Movie Nurture: Five Golden Flowers (1959): चीन की वो फिल्म जिसमें खिले थे प्यार और समाजवाद के रंग

Five Golden Flowers (1959): चीन की वो फिल्म जिसमें खिले थे प्यार और समाजवाद के रंग

साल 1959 की बात है। चीन में ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ का दौर चल रहा था—जहाँ एक तरफ़ लोहे के कारख़ाने धुआँ उगल रहे थे, वहीं सिनेमा के परदे पर एक फिल्म ने प्रेम, संगीत और रंगों की बरसात कर दी। “Five Golden Flowers” (वू जिन हुआ) नाम की यह फिल्म आज भी चीन में उसी तरह याद की जाती है, जैसे भारत में “मदर इंडिया” या “शोले”। मगर यह कोई राजनीतिक प्रचार फिल्म नहीं, बल्कि युन्नान प्रांत के पहाड़ों में खिले फूलों जैसी एक नाज़ुक प्रेम कहानी है—जिसमें समाजवाद की खुशबू भी है, और इंसानी रिश्तों की मिठास भी।

Movie Nurture: Five Golden Flowers (1959): चीन की वो फिल्म जिसमें खिले थे प्यार और समाजवाद के रंग

कहानी: जब एक युवक की तलाश बन गई पाँच ‘गोल्डन फ्लावर’ की सैर

फिल्म की शुरुआत एक खूबसूरत बसंत के दिन होती है। बाई जाति के तीसरे चंद्र महीने के त्योहार पर, युवक आह-हाई (अभिनेता: यांग लीक्सिन) एक लड़की से मिलता है—जिसका नाम जिन हुआ (गोल्डन फ्लावर) है। प्यार की पहली नज़र में ही दोनों एक-दूसरे के हो जाते हैं। मगर तभी भीड़ में वह लड़की खो जाती है। आह-हाई उसे ढूंढ़ने निकल पड़ता है, और इस दौरान उसे पाँच अलग-अलग लड़कियों से मुलाक़ात होती है—जिन सभी का नाम जिन हुआ है!

  1. कम्यून लीडर जिन हुआ: गाँव की मेहनती नेता, जो ट्रैक्टर चलाती है।
  2. हंटर जिन हुआ: शिकारी लड़की, जो बंदूक़ से निशाना लगाती है।
  3. ब्लैकस्मिथ जिन हुआ: लोहार की बेटी, जो हथौड़े से लोहे को आग में तपाती है।
  4. फिशरमैन जिन हुआ: मछुआरे की बेटी, जो नदी में जाल फेंकती है।
  5. डेयरी वर्कर जिन हुआ: दूध की डेयरी में काम करने वाली मासूम लड़की।

हर जिन हुआ अपने काम में माहिर है, और हर एक आह-हाई के दिल को छू जाती है। मगर असली जिन हुआ कौन है? यह सवाल फिल्म को एक मीठी पहेली बना देता है।

सांस्कृतिक कशीदा: बाई जाति की ज़िंदगी के रंग

फिल्म की असली हीरोइन चीन की बाई जाति है। युन्नान के पहाड़ों में रहने वाले इस समुदाय के रीति-रिवाज़, पारंपरिक पोशाकें और त्योहार—यह फिल्म इन सबको एक कैनवस की तरह बुनती है। बाई लोगों का प्रसिद्ध “तीसरा चंद्र त्योहार” दिखाया गया है, जहाँ युवक-युवतियाँ गाने गाकर अपना जीवनसाथी चुनते हैं। लोक नृत्य, हाथ से बने रंगीन कपड़े, और लकड़ी के पारंपरिक घर—यह सब फिल्म को एक जीवंत एथनोग्राफ़ी बना देता है।

मगर यहाँ एक विडंबना भी है। फिल्म 1959 में आई, जब चीन में सामूहिक खेती और औद्योगिकीकरण का दौर चल रहा था। बाई समुदाय की यह रंगीन दुनिया शायद एक “सांस्कृतिक यूटोपिया” थी—जहाँ समाजवाद और पारंपरिकता साथ-साथ चलते हैं।

Movie Nurture: Five Golden Flowers (1959): चीन की वो फिल्म जिसमें खिले थे प्यार और समाजवाद के रंग

गीत-संगीत: पहाड़ों में गूँजती प्रेम की तान

फिल्म के गीत आज भी चीन में गुनगुनाए जाते हैं। “दूर के पहाड़ों पर” और “तुम कौन हो गोल्डन फ्लावर” जैसे गाने सुनकर लगता है मानो युन्नान की हवा चेहरे को छू रही हो। बाई लोक संगीत के साज़—जैसे सान-शियान (तीन-तार वाद्य) और बांसुरी—इन गानों को एक अलग ही आत्म अहसास देते हैं।

कल्पना कीजिए: आह-हाई और जिन हुआ पहाड़ी नदी के किनारे गीत गा रहे हैं, और उनकी आवाज़ें बादलों से टकराकर वापस लौटती हैं। यह दृश्य सिनेमाई कविता से कम नहीं!

चरित्र: पाँच फूल, पाँच कहानियाँ

फिल्म का जादू इसके किरदारों में है। हर जिन हुआ सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि एक विचारधारा है:

  • कम्यून लीडर जिन हुआ समाजवाद की प्रतीक है—मज़बूत, निडर, और समर्पित।
  • हंटर जिन हुआ प्रकृति के साथ सहअस्तित्व की कहानी कहती है।
  • ब्लैकस्मिथ जिन हुआ महिला सशक्तिकरण का प्रतिनिधित्व करती है (1950 के दशक में यह क्रांतिकारी था!)।

मगर सबसे यादगार है आह-हाई का किरदार। वह कोई ‘सुपरहीरो’ नहीं, बल्कि एक साधारण युवक है—जो प्यार के लिए भटकता है, गलतियाँ करता है, और अंत में समझता है कि “प्रेम सिर्फ़ एक इंसान नहीं, बल्कि एक समुदाय को खोजने की यात्रा है।”

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: समाजवाद का गुलदस्ता

1959 में, चीन में “ग्रेट लीप फॉरवर्ड” चल रहा था—एक अभियान जो देश को औद्योगिक महाशक्ति बनाना चाहता था। इसी दौर में “Five Golden Flowers” ने एक अलग रास्ता चुना। यह फिल्म न तो खुलेआम प्रचार करती है, न ही राजनीति की आलोचना। बल्कि, यह समाजवाद को मानवीय चेहरा देती है—जहाँ महिलाएँ ट्रैक्टर चलाती हैं, पुरुष उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं, और प्रेम सामूहिकता के बीच भी खिलता है।

मगर क्या यह वास्तविकता थी या सिर्फ़ सरकारी प्रोपेगैंडा? फिल्म के निर्देशक वांग जियायी ने इस सवाल को धुंधला छोड़ दिया। उन्होंने बाई समुदाय की खुशहाली दिखाई, मगर गाँवों में हो रहे संघर्षों को नज़रअंदाज़ किया।

विरासत: आधुनिक चीनी सिनेमा की नींव

“Five Golden Flowers” आज भी चीन में एक कल्ट क्लासिक है। यह फिल्म 1950 के दशक की उन चंद फिल्मों में से है जिन्होंने चीनी सिनेमा को बॉलीवुड जैसा रंगीन और संगीतमय बनाया। 2000 में, चीनी टीवी ने इसका रीमेक बनाया, मगर वह मूल की बात नहीं छू सका।

भारतीय दर्शकों के लिए, यह फिल्म “नया दौर” (1957) की याद दिलाती है—जहाँ ट्रैक्टर और तरक्की के गीत गाए गए थे। मगर “Five Golden Flowers” में प्रेम कहानी का मसाला ज़्यादा है!

Movie Nurture: Five Golden Flowers (1959): चीन की वो फिल्म जिसमें खिले थे प्यार और समाजवाद के रंग

आलोचना: कमियाँ या खूबियाँ?

कुछ लोग कहते हैं कि यह फिल्म “टू शुगरी” है। हर दृश्य में खुशियाँ ही खुशियाँ, कोई संघर्ष नहीं। मगर यही तो इसकी खासियत है! 1959 के दौर में, जब चीन अकाल और राजनीतिक उथल-पुथल से जूझ रहा था, यह फिल्म लोगों के लिए एक सपना थी—एक ऐसी दुनिया का जहाँ प्यार और समुदाय सबसे बड़ी ताकत हैं।

निष्कर्ष: क्या यह फिल्म आज के दौर में प्रासंगिक है?

आज जब दुनिया भ्रष्टाचार, जलवायु संकट और अकेलेपन से जूझ रही है, “Five Golden Flowers” हमें याद दिलाती है कि “प्रगति और प्रकृति” साथ-साथ चल सकते हैं। यह फिल्म उस दौर की याद दिलाती है जब प्रेम सिर्फ़ दिलों में नहीं, बल्कि खेतों, कारख़ानों और नदियों में भी बसता था।

तो अगर आपको लगता है कि पुरानी फिल्में ‘बोरिंग’ होती हैं, तो एक बार युन्नान की इन पहाड़ियों की सैर कर आइए। शायद आपको भी अपनी “गोल्डन फ्लावर” मिल जाए!

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