Indian Cinema History in Hindi: 1913 से 1970 तक का Complete Timeline

Movie Nurture: भारतीय सिनेमा का इतिहास 1913 से 1970 तक दर्शाता हुआ विंटेज फिल्म कैमरा, फिल्म रील और स्वर्ण युग का प्रतीकात्मक चित्र

क्या आप कभी उस सिनेमाघर में बैठे हैं जहाँ लाइट बुझते ही पर्दे पर एक दुनिया जागती है? ये जो कहानियाँ हम साँस रोककर देखते हैं, इनकी जड़ें सौ साल से भी गहरी हैं। सोचिए, एक समय था जब फिल्मों में आवाज़ नहीं होती थी, फिर भी स्क्रीन का जादू लोगों के दिलों में उतर जाता था। आज मैं आपको उसी जादू के सफर पर ले चलता हूँ – सन् 1913 से लेकर 1970 तक। ये कोई सूखा इतिहास नहीं है, बल्कि सपनों, संघर्षों और गानों की एक लंबी दास्तान है। तो कुर्सी की पेटी बाँध लीजिए, पॉपकॉर्न हाथ में लीजिए, और चलिए बीते कल के सिनेमा में खो जाते हैं।

जब सिनेमा ने आँख खोली: 1913 से पहले का भारत

1913 से पहले भारत में मनोरंजन का मतलब था नौटंकी, रामलीला, पारसी थिएटर और जादूगरों के खेल। लोग मेलों में उमड़ते थे और किस्सागोई सुनने के लिए रात-रात भर जागते थे। तभी दुनिया के किसी और कोने में एक चमत्कार हो चुका था – लूमियर बंधुओं ने चलती-फिरती तस्वीरें दिखाकर लोगों को हैरान कर दिया था। 1896 में लूमियर ब्रदर्स की फ़िल्में मुंबई (तब बॉम्बे) के वाटसन होटल में दिखाई गईं। बस, उसी एक शाम ने हिंदुस्तानी ज़ेहन में एक बीज बो दिया। लेकिन असली कहानी तो तब शुरू हुई जब एक आदमी ने सोचा कि ये परदे वाला जादू सिर्फ विदेशियों का खेल क्यों रहे? हमारी अपनी पौराणिक कहानियाँ भी तो इसी परदे पर जीवित हो सकती हैं। और इस एक ख्वाब ने भारतीय सिनेमा को जन्म दिया।

Movie Nurture: Classic Bollywood

1913 – जब हरिश्चंद्र बोले, बिना बोले

3 मई 1913। मुंबई का ओलंपिया थिएटर। पर्दे पर एक अद्भुत नज़ारा – राजा हरिश्चंद्र अपनी रानी तारामती के साथ। कोई डायलॉग नहीं, बस संगीत बज रहा था और बीच-बीच में पर्दे पर शीर्षक उभरते थे। ये थी राजा हरिश्चंद्र, भारत की पहली फुल-लेंथ फीचर फिल्म, और इसके जनक थे दादा साहेब फाल्के

फाल्के साहब की कहानी अपने आप में फिल्मी पटकथा से कम नहीं। वे एक चित्रकार और फोटोग्राफर थे। एक दिन उन्होंने बॉम्बे में एक अंग्रेजी फिल्म देखी – द लाइफ ऑफ क्राइस्ट। स्क्रीन पर ईसा मसीह को देखकर उनके दिमाग में बिजली कौंध गई: “अगर ये हो सकता है तो हमारे राम, कृष्ण, हरिश्चंद्र क्यों नहीं?” बस फिर क्या था, फाल्के ने अपनी ज़मीन गिरवी रखी, सब कुछ बेचा और सिनेमा की तकनीक सीखने लंदन चले गए। उन्होंने वहाँ से एक कैमरा, रॉ फिल्म और प्रिंटिंग मशीन खरीदी। लौटकर उन्होंने पुरुषों को ही औरतों के किरदार में डाला, क्योंकि उस ज़माने में कोई महिला एक्टिंग को तैयार नहीं थी। कितना मुश्किल रहा होगा वो दौर – न स्टूडियो था, न ट्रेंड एक्टर, न कोई आधुनिक उपकरण। फाल्के खुद लेखक, निर्देशक, कैमरामैन, एडिटर और प्रोड्यूसर बने। चालीस मिनट की वो फिल्म जब परदे पर आई तो दर्शक हैरान रह गए। लोगों को लगा जैसे राजा सचमुच परदे पर आ गए हों। एक इतिहासकार ने लिखा कि कोई दर्शक तो स्क्रीन के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया था। राजा हरिश्चंद्र ने सिखाया कि भारतीय कहानियाँ सिर्फ किताबों या रामलीला में नहीं, बल्कि सेल्युलाइड पर भी उतनी ही जीवंत लग सकती हैं। इसके बाद तो जैसे बाँध टूट गया। फाल्के ने मोहिनी भस्मासुर, सत्यवान सावित्री और लंका दहन जैसी फिल्में बनाकर एक नई परंपरा शुरू कर दी।

1920 का दशक: खामोशी का शोर

1920 का पूरा दशक मूक फिल्मों के नाम रहा। ये अजीब लगता है न – बिना आवाज़ की फिल्में फिर भी हर तरफ शोर मचा रही थीं। इस दौर में स्टूडियो सिस्टम ने जोर पकड़ा। कलकत्ता में जे.एफ. मदन का ‘एलफिंस्टन बायोस्कोप’, बॉम्बे में ‘कोहिनूर फिल्म कंपनी’, पुणे में ‘प्रभात फिल्म कंपनी’ जैसे दिग्गज खड़े हो गए। हर स्टूडियो अपनी अलग मुहर लगाने लगा।

उस दौर के कुछ चेहरे कभी भुलाए नहीं जा सकते। दुर्गादास बैनर्जी, सुलोचना (रूबी मायर्स), पटवर्धन बंधु और बिलीमोरिया बंधु जैसे कलाकारों ने खामोशी में ही करोड़ों दिलों की धड़कन बनना सीख लिया था। सुलोचना तो हिंदी सिनेमा की पहली सुपरस्टार थीं; उन्हें इतना पैसा मिलता था कि उनकी सैलरी पूरी फिल्म के बजट से ज़्यादा होती थी।

मूक फिल्मों की खासियत थी चेहरे के भाव और शरीर की भाषा। आँखों से बातें करना, इशारों से गुस्सा दिखाना, मुस्कान से प्यार जताना – एक्टर्स ने इसे एक बुलंद कला का दर्जा दे दिया था। विदेशी कहानियों के साथ-साथ अब हिंदू-मुस्लिम सामाजिक किस्से, पारसी नाटक और लोककथाएँ भी परदे पर उतर आई थीं। सिनेमा अब सिर्फ चमत्कार नहीं, एक आदत बन चुका था।

1931 – आलम आरा: जब सिनेमा बोल उठा

14 मार्च 1931 का दिन भारतीय सिनेमा का सबसे क्रांतिकारी दिन था। उस शाम मुंबई के मैजिस्टिक सिनेमा में एक पोस्टर चमक रहा था – आलम आरा – सभी जीवित, सभी बोलते, सभी गाते, सभी नाचते। ये भारत की पहली सवाक (talkie) फिल्म थी। अर्देशर ईरानी ने इसे निर्देशित किया था। जैसे ही स्क्रीन पर वज़ीर मोहम्मद खान मुँह खोलकर बोले “डियर, आई लव यू”, पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। लोग पागलों की तरह चिल्ला रहे थे – “बोलता है! बोलता है!”

आलम आरा ने हिंदी सिनेमा का नक्शा बदल दिया। अचानक संगीत और संवाद का तूफान आ गया। फिल्म में 7 गाने थे, हालाँकि आज उसकी एक भी रील मौजूद नहीं – कितना अजीब विरोधाभास है कि पहली बोलती फिल्म हमेशा के लिए खामोश हो गई। पर उसकी दस्तक इतनी ज़ोरदार थी कि 1931 के आखिर तक 27 और बोलती फिल्में बन चुकी थीं। अब संगीत फिल्मों की आत्मा बन गया है। जो कलाकार बिना आवाज़ के कमाल करते थे, उनमें से कई की नौकरियाँ चली गईं, क्योंकि अब अच्छी उर्दू, हिंदी और गाने वाली आवाज़ माँगी जाने लगी। सिनेमा ने एक बार फिर खुद को नए सिरे से खोजा।

Movie Nurture: Alam Ara

1930-40 का दशक: परदे पर आज़ादी का रंग

तीस का दशक आते-आते सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं रह गया था; वो देश की आवाज़ बन गया। देश में आज़ादी की लड़ाई चरम पर थी और परदे पर देशभक्ति, सामाजिक बुराइयों और ग़रीबी की तस्वीरें उभर रही थीं। ये वो समय था जब फिल्मकारों ने कैमरे को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया।

1934 में बॉम्बे टॉकीज की स्थापना हिमांशु राय और देविका रानी ने की, जिसने हिंदी सिनेमा को एक आधुनिक और प्रगतिशील चेहरा दिया। अछूत कन्या (1936) ने जात-पात और छुआछूत पर इतने खूबसूरती से चोट की कि अंग्रेज़ों को भी इसका जवाब नहीं सूझा। वहीं वी. शांताराम ने दुनिया न माने और आदमी जैसी फिल्मों में औरतों और मज़दूरों के सवाल उठाए।

देशभक्ति की लहर में बनी बंदिनी और किस्मत जैसी फिल्में सीधे दिल पर चोट करती थीं। 1943 में आई किस्मत ने तो सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए – ये पहली फिल्म थी जो एक थिएटर में लगातार 3 साल चली! इसके गाने “दूर हटो ऐ दुनियावालों, हिंदुस्तान हमारा है” पर तो अंग्रेज़ सरकार की आँखें तन गई थीं। लोग सिनेमाघर में खड़े होकर पूरे जोश से गाते थे। एक गीत जो मूलतः विदेशी ताकतों के खिलाफ लिखा गया था, वो क्रांतिकारियों का अनौपचारिक राष्ट्रगान बन गया। उस दशक ने साबित किया कि सिनेमा म्यूज़िक, डांस और ड्रामा से कहीं ऊपर उठकर देश का आईना बन सकता है।

1950 का दशक: सिनेमा का स्वर्ण युग

आज़ादी के बाद जो दशक आया, उसे हम प्यार से ‘स्वर्ण युग’ कहते हैं। और ये कोई बढ़ा-चढ़ाकर कहना नहीं है। पचास के दशक में कुछ ऐसा घटा कि पूरी दुनिया को लगा, हिंदी सिनेमा अब जाग गया है। एक तरफ थे राज कपूर – जो एक सपेरा, एक जोकर और एक मासूम सपने देखनेवाले की तरह सिनेमा बना रहे थे। उनकी आवारा (1951) और श्री 420 (1955) में गरीबी और अमीरी की खाई को जिस अंदाज़ में दिखाया गया, वो देखने लायक था। राज कपूर का बना ‘राजू’ का किरदार हर हिंदुस्तानी के दिल में उतर गया। खास तौर पर रूस और चीन में उनकी फिल्मों ने तहलका मचा दिया; आवारा का गाना “आवारा हूँ” सोवियत संघ में हर बच्चा गुनगुनाता था।

दूसरी तरफ गुरु दत्त थे। किसी शायर से कम नहीं। जब आप प्यासा (1957) या कागज़ के फूल (1959) देखते हैं तो लगता है कोई ग़ज़ल पर्दे पर जीवित हो गई है। गुरु दत्त ने कलाकार की अंदरूनी पीड़ा, समाज का ढोंग और प्यार की नाज़ुकता को अपने कैमरे से तराशा। उनके गाने, उनकी रोशनी, उनके क्लोज़-अप शॉट… सब कुछ एक दर्द भरी आह की तरह हैं।

बिमल रॉय ने यथार्थवाद का ऐसा झंडा बुलंद किया जो कभी नीचे नहीं उतरा। दो बीघा ज़मीन (1953) ने शहरीकरण की मार झेल रहे आम किसान की कथा को इतनी संजीदगी से दिखाया कि कान्स फिल्म फेस्टिवल तक ने सिर झुका दिया। वहीं महबूब खान की मदर इंडिया (1957) तो हिंदुस्तानी औरत की सहनशीलता और शक्ति का एक भव्य महाकाव्य बन गई। ये ऑस्कर के लिए नॉमिनेट होने वाली पहली भारतीय फिल्म बनी और लाखों लोगों ने इसे सिर्फ फिल्म नहीं, एक तीर्थ की तरह देखा।

इस दशक में संगीत ने भी अपनी जान डाल दी। नौशाद, एस.डी. बर्मन, शंकर-जयकिशन, मजरुह सुल्तानपुरी, शकील बदायूँनी, लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी – ये नाम जुबान पर आते ही कानों में कोई सुर गूंजने लगता है। स्क्रीन पर कहानी चलती थी, लेकिन दिलों पर राज करते थे ये गीत-संगीत। 1950 का दशक, सच में, हिंदी सिनेमा का वो वक्त था जब वो बालिग़ हुआ।

1960 का दशक: रंगों, रोमांस और राजेश खन्ना का दौर

अगर पचास का दशक दिल की गहराई था, तो साठ का दशक दिल की धड़कन। सबसे बड़ा बदलाव आया रंग। तकनीक ने करवट ली और धीरे-धीरे ब्लैक एंड व्हाइट की जगह रंगीन सिनेमा ने ले ली। मुग़ल-ए-आज़म (1960), जो आधी रंगीन और आधी ब्लैक एंड व्हाइट थी, अपनी भव्यता से लोगों को बेहोश कर रही थी। उसके बाद जंगली (1961) में शम्मी कपूर के साथ पूरा ईस्टमैन कलर हिंदी सिनेमा में छा गया।

और शम्मी कपूर! ये वो तूफान थे जिसने युवाओं में एक नया जोश भर दिया। ये वो हीरो था जो ठुमके लगाता था, पहाड़ों और बर्फ़ में “याहू” चिल्लाता था, और प्रेमिका के साथ झूमता-गाता नज़र आता था। कश्मीर की कली, तीसरी मंज़िल और एन इवनिंग इन पेरिस ने फैशन, फ्रीडम और रोमांस का बिलकुल नया मॉडल पेश किया। उनके कारण ही भारतीय युवाओं ने टाइट पैंट, बड़े कॉलर वाली कमीज़ें और चौड़ी बेल्ट पहनना शुरू किया।

साठ का दशक अपने खत्म होने तक सुपरस्टार कल्चर की नींव रख रहा था। बड़े स्टूडियो टूट रहे थे, और स्टार सिस्टम उभर रहा था। दिलीप कुमार, देव आनंद, राजेंद्र कुमार अपने-अपने अंदाज़ में छाए हुए थे। और फिर 1969 में आया एक तूफान – आराधना। और उसके साथ एक नाम – राजेश खन्ना। उन्होंने जो दीवानगी पैदा की, वैसी पहले कभी नहीं देखी गई। लड़कियाँ उनकी तस्वीर पर लिपस्टिक के निशान छोड़ देतीं, उनकी कार को सफेद होने तक चूमती रहतीं। एक अकेला एक्टर, और पूरे देश में ‘जिंदगी एक सफर है सुहाना’ का नशा छा गया। 1960 के दशक के आखिर तक सिनेमा भव्य, शानदार और completely मसाला एंटरटेनर बनने की तरफ बढ़ चुका था।

Movie Nurture: 1960s Bollywood

1970 तक का बदलाव: एक नए युग की आहट

जैसे-जैसे 70 का दशक करीब आता गया, हवाएँ बदलने लगीं। आज़ादी के 25 साल बीत चुके थे, लेकिन बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और शहरी निराशा चरम पर थी। जो रोमांटिक हीरो कभी फूलों की घाटी में गाने गाता था, उस पर अब युवाओं का भरोसा उठने लगा था। लोग अब उस हीरो की तलाश में थे जो सिस्टम को मुक्का मार सके। सिनेमा के पर्दे रंगीन हो चुके थे, पर कहानीकारों की निगाहें फिर से हकीकत की तरफ मुड़ने लगी थीं।

यही वो दौर था जब एक नये किरदार की ज़मीन तैयार हो रही थी – एंग्री यंग मैन। 1970 में बनी खिलौना और कुछ अन्य फिल्में पुराने और नए सिनेमा का संगम थीं। मध्यवर्गीय गुस्सा अब इस कदर उबल रहा था कि उसे परदे पर उतरने में देर नहीं लगने वाली थी। 1913 में एक राजा के आदर्शों से शुरू हुआ ये सफर, 1970 आते-आते एक आम आदमी की मुट्ठी में तब्दील होने को बेताब था। यह वो पड़ाव था जहाँ खड़े होकर सिनेमा बीते कल को नमन करता है और आने वाले कल की तरफ दौड़ लगाता है।

ड्रीम फैक्ट्री का अनूठा सफर

1913 में एक अद्भुत सपने से शुरू हुई ये दास्तान, 1970 तक आते-आते एक विशाल बरगद बन चुकी थी। दादा साहेब फाल्के के उस अकेले प्रयास ने एक ऐसे उद्योग की नींव रख दी जो आज हर साल सैकड़ों फिल्में बनाता है। हमने मूक फिल्मों की अदाकारी देखी, आलम आरा के बोलने का जादू झेला, आज़ादी की लड़ाई को परदे पर जीया, और स्वर्ण युग के कालजयी संगीत में डूबकर ज़िंदगी को महसूस किया। राज कपूर का भोलापन, गुरु दत्त की उदासी, मदर इंडिया की ताकत और शम्मी कपूर का ‘याहू’ – ये सब सिर्फ सेल्युलाइड पर बने चित्र नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान बन गए।

भारतीय सिनेमा की ये विरासत हमें सिखाती है कि कोई भी तकनीक, चाहे वो साउंड हो या कलर, अगर कहानी और भावना से जुड़ी न हो, तो बेअसर रह जाती है। इन छह दशकों ने जो सबसे कीमती चीज़ दी, वो है भावनाओं को आवाज़ देने का हुनर। चाहे दुनिया कितनी भी आधुनिक हो जाए, आज भी जब कहीं ‘आवारा हूँ’ बजता है, या मदर इंडिया का वो अंतिम सीन आँखों के सामने आता है, दिल उसी तरह भर आता है। यही इस टाइमलाइन की असली जीत है – इसने कहानी को अमर कर दिया।

FAQs: अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1. भारत की पहली फिल्म कौन सी थी और वो कब रिलीज़ हुई?
भारत की पहली फुल-लेंथ फीचर फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ थी, जो 3 मई 1913 को रिलीज़ हुई। इसका निर्देशन दादा साहेब फाल्के ने किया था। हालाँकि इससे पहले भी कुछ शॉर्ट फिल्में बनी थीं, पर ये पहली पूर्णकालिक भारतीय कहानी आधारित फिल्म थी।

2. ‘आलम आरा’ को भारतीय सिनेमा में क्रांति क्यों कहा जाता है?
14 मार्च 1931 को रिलीज़ ‘आलम आरा’ भारत की पहली बोलती (Talkie) फिल्म थी। इसने मूक सिनेमा के दौर को खत्म कर दिया और संगीत-संवाद आधारित सिनेमा को जन्म दिया। इसके बाद ही फिल्मों में गीत और डायलॉग एक अनिवार्य हिस्सा बन गए।

3. 1950 के दशक को हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग क्यों कहा जाता है?
इस दशक में एक साथ कई महान फिल्मकारों (राज कपूर, गुरु दत्त, बिमल रॉय, महबूब खान) ने कालजयी फिल्में बनाईं। कहानी, संगीत और अदाकारी का स्तर बेहद ऊँचा था। ‘आवारा’, ‘प्यासा’, ‘मदर इंडिया’, ‘दो बीघा ज़मीन’ जैसी विश्व स्तरीय फिल्में इसी काल में बनीं।

4. क्या 1960 के दशक में सिनेमा का स्टार कल्चर बदल गया था?
बिलकुल। पहले स्टूडियो एक्टर्स पर हावी थे, लेकिन 1960 के दशक में सुपरस्टार सिस्टम उभरा। शम्मी कपूर ने रोमांटिक और ऊर्जावान हीरो की नई परिभाषा गढ़ी और 1969 में राजेश खन्ना के आते ही सिनेमा में पूर्णतः स्टारडम का बोलबाला हो गया।

5. 1913 से 1970 तक के इस सफर का सबसे बड़ा योगदान क्या है?
इस सफर ने हिंदी सिनेमा को मनोरंजन के साथ सामाजिक बदलाव का औज़ार बना दिया। इसने हमें सिर्फ गाने या ड्रामा नहीं दिए, बल्कि भारतीय समाज, उसके दर्द और उसकी सोच को परदे पर उकेरने का साहस भी दिया। इसी विरासत पर आज का सिनेमा खड़ा है।

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