28 सितंबर को ठीक 97 साल पहले, 1929 में, इंदौर के एक मराठी परिवार में एक बच्ची पैदा हुई थी। घर वालों ने नाम रखा हेमा। तब किसी को अंदाज़ा नहीं था कि यही बच्ची आगे चलकर करोड़ों लोगों की सुबह के रेडियो, शाम की चाय और रात की तन्हाई का हिस्सा बन जाएगी।
लता मंगेशकर की कहानी गानों की गिनती भर नहीं है। ये तेरह साल की उम्र में सिर पर आ पड़ी ज़िम्मेदारी की कहानी है। ठुकराए जाने की कहानी है। और उस ज़िद की भी, जिसने फ़िल्म इंडस्ट्री के कई कायदे बदल दिए।
हेमा से लता कैसे बनीं
लता जी के पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर शास्त्रीय गायक थे और मराठी रंगमंच का जाना-माना नाम भी। उनका असली उपनाम हार्डीकर था, लेकिन गोवा के अपने गाँव मंगेशी की याद में उन्होंने मंगेशकर लिखना शुरू किया। घर में संगीत हवा की तरह था। सुबह रियाज़ होता, दोपहर को नाटक की तैयारी, और रात को महफ़िलें।

हेमा को “लता” नाम भी इसी रंगमंच से मिला। बताया जाता है कि पिता के नाटक “भावबंधन” में लतिका नाम का एक किरदार था, और उसी से प्रभावित होकर उन्होंने बेटी का नाम बदल दिया। बच्ची पाँच भाई-बहनों में सबसे बड़ी थी। उसके बाद मीना, आशा, उषा और हृदयनाथ आए।
पाँच साल की उम्र से ही पिता ने उन्हें सिखाना शुरू कर दिया था। कहा जाता है कि छोटी लता ने नाटकों में भी छोटे-मोटे किरदार निभाए। पर एक बात शुरू से साफ़ थी। सुर उनके पास सीखी हुई चीज़ की तरह नहीं, बल्कि साँस की तरह आया था।
तेरह साल की उम्र और एक झटका
अप्रैल 1942 में दीनानाथ मंगेशकर का निधन हो गया। लता तब सिर्फ़ तेरह साल की थीं। घर की सबसे बड़ी बेटी, और सिर पर चार छोटे भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी।
यहाँ से बचपन ख़त्म हो गया। पिता के पुराने दोस्त मास्टर विनायक, जो फ़िल्म कंपनी चलाते थे, परिवार के काम आए। लता को मराठी फ़िल्मों में छोटे रोल मिलने लगे। उनकी शुरुआती कमाई बहुत मामूली थी, कहीं-कहीं सिर्फ़ 25 रुपये बताई जाती है।
एक मराठी फ़िल्म के लिए उन्होंने अपना पहला गाना भी रिकॉर्ड किया, लेकिन फ़िल्म के अंतिम संस्करण में वो गाना रखा ही नहीं गया। इसके बाद 1943 की फ़िल्म “गजाभाऊ” में उन्हें पहला हिंदी गाना गाने का मौका मिला। असली पहचान अभी भी बहुत दूर थी।
“ये आवाज़ बहुत पतली है”
1945 में परिवार मुंबई आ गया। यहाँ का हिसाब बिल्कुल अलग था। उस दौर में फ़िल्मी गायन में नूरजहाँ और शमशाद बेगम जैसी भारी, खुली आवाज़ों का चलन था। लता की आवाज़ पतली और महीन थी, और कई संगीतकारों को लगा कि यह पर्दे पर नहीं चलेगी।
कहानी मशहूर है, हालाँकि इसके ब्योरे अलग-अलग जगह थोड़े अलग मिलते हैं। कहा जाता है कि निर्माता शशधर मुखर्जी ने “शहीद” फ़िल्म के समय लता की आवाज़ को बहुत पतली बताकर टाल दिया था। संगीतकार ग़ुलाम हैदर उस आवाज़ पर पूरा भरोसा करते थे। बताया जाता है कि उन्होंने तब कहा था कि एक दिन निर्माता इसी लड़की के दरवाज़े पर कतार लगाकर खड़े होंगे।
ग़ुलाम हैदर ने उन्हें “मजबूर” (1948) में मौका दिया। यही वो पहला मोड़ था, जब लोगों ने ठहरकर सुना कि ये आवाज़ कुछ अलग है।
1949: जब किस्मत ने करवट ली
असली धमाका 1949 में हुआ। दो फ़िल्में आईं, “महल” और “बरसात”।
“महल” में खेमचंद प्रकाश के संगीत में मधुबाला पर फ़िल्माया गया गाना “आएगा आनेवाला” इतना चला कि रातोंरात लता का नाम हर घर तक पहुँच गया। उसी साल “बरसात” में शंकर-जयकिशन के साथ उनका सफ़र शुरू हुआ। अब वे सिर्फ़ एक नई गायिका नहीं थीं। इंडस्ट्री को समझ आ चुका था कि ये आवाज़ हीरोइन की आवाज़ बनने वाली है।

इसके बाद के दशकों में नौशाद, एस.डी. बर्मन, मदन मोहन, आर.डी. बर्मन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे लगभग हर बड़े संगीतकार के साथ उन्होंने काम किया। “मुग़ल-ए-आज़म” (1960) का “प्यार किया तो डरना क्या” उसी दौर का एक मील का पत्थर है।
आवाज़ के पीछे का अनुशासन
लता जी की महानता में प्रतिभा से ज़्यादा अनुशासन की भूमिका थी। कहा जाता है कि वे रिकॉर्डिंग स्टूडियो में चप्पल उतारकर जाती थीं, क्योंकि उनके लिए वो जगह मंदिर जैसी थी। रियाज़ में उन्होंने कभी ढील नहीं दी।
बचपन में वे के.एल. सहगल की बहुत बड़ी प्रशंसक थीं। मुंबई आने के बाद उन्होंने उस्ताद अमानत अली खाँ देवासवाले से भी शास्त्रीय संगीत की तालीम ली। यही वजह थी कि कठिन से कठिन बंदिश भी उनके गले से आसानी से निकल जाती थी। उनके गाने सुनकर लगता था कि कोई मेहनत ही नहीं हुई, और असल में सबसे ज़्यादा मेहनत वहीं छिपी होती थी।
जब गायकों के हक़ की बात उठी
अपने करियर के शिखर पर पहुँचकर भी लता जी ने एक ऐसी लड़ाई लड़ी, जो आसान नहीं थी। उस ज़माने में गायकों को एक गाने के बदले तय रकम मिलती थी, और फ़िल्म कितना भी कमाए, गायक को उसका हिस्सा नहीं मिलता था। लता जी ने माँग की कि गायकों को रॉयल्टी मिलनी चाहिए।
इस मुद्दे पर उनकी और मोहम्मद रफ़ी की राय अलग थी। रफ़ी साहब का मानना था कि एक बार पैसे मिल गए तो बात ख़त्म। नतीजा ये हुआ कि कुछ साल दोनों ने साथ गाना बंद कर दिया। बाद में गिले-शिकवे दूर हुए और दोनों फिर साथ गाने लगे। पर इस पूरे विवाद ने आगे चलकर पार्श्व गायकों के अधिकारों की बहस को एक नई दिशा दे दी।
27 जनवरी 1963: वो शाम जब नेहरू की आँखें भर आईं
चीन के साथ 1962 की जंग के बाद देश का मन भारी था। 27 जनवरी 1963 को दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में एक कार्यक्रम हुआ, जिसमें लता जी ने कवि प्रदीप का लिखा और सी. रामचंद्र का संगीतबद्ध किया गीत “ऐ मेरे वतन के लोगों” गाया।
श्रोताओं में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी मौजूद थे। बताया जाता है कि गाना ख़त्म होते-होते उनकी आँखें नम हो गई थीं। ये गीत आज भी हर गणतंत्र दिवस पर याद किया जाता है, और इसके पीछे का किस्सा देशभक्ति की किसी भी किताब से ज़्यादा असर करता है।

बहनें, भाई और अकेली ज़िंदगी
लता जी का परिवार भी अपने आप में संगीत की एक पाठशाला था। छोटी बहन आशा भोसले आगे चलकर ख़ुद हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी गायिकाओं में गिनी गईं। उषा मंगेशकर ने मराठी और हिंदी में कई यादगार गाने गाए। भाई हृदयनाथ मंगेशकर संगीतकार बने। मीना खड़ीकर ने भी गायन और संगीत में अपनी जगह बनाई।
लता जी ने कभी शादी नहीं की। उनकी दुनिया भाई-बहनों, उनके बच्चों और संगीत के इर्द-गिर्द घूमती रही। क्रिकेट की भी वे बड़ी शौकीन थीं। कहा जाता है कि 1983 के विश्वकप जीत के बाद, जब बोर्ड के पास खिलाड़ियों को सम्मानित करने के लिए पैसे कम पड़ रहे थे, तब उनके एक कार्यक्रम से जुटी रकम ने काफ़ी मदद की।
सम्मानों की लंबी कतार
सम्मानों की सूची इतनी लंबी है कि गिनना मुश्किल है, फिर भी कुछ बड़े नाम याद रखने लायक हैं:
- पद्म भूषण (1969) और पद्म विभूषण (1999)
- दादासाहेब फाल्के पुरस्कार (1989)
- तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार, सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका के रूप में
- भारत रत्न (2001), देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान
इनके अलावा उन्हें फ्रांस सरकार ने भी अपने सर्वोच्च सम्मानों में से एक से नवाज़ा। पर लता जी के लिए शायद सबसे बड़ा पुरस्कार वो था, जो किसी ट्रॉफी में नहीं आता। यानी हर पीढ़ी में उनके गाने सुनने वाले नए लोग।
आख़िरी सुर
6 फ़रवरी 2022 को, 92 साल की उम्र में, मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में लता जी ने आख़िरी साँस ली। कुछ हफ़्ते पहले उन्हें कोविड और निमोनिया की शिकायत के बाद भर्ती कराया गया था।
अगले दिन मुंबई के शिवाजी पार्क में उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी गई। सरकार ने दो दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया। जिस मैदान में कभी क्रिकेट खेला जाता था, वहाँ उस दिन हज़ारों लोग ख़ामोश खड़े थे। और शायद सबके मन में उसी आवाज़ की कोई एक पंक्ति चल रही थी।
आज भी क्यों ज़िंदा हैं लता के गाने?
इसका जवाब शायद सबसे सीधा है। लता जी की आवाज़ में दिखावा नहीं था। वो जब गाती थीं, तो सुनने वाले को लगता था कि गाना उसी के लिए गाया जा रहा है। चाहे वो पहली मुहब्बत की झिझक हो, बिछड़ने का दर्द हो या देश के लिए गर्व।
आज की पीढ़ी जब उनके पुराने गाने सुनती है, तो हैरान रह जाती है कि सत्तर साल पुरानी रिकॉर्डिंग में भी आवाज़ इतनी ताज़ा क्यों लगती है। जवाब वही है। सच्चा सुर उम्र के साथ बूढ़ा नहीं होता।

कुछ सवाल जो अक्सर पूछे जाते हैं
लता मंगेशकर को “स्वर कोकिला” क्यों कहा जाता है?
कोयल की तरह मीठी और सुरीली आवाज़ के कारण। उनकी आवाज़ की मिठास और सुर की शुद्धता के लिए देश ने उन्हें ये उपाधि दी।
लता मंगेशकर का असली नाम क्या था?
उनका जन्म का नाम हेमा था। बाद में पिता ने उनका नाम लता रख दिया।
लता मंगेशकर का जन्म कब और कहाँ हुआ?
28 सितंबर 1929 को इंदौर में।
लता मंगेशकर को भारत रत्न कब मिला?
2001 में।
लता मंगेशकर का निधन कब हुआ?
6 फ़रवरी 2022 को, मुंबई में।
आख़िरी बात
लता मंगेशकर को याद करना सिर्फ़ अतीत में झाँकना नहीं है। ये याद दिलाता है कि तेरह साल की एक लड़की, जिसे कभी “बहुत पतली आवाज़” कहकर लौटा दिया गया था, हार माने बिना अपनी जगह बना सकती है।
इंदौर की वो हेमा आज हमारे बीच नहीं है, पर उसकी आवाज़ किसी रेडियो, किसी फ़ोन, किसी पुराने कैसेट में अब भी गूँज रही है। और जब तक कोई सुनने वाला है, ये सिलसिला चलता रहेगा।