तानाशाही के साये में कला — मारिया बाबानोवा की अदम्य जीवन गाथा
मॉस्को, 1922। थिएटर की सीटें खचाखच भरी हैं। पर्दा उठता है। मंच पर सजावट के नाम पर कुछ नहीं —…
Movie Reviews – Connect to Life
मॉस्को, 1922। थिएटर की सीटें खचाखच भरी हैं। पर्दा उठता है। मंच पर सजावट के नाम पर कुछ नहीं —…
कभी-कभी एक फिल्म देखते वक्त लगता है कि ये सिर्फ किस्सा नहीं है, बल्कि एक सवाल है जो सीधा आपके…
कलकत्ता। 1890 का दशक। शहर में उस वक़्त दो चीज़ें एक साथ चल रही थीं — अंग्रेज़ों की हुकूमत और…
लेखक की कलम से: कुछ फ़िल्में सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं बनती। कुछ फ़िल्में एक दर्पण होती हैं — जिसमें…
एक सुबह अमिताभ बच्चन अपनी गाड़ी में बैठे मुंबई के सांताक्रूज इलाके से गुज़र रहे थे। तभी उनकी नज़र एक…
कभी-कभी इतिहास की सबसे बड़ी बातें सबसे छोटी जगहों से शुरू होती हैं। एक थिएटर, एक कहानी, और एक सपना…
बात करें 1930 के दशक की, तो सिनेमा का पूरा नशा स्क्रीन पर था। हीरो था, हीरोइन थी, खलनायक था,…
कुछ हफ्ते पहले की बात है। मैं बेवजह इंटरनेट पर भटक रहा था — वो वाला भटकना जब नींद नहीं…
एक सवाल पूछता हूँ। अगर मैं कहूं कि 1930s में एक ऐसी अभिनेत्री थी जिसकी फिल्में पूरे सोवियत संघ के…
एक सवाल पूछना चाहता हूं आपसे। क्या आप जानते हैं कि भारतीय सिनेमा की पहली अभिनेत्री को फिल्म में काम…