? हैरी फेवरशैम की कहानी असल में हर उस इंसान की कहानी है जिसने कभी न कभी समाज की उम्मीदों के आगे खुद को कमज़ोर महसूस किया हो।

हां, फिल्म का राजनीतिक नज़रिया आज के दौर में सवालों के घेरे में है। हां, इसकी कहानी बीच में कुछ जगह कमज़ोर भी पड़ती है। लेकिन इसकी सिनेमैटोग्राफी, इसका संगीत, और खासकर राल्फ रिचर्डसन की परफॉर्मेंस, इसे आज भी देखने लायक बनाती है।

अगर आपको क्लासिक ब्रिटिश सिनेमा में दिलचस्पी है, या फिर आप ये समझना चाहते हैं कि टेक्नीकलर के शुरुआती दौर में फिल्ममेकिंग कैसी दिखती थी, तो “The Four Feathers” (1939) एक ज़रूरी फिल्म है। ये एक इस्तीफे से शुरू होती है, चार पंखों की शर्मिंदगी से गुज़रती है, और आखिर में एक ऐसे सफर पर खत्म होती है जो साबित करता है कि असली हिम्मत हमेशा शोर मचाकर नहीं आती — कभी-कभी वो चुपचाप, बिना किसी को बताए, अंधेरे में भी अपना काम कर जाती है।

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