बंगाली सिनेमा कैसे बना? वो अनकही दास्तान जो इतिहास की किताबों में नहीं है

1890 के दशक के कलकत्ता में हाथ से चलने वाले फ़िल्म कैमरे के साथ खड़े हीरालाल सेन की शैली में एक बंगाली फ़िल्मकार और दाईं तरफ 1950 के दशक में ग्रामीण बंगाल के सरसों के खेत में शूटिंग करते सत्यजीत रे की शैली में एक युवा निर्देशक — बंगाली सिनेमा के 130 साल के सफ़र को दर्शाता एक विभाजित ऐतिहासिक चित्र

कलकत्ता। 1890 का दशक।

शहर में उस वक़्त दो चीज़ें एक साथ चल रही थीं — अंग्रेज़ों की हुकूमत और बंगाल के पढ़े-लिखे तबके में एक अजीब-सी बेचैनी। एक ऐसी बेचैनी जो सिर्फ आज़ादी के लिए नहीं थी। जो अपनी भाषा, अपनी कहानियों, अपने चेहरों को किसी माध्यम में देखने के लिए भी थी।

उसी बेचैनी से, उसी शहर की एक तंग गली में, बंगाली सिनेमा का बीज पड़ा।

यह कहानी सत्यजीत रे से शुरू नहीं होती। वो तो बहुत बाद की बात है। यह कहानी शुरू होती है एक ऐसे आदमी से जिसका नाम आज ज़्यादातर लोगों को याद भी नहीं है — हीरालाल सेन।

वो आदमी जिसे इतिहास ने भुला दिया

हीरालाल सेन एक फोटोग्राफर थे। मानिकगंज के रहने वाले — जो अब बांग्लादेश में हैं। 1898 में जब लुमिएर ब्रदर्स के प्रतिनिधि भारत आए और कलकत्ता में पहली बार चलती-फिरती तस्वीरें दिखाईं, तो वहाँ बैठे लोगों में से एक हीरालाल भी थे।

1898 के कलकत्ता में एक ऐतिहासिक फोटोग्राफी स्टूडियो में हाथ से चलने वाले लकड़ी के फ़िल्म कैमरे को पीतल के तिपाई पर सेट करते हुए हीरालाल सेन की शैली में एक बंगाली फ़िल्मकार — बंगाली सिनेमा के पहले अग्रदूत को दर्शाती एक ऐतिहासिक पुनर्रचना

उस शाम उन्होंने जो देखा, वो उन्हें हिला गया।

अगले कुछ महीनों में उन्होंने किसी तरह एक कैमरा जुटाया — उस ज़माने में यह काम आज की कल्पना से कहीं ज़्यादा मुश्किल था। और 1899 में उन्होंने वो काम कर दिया जिसका ज़िक्र आज बहुत कम होता है — उन्होंने कलकत्ता के क्लासिक थिएटर के नाटकों के दृश्यों को फ़िल्माया। ये छोटी-छोटी क्लिप्स थीं, लेकिन ये बंगाल की अपनी कहानियाँ थीं, बंगाल के अपने चेहरे थे।

उनकी इन फ़िल्मों को उन्होंने “Royal Bioscope Company” के बैनर तले दिखाना शुरू किया। थिएटर हॉल में। जहाँ पहले सिर्फ नाटक होते थे, अब परदे पर तस्वीरें चलती थीं।

लेकिन 1917 में एक आग लगी। हीरालाल के घर में। उस आग ने उनके बनाए लगभग सभी फ़िल्म रील जलाकर राख कर दिए। जो आदमी बंगाली सिनेमा का असली पहला नाम था — उसका काम खाक हो गया। और वो खुद 1917 में ही इस दुनिया से चले गए।

इतिहास ने उन्हें वो जगह नहीं दी जिसके वो हक़दार थे।

थिएटर और सिनेमा — एक अजीब रिश्ता

यह समझना ज़रूरी है कि बंगाली सिनेमा का जन्म एकाकी नहीं हुआ। वो बंगाल की थिएटर परंपरा की कोख से निकला।

उन्नीसवीं सदी के आखिर में बंगाल में थिएटर का जो माहौल था, वो किसी और प्रांत में नहीं था। “बंगाली थिएटर” सिर्फ मनोरंजन नहीं था — वो समाज सुधार का हथियार था। माइकल मधुसूदन दत्त, गिरिशचंद्र घोष, दीनबंधु मित्र — इन लोगों ने थिएटर के ज़रिए जो कहा, वो अखबार नहीं कह सकते थे।

जब सिनेमा आया, तो बंगाल के दर्शकों के लिए यह एकदम अजनबी नहीं था। वो कहानियाँ देखने के आदी थे। वो भावनाओं पर बात करने के आदी थे। इसीलिए बंगाली दर्शक सिनेमा के साथ उतनी जल्दी जुड़ गए जितनी जल्दी शायद कहीं और नहीं हुआ।

और जो कलाकार थिएटर पर थे — वो धीरे-धीरे कैमरे के सामने आने लगे।

1919 — वो साल जो असली मोड़ था

हीरालाल के बाद एक लंबी चुप्पी रही। कलकत्ता में विदेशी फ़िल्में दिखाई जाती थीं, लोग देखते थे, लेकिन बंगाल की अपनी पूरी लंबाई की फ़िल्म — एक “feature film” — अभी तक नहीं बनी थी।

वो मोड़ आया 1919 में।

धीरेन्द्रनाथ गांगुली — जिन्हें लोग “डी.जी.” कहते थे — ने उस साल “बिल्वमंगल” नाम की फ़िल्म बनाई। यह पहली बंगाली feature film मानी जाती है।

डी.जी. खुद एक बेहद दिलचस्प इंसान थे। वो पेशे से फोटोग्राफर थे, शौक से थिएटर करते थे, और मन से एक कलाकार थे। उन्होंने “Indo British Film Co.” बनाई — यह नाम देखिए, अंग्रेज़ों के ज़माने में एक भारतीय फ़िल्म कंपनी खड़ी करना, और नाम में “Indo British” लगाना — यह एक तरह की चालाकी भी थी और एक तरह का गर्व भी।

“बिल्वमंगल” एक धार्मिक-पौराणिक कहानी थी। लेकिन जो बात इसे खास बनाती है, वो इसकी कहानी नहीं — वो यह थी कि यह बंगाल में, बंगाली लोगों के लिए, बंगाली ज़बान में बनी पहली पूरी फ़िल्म थी।

हॉल में जब वो चली, तो लोगों ने अपनी भाषा की कहानी परदे पर देखी। यह सिर्फ मनोरंजन नहीं था — यह पहचान थी।

1930 के दशक में टॉलीगंज कलकत्ता के न्यू थिएटर्स स्टूडियो के अंदर एक भव्य फ़िल्म सेट पर काम करता दल — निर्देशक, ध्वनि रिकॉर्डिस्ट और बंगाली पोशाक में कलाकार — बंगाली सिनेमा के स्वर्णिम युग को दर्शाता एक ऐतिहासिक दृश्य

मूक फ़िल्मों का वो ज़माना — जब भाव बोलते थे

1919 से 1931 तक का दौर बंगाली सिनेमा का “मूक युग” था। कोई आवाज़ नहीं, कोई संवाद नहीं — सिर्फ चेहरे, सिर्फ हाव-भाव, सिर्फ संगीत जो सिनेमा हॉल में लाइव बजता था।

और इस दौर में कुछ ऐसी फ़िल्में बनीं जो आज भी काबिले-गौर हैं।

मदन थिएटर्स — जो कलकत्ता की सबसे बड़ी फ़िल्म कंपनियों में से एक बनी — ने इस दौर में दर्जनों मूक फ़िल्में बनाईं। जे.एफ. मदन, जो एक पारसी व्यापारी थे, ने बंगाल में ही अपनी जड़ें जमाईं और बंगाली सिनेमा के शुरुआती ढाँचे को खड़ा करने में बड़ा हाथ बटाया।

मूक फ़िल्मों का एक अपना जादू था। क्योंकि भाषा की दीवार नहीं थी, इसलिए बंगाली फ़िल्में उन दर्शकों तक भी पहुँचती थीं जो बंगाली नहीं जानते थे। एक तरह से यह बंगाली सिनेमा का सबसे “universal” दौर था।

लेकिन यह दौर खत्म होने वाला था।

1931 — जब सिनेमा ने बोलना सीखा

1931 में हिंदी सिनेमा की पहली बोलती फ़िल्म “आलम आरा” आई। लेकिन उसी साल बंगाली सिनेमा ने भी अपनी पहली बोलती फ़िल्म दुनिया को दी।

“जामाई षष्ठी” — निर्देशक अरुण चौधरी।

यह फ़िल्म एक हल्की-फुल्की पारिवारिक कॉमेडी थी। लेकिन जब परदे पर पहली बार बंगाली संवाद गूँजे — जब दर्शकों ने अपनी भाषा को, अपने लहजे को, अपने मुहावरों को परदे पर सुना — तो हॉल में जो हुआ वो किसी त्योहार से कम नहीं था।

यह महज़ एक तकनीकी बदलाव नहीं था। यह बंगाली सिनेमा की असली आत्मा का प्रकट होना था।

उसके बाद के दस साल बंगाली सिनेमा के लिए बेहद उपजाऊ रहे। एक के बाद एक स्टूडियो खुले। न्यू थिएटर्स — जो शायद उस दौर का सबसे प्रतिष्ठित बंगाली फ़िल्म स्टूडियो था — ने कुंदनलाल सहगल, पहाड़ी सान्याल, और उमाशashi जैसे कलाकारों को दुनिया से मिलवाया।

न्यू थिएटर्स — वो कारखाने जहाँ सपने बनते थे

बी.एन. सरकार ने 1931 में न्यू थिएटर्स की स्थापना की। टालीगंज में। वो इलाका जो आगे चलकर “टॉलीवुड” कहलाया।

न्यू थिएटर्स कोई साधारण स्टूडियो नहीं था। यह एक पूरी दुनिया थी।

वहाँ संगीतकार थे, कवि थे, तकनीशियन थे, निर्देशक थे — सब एक जगह, एक छत के नीचे। पंकज मल्लिक ने वहाँ संगीत को एक नई ऊँचाई दी। देबकी बोस ने निर्देशन को एक नई गहराई दी। और के.एल. सहगल — जो मूलतः पंजाब से थे — बंगाल में आकर इतने रच-बस गए कि उनकी आवाज़ बंगाली सिनेमा की पहचान बन गई।

न्यू थिएटर्स ने एक और काम किया जो बहुत कम लोग जानते हैं।

उस दौर में हिंदी और बंगाली फ़िल्में एक साथ बनती थीं — एक ही कहानी, एक ही सेट, लेकिन दो भाषाओं में। सुबह बंगाली टीम शूट करती है, शाम को हिंदी टीम। इस तरह न्यू थिएटर्स ने बंगाली और हिंदी सिनेमा के बीच एक अदृश्य पुल बनाया जिसका असर दशकों तक रहा।

1953 के ग्रामीण बंगाल में सफ़ेद काश के फूलों के बीच दौड़ते दो बच्चों की शूटिंग करते सत्यजीत रे की शैली में एक युवा निर्देशक — पथेर पांचाली की शूटिंग के दौरान का एक काल्पनिक ऐतिहासिक दृश्य जो बंगाली सिनेमा के सबसे महान क्षण को दर्शाता है

विभाजन का ज़ख्म — और सिनेमा जो बचा रहा

1947 आया। देश आज़ाद हुआ। लेकिन बंगाल टूट गया।

विभाजन ने बंगाली सिनेमा को भी तोड़ा। ढाका में जो फ़िल्में बन रही थीं, वो एक अलग देश की हो गईं। कलकत्ता में जो कलाकार थे, उनमें से कई पूर्वी बंगाल से आए शरणार्थी थे जिन्होंने अपना सब कुछ छोड़ दिया था।

इस दर्द ने बंगाली सिनेमा को एक नई संवेदनशीलता दी।

ऋत्विक घटक — जो खुद पूर्वी बंगाल से आए थे — ने विभाजन के इस घाव को अपनी फ़िल्मों का केंद्र बनाया। “मेघे ढाका तारा” (1960), “कोमल गंधार” (1961), “सुवर्णरेखा” (1962) — यह फ़िल्में सिर्फ कहानियाँ नहीं थीं। यह एक पूरी पीढ़ी का रुदन था जिसे परदे पर उतारा गया था।

घटक को उनके जीते-जी वो पहचान नहीं मिली जिसके वो हक़दार थे। उनकी फ़िल्में बहुत कम लोगों तक पहुँचीं। लेकिन आज जब दुनिया के बड़े-बड़े फ़िल्म स्कूलों में उनकी फ़िल्में पढ़ाई जाती हैं, तो लगता है — वो अपने वक़्त से बहुत आगे थे।

सत्यजीत रे — वो नाम जिसने दुनिया को झुका दिया

1955

“पथेर पांचाली” रिलीज़ हुई।

सत्यजीत रे एक विज्ञापन कंपनी में काम करते थे। फ़िल्म बनाने का कोई औपचारिक प्रशिक्षण नहीं था। पैसे नहीं थे। शूटिंग रुकती थी, फिर शुरू होती थी। पश्चिम बंगाल सरकार ने आखिरकार थोड़ी मदद की — लेकिन वो भी बिचबिच में।

और जो बनी वो फ़िल्म — जो एक गरीब ब्राह्मण परिवार के बच्चे अपू की कहानी थी — वो 1956 में कान फ़िल्म फेस्टिवल में गई और “Best Human Document” का पुरस्कार जीतकर लौटी।

भारतीय सिनेमा ने पहली बार दुनिया के सबसे बड़े फ़िल्म महोत्सव में अपना परचम लहराया था।

और यह बंगाली सिनेमा था।

रे ने अगले तीन दशकों में जो फ़िल्में बनाईं — “अपराजिता”, “अपूर संसार”, “जलसाघर”, “देवी”, “चारुलता”, “घरे बाइरे” — हर एक एक अलग दुनिया थी। हर एक में बंगाल था — उसका साहित्य, उसका संगीत, उसकी राजनीति, उसके आम इंसान।

1992 में जब ऑस्कर ने उन्हें “Lifetime Achievement Award” दिया, तो रे अस्पताल में थे। बीमार। लेकिन उनकी आँखों में जो चमक थी — वो किसी पुरस्कार की मोहताज नहीं थी।

मृणाल सेन — वो तीसरा स्तंभ

बंगाली सिनेमा की इस त्रिमूर्ति में तीसरा नाम है मृणाल सेन का।

जहाँ रे ने मानवीय संवेदना को केंद्र में रखा और घटक ने विस्थापन के दर्द को — वहाँ सेन ने राजनीति को अपना हथियार बनाया। उनकी फ़िल्में असहज करती थीं। “भुवन शोम” (1969) ने हिंदी आर्ट सिनेमा को एक नई दिशा दी। “एक दिन प्रतिदिन” (1979) ने मध्यवर्गीय पाखंड को इतनी बेरहमी से उघाड़ा कि दर्शक असहज हो गए।

और यही बंगाली सिनेमा की पहचान थी — वो असहज करने से नहीं डरता था।

1947 के विभाजन के बाद कलकत्ता के एक फ़िल्म स्टूडियो की दीवार के बाहर खड़े बंगाली फ़िल्म कलाकार और क्रू सदस्य — एक बुज़ुर्ग व्यक्ति अपनी छाती से फ़िल्म रील को थामे हुए — बंगाली सिनेमा पर विभाजन के गहरे दर्द को दर्शाता एक भावनात्मक ऐतिहासिक दृश्य

वो बातें जो किताबों में नहीं मिलतीं

बंगाली सिनेमा के इतिहास में कुछ बातें ऐसी हैं जो अक्सर छूट जाती हैं।

पहली — यह कि बंगाली सिनेमा में महिलाओं की भूमिका बहुत पहले से बड़ी थी। उस दौर में जब हिंदी फ़िल्मों में महिला किरदार बहुत सीमित थे, बंगाली फ़िल्मों में सुचित्रा सेन जैसी अभिनेत्रियाँ ऐसे किरदार निभा रही थीं जो अपने फ़ैसले खुद लेते थे।

दूसरी — बंगाली सिनेमा और साहित्य का रिश्ता हमेशा बहुत गहरा रहा है। रवींद्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र, विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय — इन लेखकों की कहानियाँ बार-बार परदे पर आईं। साहित्य ने सिनेमा को गहराई दी, और सिनेमा ने साहित्य को नई ज़िंदगी दी।

तीसरी — बंगाली सिनेमा का संगीत। सलिल चौधरी, हेमंत मुखर्जी, पंकज मल्लिक — इन संगीतकारों ने जो धुनें रचीं, वो हिंदी सिनेमा तक पहुँचीं और वहाँ भी अमर हो गईं।

आखिर में — एक सवाल

बंगाली सिनेमा का यह सफ़र एक तंग गली से शुरू हुआ था। हीरालाल सेन के एक कैमरे से। एक ऐसे आदमी की ज़िद से जो मानता था कि बंगाल की कहानियाँ, बंगाल के चेहरे — परदे पर आने के हक़दार हैं।

आज जब हम “टॉलीवुड” की बात करते हैं, जब हम सत्यजीत रे का नाम लेते हैं, जब हम “पथेर पांचाली” देखकर चुप हो जाते हैं — तो उस चुप्पी के पीछे 130 साल की एक पूरी दास्तान है।

वो दास्तान जो इतिहास की किताबों में पूरी नहीं लिखी गई।

आज आपने पढ़ा।


अगर इस लेख ने आपको कुछ सोचने पर मजबूर किया है— तो एक काम कीजिए। “पथेर पांचाली” देखिए। किसी भी एक शाम। फिर बताइए कि क्या महसूस हुआ।

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