दादा साहब फाल्के की ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913): भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म बनाने का वह रोमांचक संघर्ष

Movie Nurture:दादा साहब फाल्के की 'राजा हरिश्चंद्र' (1913): भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म बनाने का वह रोमांचक संघर्ष

साल 1911 था। मुंबई के एक सिनेमाघर में अँधेरा छाया हुआ था। पर्दे पर एक विदेशी फिल्म चल रही थी – ‘दी लाइफ ऑफ क्राइस्ट’। दर्शकों में एक 42 वर्षीय भारतीय व्यक्ति भी बैठा था, जिसके चेहरे पर उत्साह नहीं, एक गहरी व्यथा थी। उसका नाम था धुंडीराज गोविंद फाल्के, जिन्हें दुनिया आगे चलकर दादा साहब फाल्के के नाम से जानेगी। जीसस के जीवन की उस कहानी को देखते हुए उनके मन में एक तूफान उठ खड़ा हुआ। एक सवाल ने उन्हें बेचैन कर दिया – “जब वे ईसा मसीह की कहानी दिखा सकते हैं, तो मैं भगवान श्रीराम, भगवान कृष्ण, हमारे देवी-देवताओं और हमारे पौराणिक नायकों की महान गाथाएँ क्यों नहीं दिखा सकता?”

यह वह पल था, वह ज्वलंत प्रश्न था, जिसने एक नए युग की नींव रख दी। एक ऐसा युग जिसने भारत की सांस्कृतिक आत्मा को चलचित्र के माध्यम से अभिव्यक्त करने का मार्ग प्रशस्त किया। इसी प्रश्न ने भारतीय सिनेमा के जनक को जन्म दिया और इसी जुनून ने 21 अप्रैल, 1913 को ‘राजा हरिश्चंद्र’ को जन्म दिया – भारत की पहली पूर्णकालिक फिल्म।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह फिल्म महज एक ‘पहली फिल्म’ होने का दर्जा पाने वाली कोई साधारण घटना नहीं थी? यह एक असंभव को संभव करने की कहानी थी। एक ऐसा सफर जो एक सपने से शुरू हुआ, जिसमें आर्थिक तंगी, तकनीकी अज्ञानता, सामाजिक संदेह और अथक परिश्रम के पहाड़ थे, और जिसका अंत एक ऐतिहासिक विजय में हुआ। आइए, आज उसी रोमांचक संघर्ष की पग-पग की यात्रा करते हैं।

Movie Nurture: दादा साहब फाल्के की 'राजा हरिश्चंद्र' (1913): भारत की पहली फ़ीचर फ़िल्म बनाने का वह रोमांचक संघर्ष

वह आदमी जिसने सपना देखा: फाल्के का शुरुआती सफर

दादा साहब फाल्के कोई फिल्मी पृष्ठभूमि से नहीं आए थे। वे एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। छोटी उम्र में ही माता-पिता का साया उठ जाने के बाद उन्होंने जीवन के कई पहलुओं को छुआ। वे एक फोटोग्राफर थे, एक मार्गदर्शक (ड्राफ्ट्समैन) थे, एक मैजिक लैंटर्न शो चलाने वाले कलाकार थे, और मुद्रण (प्रिंटिंग) का काम भी जानते थे। हैरानी की बात यह है कि उनकी यही विविध पृष्ठ्भूमि आगे चलकर उनके लिए वरदान साबित हुई।

फिल्म देखने के बाद उनका मन बैचेन हो उठा। लेकिन फिल्म बनाना तो दूर, उस समय भारत में फिल्म बनाने के बारे में कोई जानकारी ही नहीं थी। कोई उपकरण नहीं, कोई तकनीक नहीं, कोई मार्गदर्शन करने वाला कोई नहीं। ऐसे में एक आम इंसान शायद इस सपने को एक ‘सपना’ ही बनाकर छोड़ देता। लेकिन फाल्के ‘आम’ नहीं थे। उन्होंने एक दृढ़ निश्चय किया – विदेश जाकर फिल्म बनाने की कला सीखनी होगी।

और इस तरह शुरू हुआ उनका ज्ञान की खोज का सफर। उन्होंने अपनी पत्नी सरस्वती बाई से अपना बड़ा निर्णय साझा किया। एक पति और पिता होने के नाते यह जोखिम भरा कदम था, लेकिन सरस्वती बाई ने न केवल उनका साथ दिया, बल्कि अपने गहने तक बेचकर उनकी इस यात्रा में सहयोग किया। यहाँ से ही फाल्के के संघर्ष में उनकी पत्नी की अमिट भूमिका की शुरुआत होती है।

लंदन की वह ऐतिहासिक यात्रा: जहाँ सपना हकीकत की राह पर चला

1912 में, फाल्के अपने सीमित संसाधनों के बल पर लंदन के लिए रवाना हुए। उनका लक्ष्य स्पष्ट था – सिनेमेटोग्राफी की बारीकियाँ सीखना। लंदन पहुँचकर उन्होंने ‘साइलेंट फिल्म्स’ के प्रसिद्ध निर्माता सेसिल हेपवर्थ की प्रोडक्शन कंपनी से संपर्क किया। कहानी सुनकर हेपवर्थ भी शायद हैरान रह गए होंगे कि एक भारतीय, बिना किसी पृष्ठभूमि के, इतनी दूर से फिल्म सीखने आया है।

इस यात्रा में फाल्के ने कैमरा, फिल्म स्टॉक, प्रोसेसिंग की जानकारी – सब कुछ सीखा और खरीदा। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने यह विश्वास हासिल किया कि यह काम किया जा सकता है। वे एक बुनियादी फिल्म निर्माण किट और खजाने भर का ज्ञान लेकर भारत लौटे। अब चुनौती थी इस ज्ञान को अमलीजामा पहनाने की।

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पहला और सबसे बड़ा युद्ध: पूंजी का जुगाड़

उपकरण तो आ गए, लेकिन फिल्म बनाने के लिए पैसा चाहिए था। उस जमाने में ‘फिल्म निर्माण’ नाम की कोई चीज भारत में थी ही नहीं, तो निवेशक ढूँढना आसमान से तारे तोड़ने जैसा था। फाल्के ने अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, जान-पहचान के व्यापारियों के चक्कर लगाए। जवाब अक्सर नकारात्मक ही मिलता। लोग उनके इस ‘सपने’ को मूर्खतापूर्ण खर्च समझते थे।

तब फाल्के ने एक चतुर रणनीति अपनाई। उन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया। उन्होंने कुछ छोटे-छोटे प्रायोगिक शॉट्स लिए, जिनमें एक तितली का जीवनचक्र दिखाया गया था। इन्हें उन्होंने एक छोटे से शो के रूप में कुछ संभावित निवेशकों को दिखाया। यह भारत में फिल्माई गई पहली छवियाँ थीं। इस शो का असर जादुई रहा। लोगों ने देखा कि यह सपना नहीं, एक व्यवहारिक संभावना है।

आखिरकार, उन्हें पाँच निवेशक मिले, जिनमें एक युसूफ एस. मेहरअली प्रमुख थे। साथ में फाल्के ने अपनी पत्नी के गहने और अपनी जमा पूँजी भी लगाई। इस तरह फाल्के फिल्म कंपनी की स्थापना हुई। पूँजी जुटाने का यह संघर्ष ही उनकी पहली बड़ी जीत थी।

राजा हरिश्चंद्र का चयन: एक सटीक रणनीतिक फैसला

फिल्म के लिए कहानी चुनना सबसे महत्वपूर्ण कदम था। फाल्के को लगता था कि भारतीय दर्शकों के दिल तक पहुँचने के लिए कहानी उनकी सांस्कृतिक चेतना से जुड़ी होनी चाहिए। उन्होंने राजा हरिश्च्चंद्र की कथा को चुना। यह एक बेहद चतुराई भरा फैसला था।

राजा हरिश्चंद्र सत्य के लिए अपना सब कुछ त्याग देने वाले आदर्श राजा थे। यह कहानी सत्यनिष्ठा, बलिदान, और धर्म के प्रति अटल निष्ठा की प्रतीक थी। फाल्के जानते थे कि यह चरित्र हर भारतीय के मन में सम्मान की जगह रखता है। साथ ही, कहानी में नाटकीय तत्व भी भरपूर थे – राज्य का त्याग, पत्नी और पुत्र का बिकना, श्मशान में नौकरी, देवताओं की परीक्षा – सब कुछ एक दृश्यात्मक और भावनात्मक फिल्म के लिए उपयुक्त था। इस तरह उन्होंने मनोरंजन के साथ-साथ सांस्कृतिक पहचान को भी सिनेमा से जोड़ा।

कलाकारों की तलाश: औरत का रोल करता एक मर्द

आज की तरह उस जमाने में अभिनेता या अभिनेत्री नहीं होते थे। थिएटर के कलाकार थे, लेकिन फिल्म के लिए काम करना उन्हें अजीब लगता था। सबसे बड़ी चुनौती थी महिला पात्रों के लिए अभिनेत्री ढूँढना। उस जमाने में ‘अच्छे घरों की औरतें’ स्क्रीन पर आने को तैयार नहीं थीं। यह सामाजिक रूढ़ियों से लड़ाई थी।

फाल्के ने कई नाटक मंडलियों के दरवाजे खटखटाए। रानी तारामती की भूमिका के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। निराश होकर, फाल्के ने एक साहसिक और अप्रत्याशित निर्णय लिया। उन्होंने एक पुरुष कलाकार को यह भूमिका दे दी। अन्ना सालुंके नाम के एक रसोइए, जो नाटकों में काम करते थे, राजा हरिश्चंद्र के पुत्र ‘रोहिताश्व’ की भूमिका के लिए आए थे। फाल्के ने उनमें कुछ खास देखा और उन्हें ही रानी तारामती की भूमिका दे दी!

यह फैसला कितना सही था, यह तो फिल्म रिलीज होने पर पता चला, लेकिन उस समय यह एक बड़ा जोखिम था। अन्ना सालुंके ने ही बाद में फाल्के की दूसरी फिल्म ‘भस्मासुर मोहिनी’ में मोहिनी का किरदार भी निभाया और भारत की पहली अभिनेत्री (हालाँकि पुरुष) बन गए।

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शूटिंग का संघर्ष: जब हर दिन एक नई चुनौती थी

फिल्म की शूटिंग मुख्य रूप से मुंबई के दादर इलाके में एक खुली जगह और एक शेड में हुई। आज के हाई-टेक सेटों की कल्पना करना बेमानी है। फाल्के खुद निर्देशक, कैमरामैन, लाइटिंग डिजाइनर, मेकअप आर्टिस्ट और प्रोडक्शन डिजाइनर सब कुछ थे।

  • प्रकाश (लाइटिंग): उस जमाने में बिजली की कमी थी। पूरी फिल्म प्राकृतिक sunlight में शूट हुई। फाल्के ने बड़े-बड़े सफेद कपड़ों और चादरों से रिफ्लेक्टर बनाए, ताकि सूरज की रोशनी को नियंत्रित किया जा सके। बादल छा जाना या दिन ढल जाना पूरे शेड्यूल को बिगाड़ देता था।

  • मेकअप और कॉस्ट्यूम: मेकअप के लिए कोई तैयार उत्पाद नहीं थे। फाल्के ने खुद ही रासायनिक प्रयोग करके मेकअप तैयार किया। दाढ़ी-मूंछ के लिए ऊन और बालों का इस्तेमाल होता था। कपड़े थिएटर से लिए गए थे, जो अक्सर भारी और असहज होते थे।

  • निर्देशन: चूँकि फिल्म मूक थी, इसलिए हावभाव और चेहरे के भाव सब कुछ थे। फाल्के कलाकारों को हर एक्शन, हर रिएक्शन बारीकी से समझाते। वे खुद उनके सामने अभिनय करके दिखाते थे कि कैसे करना है।

इन सबके बीच सबसे बड़ी चुनौती थी फिल्म स्टॉक की कमी। फिल्म रील बहुत महँगी थी और विदेश से मंगानी पड़ती थी। इसलिए री-टेक का कोई सवाल ही नहीं था। हर शॉट पहले प्रयास में परफेक्ट होना जरूरी था। यह फाल्के और उनके कलाकारों की अद्भुत तैयारी और अनुशासन का ही नतीजा था कि वे इस चुनौती में सफल रहे।

पोस्ट-प्रोडक्शन: अँधेरे कमरे में जादू

शूटिंग पूरी हुई, तो अगला पड़ाव था फिल्म का विकास (डेवलप) और संपादन (एडिट)। यह काम भी फाल्के ने खुद ही संभाला। उन्होंने अपने घर में ही एक डार्क रूम बनाया। रात-रात भर वे इसी अँधेरे कमरे में रसायनों के बीच रहते, फिल्म को डेवलप करते। उस जमाने में एडिटिंग का मतलब था फिल्म की रीलों को कैंची से काटकर जोड़ना। एक गलत कट का मतलब था महँगे फुटेज का बर्बाद हो जाना।

इस पूरी प्रक्रिया में फाल्के की विभिन्न कलाओं में महारत काम आई। फोटोग्राफी का ज्ञान, प्रिंटिंग की समझ, और रसायनों से खेलने का उनका अनुभव – सब कुछ। यह चरण शारीरिक रूप से थकाने वाला और मानसिक रूप से कठिन था, क्योंकि फिल्म का अंतिम रूप इन्हीं हाथों में तैयार हो रहा था।

वह ऐतिहासिक क्षण: 21 अप्रैल, 1913

आखिरकार वह दिन आ ही गया। 21 अप्रैल, 1913। ‘राजा हरिश्चंद्र’ को मुंबई के कोरोनेशन सिनेमाघर में पहली बार दर्शकों के सामने पेश किया गया। फिल्म 40 मिनट लंबी थी (कुछ स्रोतों के अनुसार इससे अधिक), और इसमें लगभग 3,700 फ़ीट की रील लगी थी।

उस दिन का दृश्य कैसा रहा होगा? दर्शक, जिन्होंने पहली बार खुद अपनी भाषा, अपनी वेशभूषा, अपनी कहानी पर्दे पर देखी होगी, उनकी प्रतिक्रिया कैसी रही होगी? इतिहास बताता है कि फिल्म जबर्दस्त सफल रही। दर्शक हैरान और मंत्रमुग्ध थे। उनके लिए यह एक चमत्कार से कम नहीं था। पर्दे पर राजा हरिश्चंद्र की पीड़ा और सत्यनिष्ठा ने सीधे उनके दिलों को छू लिया।

फिल्म की सफलता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसने अपनी लागत से कई गुना अधिक कमाई की। इस सफलता ने न केवल फाल्के को वित्तीय रूप से मजबूत किया, बल्कि पूरे भारत में यह संदेश दे दिया कि यह एक व्यवसायिक रूप से व्यवहार्य कला है

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एक विरासत का निर्माण: फाल्के के बाद का सफर

‘राजा हरिश्चंद्र’ की सफलता ने फाल्के के लिए रास्ता साफ कर दिया। उन्होंने आगे चलकर ‘मोहिनी भस्मासुर’ (1913), ‘सत्यवान सावित्री’ (1914), ‘लंका दहन’ (1917) और ‘श्री कृष्ण जन्म’ (1918) जैसी कई अन्य पौराणिक और ऐतिहासिक फिल्में बनाईं। उन्होंने हिंदू पौराणिक कथाओं को सिनेमा की मुख्य धारा बना दिया, जो आगे चलकर दशकों तक भारतीय सिनेमा का प्रमुख विषय बनी रही।

लेकिन सबसे बड़ी विरासत यह थी कि उन्होंने एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित किया। उनके काम को देखकर दूसरे उद्यमियों ने भी फिल्म निर्माण में हाथ आजमाया। इस तरह मुंबई, कोलकाता और मद्रास में फिल्म उद्योग के बीज पड़े। दादा साहब फाल्के ने न सिर्फ एक फिल्म बनाई, बल्कि एक उद्योग की नींव रखी, एक नई कला-भाषा का आविष्कार किया, और भारतीय अस्मिता को सिनेमा के माध्यम से अभिव्यक्त करने का मार्ग दिखाया

निष्कर्ष: सिर्फ एक फिल्म नहीं, एक जन्मकथा थी ‘राजा हरिश्चंद्र’

आज जब हम रुके हुए फ्रेमों, बिना आवाज के डायलॉग कार्ड और साधारण सेटों वाली ‘राजा हरिश्चंद्र’ के अंश देखते हैं, तो शायद हमें वह तकनीकी चमक-दमक न दिखे। लेकिन अगर हम गहराई से देखें, तो हमें उस जुनून, दृढ़ संकल्प और सृजनात्मकता का अद्भुत दर्शन होगा, जो हर फ्रेम में समाया हुआ है।

यह फिल्म एक सांस्कृतिक स्वाधीनता का घोषणापत्र थी। यह एक ऐसा साहसिक कदम था, जिसने कहा कि हम अपनी कहानियाँ खुद सुनाना जानते हैं। फाल्के का संघर्ष केवल एक फिल्म बनाने का संघर्ष नहीं था; यह अज्ञान के अंधकार में ज्ञान का दीप जलाने का संघर्ष था। यह सामाजिक बंदिशों को तोड़कर नई राह बनाने का संघर्ष था। और यह आत्मविश्वास के साथ अपनी पहचान को विश्व पटल पर स्थापित करने का संघर्ष था।

‘राजा हरिश्चंद्र’ सिर्फ भारत की पहली फिल्म नहीं है। यह भारतीय सिनेमा की जन्मकुंडली है, जिसका पहला अक्षर फाल्के ने लिखा था। और आज का समृद्ध, विविधतापूर्ण, विश्वविख्यात भारतीय सिनेमा उसी एक अक्षर से शुरू हुई एक महाकाव्य कथा है। दादा साहब फाल्के ने साबित कर दिया कि सच्चा जुनून और अथक परिश्रम, संसाधनों की कमी को भी मात दे सकता है – और यही सबक उनकी इस अमर यात्रा से हम सबके लिए सबसे बड़ी विरासत है।

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