कहते हैं कि कुछ फिल्में सिर्फ़ मनोरंजन के लिए नहीं बनी होतीं, बल्कि वो समाज के सामने एक आईना रखने का काम करती हैं। स्पेनिश सिनेमा, अपनी गहरी मानवीय अंतर्दृष्टि और यथार्थवादी चित्रण के लिए जाना जाता है, और मिगुएल पिकासो की 1964 में बनी फिल्म ‘ला तिया तुला’ (La Tía Tula) या ‘आंटी तुला’ इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। यह फिल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं सुनाती; यह एक जटिल मानसिक यात्रा है, जो प्रेम, कामुकता, धर्म, दमन और सामाजिक बंदिशों के बीच फँसी एक औरत की कहानी कहती है।
आज के दौर में, जब हम ‘फीमेल एजेंसी’ और ‘वुमन सेक्सुअलिटी’ जैसे शब्दों से रोज़ाना रूबरू होते हैं, ‘आंटी तुला’ को देखना एक अलग ही अनुभव दे जाता है। यह फिल्म 1960 के दशक के स्पेन के रूढ़िवादी कैथोलिक समाज की पृष्ठभूमि में बुनी गई है, जहाँ एक औरत के लिए उसकी इच्छाओं और समाज की उम्मीदों के बीच का संघर्ष बेहद मार्मिक है। अगर आप वर्ल्ड सिनेमा के शौकीन हैं, स्पेनिश फिल्मों में रुचि रखते हैं, या फिर बुनेल और साउरा जैसे डायरेक्टर्स की फिल्मों से परे कुछ और तलाश रहे हैं, तो यह फिल्म आपके वाचलिस्ट में ज़रूर होनी चाहिए।
कहानी का सार: मातृत्व बनाम पत्नीत्व का द्वंद्व
फिल्म की शुरुआत हमें तुला नाम की एक युवा महिला से मिलवाती है। वह एक ऐसी लड़की है जो अपनी बीमार बहन, रोसा, और उसके दो छोटे बच्चों की देखभाल करती है। रोसा का पति, रामिरो, भी घर में रहता है। रोसा की मृत्यु के बाद, तुला का जीवन पूरी तरह से बदल जाता है। वह अपनी बहन के बच्चों की देखभाल करने का फैसला करती है, लेकिन एक शर्त पर – वह रामन के साथ कोई शारीरिक संबंध नहीं रखेगी।
यहीं से शुरू होता है तुला का अंदरूनी और बाहरी संघर्ष। वह एक ‘माँ’ बनना चाहती है, लेकिन एक ‘पत्नी’ बनने से इनकार करती है। उसके लिए, मातृत्व एक पवित्र, निस्वार्थ भावना है, जबकि यौन संबंध गंदे और पाप से भरे हुए हैं। वह घर की ‘संरक्षिका’ बन जाती है, एक ऐसी मौसी जो बच्चों के लिए सब कुछ करती है, लेकिन अपने भीतर की औरत को मार देती है।
फिल्म तुला के इसी द्वंद्व को बखूबी दर्शाती है। वह रामिरो से शादी तो कर लेती है ताकि समाज में उसकी और बच्चों की इज्जत बनी रहे, लेकिन उसकी ‘पवित्रता’ को बचाए रखने के लिए उसे पति के साथ भी एक कमरे में सोने से इनकार कर देती है। यह टकराहट सिर्फ़ पति-पत्नी के बीच नहीं, बल्कि तुला की अपनी इच्छाओं और उसके कठमुल्लापन के बीच है। वह खुद को जिस पवित्रता के कवच में लपेटे रहती है, वही उसकी सबसे बड़ी जेल बन जाती है।
एक यादगार किरदार: ऑरोरा बौटिस्टा की अदाकारी में तुला
इस फिल्म की रीढ़ हैं ऑरोरा बौटिस्टा। उन्होंने तुला के किरदार में जान डाल दी है। तुला का किरदार बेहद जटिल है – एक ओर वह बच्चों के प्रति अथाह प्यार और कोमलता से भरी है, तो दूसरी ओर वह अपने पति और खुद के प्रति अविश्वसनीय रूप से कठोर और बर्फ़ जैसी ठंडी है। बौटिस्टा ने इस जटिलता को बिना किसी अतिरंजना के, बेहद सूक्ष्मता के साथ पर्दे पर उतारा है।
उनके चेहरे के भाव, आँखों में छिपी पीड़ा, कड़क आवाज़ के पीछे छिपी डरती हुई औरत – यह सब देखने लायक है। जब वह बच्चों से प्यार से बात करती है, तो दर्शकों का दिल पिघल जाता है, और जब वह रामिरो के किसी भी प्रयास को ठुकरा देती है, तो उसकी ठंडक से दर्शक सिहर उठते हैं। यह भूमिका निश्चित रूप से स्पेनिश सिनेमा की सबसे यादगार अभिनय प्रस्तुतियों में से एक मानी जाती है। अगर आप ‘विंटेज स्पेनिश सिनेमा’ के शौकीन हैं, तो सिर्फ़ ऑरोरा बौटिस्टा का यह शानदार अभिनय देखने के लिए भी यह फिल्म देख सकते हैं।
फिल्म का सामाजिक-धार्मिक संदर्भ: फ्रांको काल का स्पेन
‘आंटी तुला’ को समझने के लिए उस दौर के स्पेन को समझना ज़रूरी है। फिल्म 1964 में बनी थी, जब स्पेन पर जनरल फ्रांसिस्को फ्रांको की तानाशाही थी। उस समय स्पेन का समाज कट्टर कैथोलिक मूल्यों से प्रभावित था। औरतों की भूमिका largely घर तक सीमित थी – एक आदर्श पत्नी और माँ बनना ही उनका सर्वोच्च धर्म माना जाता था।
तुला का चरित्र इसी व्यवस्था की एक उत्पाद है, लेकिन एक विद्रोही उत्पाद। वह आदर्श माँ बनना चाहती है, लेकिन आदर्श पत्नी बनने से इनकार कर देती है। वह चर्च की शिक्षाओं से इतनी प्रभावित है कि वह शारीरिक इच्छाओं को पाप समझती है। उसका यह विरोधाभासी रवैया दरअसल सिस्टम के खिलाफ एक साइलेंट प्रोटेस्ट है। वह सिस्टम के दायरे में रहते हुए भी, उसकी कुछ शर्तों को मानने से इनकार कर देती है। इसलिए, यह फिल्म सिर्फ़ एक औरत की कहानी नहीं, बल्कि ‘फ्रांको युग की स्पेनिश महिला’ की मानसिक स्थिति का दस्तावेज भी है।
निर्देशन और सिनेमैटोग्राफी: यथार्थवाद की खूबसूरत बुनावट
मिगुएल पिकासो का निर्देशन इस फिल्म को एक साधारण नाटक से एक उत्कृष्ट कला फिल्म में बदल देता है। पिकासो ने बिना किसी भावुकतापूर्ण ड्रामे के, बेहद शांत और नियंत्रित अंदाज़ में यह कहानी कही है। फिल्म में ज्यादातर दृश्य घर के अंदरूनी हिस्सों में शूट किए गए हैं, जो तुला की मानसिक दीवारों और सीमित दुनिया का प्रतीक है।
सिनेमैटोग्राफी ब्लैक एंड व्हाइट है, और यह फिल्म को एक खास तरह का गहरा और दार्शनिक मूड देती है। कैमरा अक्सर तुला के चेहरे पर टिका रहता है, उसकी भावनाओं के हर उतार-चढ़ाव को कैद करता है। घर की दीवारें, सीढ़ियाँ, दरवाज़े – सब कुछ तुला के अकेलेपन और उसके भीतर के संघर्ष का हिस्सा लगते हैं। यह ‘साइकोलॉजिकल ड्रामा’ का बेहतरीन नमूना है जहाँ बाहरी दृश्य भीतरी उथल-पुथल को दर्शाते हैं।
तुलना के लिए: क्लासिक स्पेनिश सिनेमा में औरतें
अगर आप ‘विक्टर एरिस’ की फिल्म ‘द स्पिरिट ऑफ द बीहाइव’ (1973) देख चुके हैं, तो आपको ‘आंटी तुला’ में कुछ समानताएँ नज़र आएँगी। दोनों ही फिल्में फ्रांको काल के स्पेन में औरतों के दमन और उनकी इच्छाओं को दबाए जाने की कहानी कहती हैं। हालाँकि, जहाँ ‘द स्पिरिट ऑफ द बीहाइव’ में कामुकता और रहस्य का तत्व ज्यादा प्रबल है, वहीं ‘आंटी तुला’ एक सीधे, यथार्थवादी और अधिक दार्शनिक ढंग से इस विषय को उठाती है।
इसे आप ‘कार्लोस साउरा’ की फिल्मों, जैसे ‘कारमेन’ (1983), से भी जोड़कर देख सकते हैं, जो स्पेनिश समाज में औरतों की भूमिका और उनके विद्रोह को दर्शाती हैं। ‘आंटी तुला’ एक तरह से इन सभी फिल्मों की पूर्ववर्ती और एक क्लासिक आधारशिला है।
फिल्म की प्रासंगिकता: आज के दौर में ‘आंटी तुला’
सवाल उठता है कि आज के आधुनिक दौर में, जब औरतें हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, इस 1964 की फिल्म का क्या महत्व है? जवाब है – बहुत ज्यादा। ‘आंटी तुला’ की कहानी सिर्फ़ 1960 के स्पेन तक सीमित नहीं है। यह उन औरतों की कहानी है जो आज भी रूढ़िवादी समाजों में, धर्म और परंपरा के नाम पर, अपनी इच्छाओं और पहचान को दबाए रखती हैं।
तुला का चरित्र हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या धार्मिक नैतिकता के नाम पर खुद को दबाना वाकई में पवित्रता है, या एक तरह का आत्म-विनाश है? क्या मातृत्व और यौनिकता को अलग-अलग खानों में बाँटा जा सकता है? ये सवाल आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने 1964 में थे। फिल्म ‘फेमिनिस्ट फिल्म थ्योरी’ के दृष्टिकोण से भी विश्लेषण के लिए एक समृद्ध पाठ प्रस्तुत करती है।
कमियाँ और विवाद: एक संतुलित नज़रिया
हर महान फिल्म की तरह, ‘आंटी तुला’ भी आलोचनाओं से अछूती नहीं है। कुछ दर्शकों को यह फिल्म बहुत धीमी और नीरस लग सकती है। यह एक एक्शन-पैक्ड या फास्ट-पेस्ड ड्रामा नहीं है। यह एक ‘स्लो बर्न’ फिल्म है, जो दर्शकों से धैर्य और गहरी सोच की माँग करती है।
कुछ आलोचकों का मानना है कि तुला का चरित्र कभी-कभी इतना कठोर और अमानवीय लगने लगता है कि दर्शकों के लिए उससे सहानुभूति रख पाना मुश्किल हो जाता है। हालाँकि, यही इस किरदार की सच्चाई और जटिलता है। वह एक आदर्श नायिका नहीं है; वह एक पीड़ित भी है और खुद अपनी पीड़ा का कारण भी।
निष्कर्ष: क्या आपको ‘आंटी तुला’ देखनी चाहिए?
अगर आपका जवाब ‘हाँ’ है, तो आप एक यादगार सिनेमाई अनुभव के लिए तैयार हो जाइए। ‘ला तिया तुला’ स्पेनिश सिनेमा का एक ज़रूरी टुकड़ा है। यह एक ऐसी फिल्म है जो फिल्म खत्म होने के बाद भी आपके दिमाग में घूमती रहती है। आप तुला के चरित्र पर बहस करते रह जाते हैं, उसके फैसलों को समझने की कोशिश करते हैं।
यह फिल्म सिर्फ़ कहानी नहीं, एक ‘साइकोलॉजिकल स्टडी’ है। अगर आप निम्नलिखित में से किसी भी चीज़ में दिलचस्पी रखते हैं, तो यह फिल्म आपके लिए ही है:


