कभी-कभी ऐसा होता है कि फिल्म ख़त्म हो जाती है, स्क्रीन पर नाम आने लगते हैं, और आप अपनी जगह से हिल नहीं पाते। कमरे में सन्नाटा होता है, गला भारी होता है, और मन में बस एक ही बात घूमती रहती है: काश यह थोड़ी देर और चलती।
ऐसी फिल्में रोज़ नहीं मिलतीं। हिंदी सिनेमा ने सौ साल से ज़्यादा के सफ़र में हज़ारों फिल्में बनाई हैं, पर उनमें से गिनी-चुनी ही हैं जो पर्दे से उतरकर लोगों की यादों, बातचीत और रोज़ की भाषा में बस गईं।
नीचे जिन दस फिल्मों की बात है, वे बॉक्स ऑफिस के आँकड़ों के हिसाब से नहीं चुनी गईं। कुछ ने ख़ूब कमाई की, कुछ को शुरू में ठंडा रिस्पॉन्स मिला। इन सबमें एक चीज़ मिलती-जुलती है: इन्हें देखने के बाद आप थोड़े बदल जाते हैं। हँसते हैं, सोचते हैं, और कई बार चुपके से आँख पोंछ लेते हैं।
एक बात पहले ही बता दूँ। सूची में नंबर 7 पर जो फिल्म है, उसके लिए टिश्यू का डिब्बा पास रख लीजिए। बाकी फिल्मों की कहानी मैं बिगाड़ूँगा नहीं, इसलिए बेफ़िक्र होकर पढ़िए।

1. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे (1995)
कुछ फिल्में सिर्फ़ प्रेम कहानी होती हैं, और कुछ पूरी एक पीढ़ी का एहसास बन जाती हैं। आदित्य चोपड़ा की पहली निर्देशित फिल्म दूसरी श्रेणी में आती है। शाहरुख़ ख़ान का राज और काजोल की सिमरन यूरोप की एक ट्रेन यात्रा में मिलते हैं, दोस्ती होती है, और फिर कहानी उस मोड़ पर पहुँचती है जहाँ एक पंजाबी पिता की परंपरा और बेटी की मोहब्बत आमने-सामने खड़ी हो जाती हैं।
इस फिल्म की ख़ूबसूरती इसके सब्र में है। राज भागकर शादी करने की बात नहीं करता। वह कहता है कि सिमरन के पिता का दिल जीतकर ही उसे ले जाएगा। नब्बे के दशक में, जब हर दूसरी प्रेम कहानी में भाग जाना ही हल लगता था, यह एक अलग तरह की हिम्मत थी।
कहा जाता है कि मुंबई के मराठा मंदिर थिएटर में यह फिल्म दो दशक से भी ज़्यादा समय तक चलती रही। ट्रेन वाला आख़िरी दृश्य और सरसों के खेतों की तस्वीर आज भी मीम से लेकर शादियों के वीडियो तक हर जगह मिल जाती है। अगर आपने अब तक नहीं देखी है, तो बस यह समझने के लिए देखिए कि लोग इसके इतने दीवाने क्यों रहे।

2. शोले (1975)
रमेश सिप्पी की यह फिल्म जब रिलीज़ हुई तो शुरुआती दिनों में दर्शकों और समीक्षकों की प्रतिक्रिया फीकी थी। फिर लोगों ने एक-दूसरे को इसके बारे में बताना शुरू किया, और देखते-देखते यह हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी फिल्मों में गिनी जाने लगी। कहा जाता है कि मुंबई के मिनर्वा थिएटर में यह पाँच साल से ज़्यादा चली।
कहानी सीधी है। एक रिटायर्ड पुलिस अफ़सर ठाकुर बलदेव सिंह डाकू गब्बर सिंह से बदला लेना चाहता है, और इसके लिए वह दो छोटे-मोटे अपराधियों, जय और वीरू, को बुलाता है। सलीम-जावेद की लिखी पटकथा में दोस्ती है, हँसी है, एक्शन है, और गब्बर जैसा खलनायक है जिसके बिना बाद के खलनायकों की कल्पना करना मुश्किल है। अमजद ख़ान ने उस किरदार को ऐसा गढ़ा कि लोग आज भी उसके संवाद दोहराते हैं।
धर्मेंद्र, अमिताभ बच्चन, संजीव कुमार, हेमा मालिनी और जया बच्चन, सबके हिस्से में कुछ न कुछ यादगार आया। पर असली बात यह है कि इतने बड़े सितारों के बीच भी फिल्म किसी एक की नहीं लगती, सबकी लगती है। शूटिंग का बड़ा हिस्सा कर्नाटक के रामनगर की चट्टानों के बीच हुआ, और वही जगह आज लोगों के ज़हन में रामगढ़ बनकर बसी है।

3. लगान (2001)
साल 1893। चंपानेर नाम का एक सूखा-मारा काल्पनिक गाँव। और एक अंग्रेज़ अफ़सर जो लगान दोगुना कर देता है। जब गाँव वाले राहत माँगते हैं तो अफ़सर एक अजीब शर्त रख देता है: अगर वे क्रिकेट के मैदान में अंग्रेज़ों को हरा दें, तो तीन साल तक लगान माफ़। भुवन, जिसे आमिर ख़ान ने निभाया है, यह चुनौती मान लेता है, जबकि गाँव में किसी ने ठीक से बल्ला पकड़ा तक नहीं।
आशुतोष गोवारीकर की यह फिल्म खेल से कहीं ज़्यादा उन लोगों की कहानी है जिनके पास खोने के लिए कुछ बचा ही नहीं। टीम में कचरा है, जिसे गाँव अछूत मानता है, और एक बोल न पाने वाला खिलाड़ी भी है। फिल्म बिना भाषण दिए दिखा देती है कि जब सबको एक ही लक्ष्य मिल जाए, तो भेदभाव की दीवारें दरकने लगती हैं।
लगभग पौने चार घंटे की इस फिल्म को 2002 में ऑस्कर के लिए सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म की श्रेणी में नामांकन मिला। जीत भले न मिली हो, पर नामांकन अपने आप में बड़ी बात थी। और मैच वाले हिस्से में आप कब कुर्सी के किनारे पर आ जाएँगे, पता ही नहीं चलेगा।

4. 3 इडियट्स (2009)
राजकुमार हिरानी की यह फिल्म, जो चेतन भगत के उपन्यास ‘फ़ाइव पॉइंट समवन’ से प्रेरित बताई जाती है, इंजीनियरिंग कॉलेज के तीन दोस्तों की कहानी है: रैंचो (आमिर ख़ान), फ़रहान (आर. माधवन) और राजू (शरमन जोशी)। रैंचो सबसे अलग है। वह रटने में यक़ीन नहीं रखता, सवाल पूछता है, और मानता है कि चीज़ें समझ में आ जाएँ तो नंबर अपने आप आ जाते हैं।
फिल्म हँसाती बहुत है, पर चोट बाद में लगती है। यह उस दबाव की बात करती है जो हमारे समाज में बच्चों पर डाला जाता है: डॉक्टर बनो या इंजीनियर, वरना… वरना क्या? फिल्म दिखाती है कि इस ‘वरना’ के पीछे कई बार किसी बच्चे की टूटन छिपी होती है। देखते हुए आप सोचने लगते हैं कि आपने अपने बच्चों से, या ख़ुद से, आख़िरी बार कब पूछा था कि असल में क्या बनना है।
लद्दाख की झील पर फ़िल्माया गया अंतिम हिस्सा बेहद ख़ूबसूरत है। और अगर आप माता-पिता हैं, तो इसे बच्चों के साथ बैठकर देखिए। कुछ बातें लेक्चर से नहीं, कहानी से समझ आती हैं।

5. स्वदेस (2004)
मोहन भार्गव अमेरिका में NASA का कामयाब वैज्ञानिक है। सब कुछ है उसके पास: पैसा, घर, पहचान। फिर भी वह भारत आता है, कावेरी अम्मा को लेने, जिन्होंने बचपन में उसे पाला था। उसे लगता है कि यह छोटी-सी यात्रा होगी।
लेकिन चरणपुर नाम का वह गाँव धीरे-धीरे उसे बदलने लगता है। बिजली की कमी, जात-पात का भेदभाव, लड़कियों की पढ़ाई पर रोक। मोहन देखता है, और पहली बार महसूस करता है कि सिर्फ़ विदेश में बैठकर कामयाब हो जाना काफ़ी नहीं।
आशुतोष गोवारीकर की इस फिल्म को रिलीज़ के वक़्त वह सफलता नहीं मिली जिसकी यह हक़दार थी। बाद के सालों में लोगों ने इसे अपनाया, और आज इसे शाहरुख़ ख़ान के सबसे संजीदा किरदारों में गिना जाता है। रेलवे स्टेशन पर पानी बेचते बच्चे वाला दृश्य ज़्यादातर लोगों के दिल में अटका रह जाता है। फिल्म कोई नारा नहीं देती। बस एक सवाल छोड़ जाती है: हम अपने गाँव और अपनी जड़ों को क्या लौटा रहे हैं?

6. मदर इंडिया (1957)
महबूब ख़ान की इस फिल्म की नायिका राधा है, एक गरीब किसान औरत, जिसे नरगिस ने निभाया। पति साथ छोड़ जाता है, साहूकार का क़र्ज़ सिर पर है, ज़मीन हाथ से निकल जाती है, और राधा अकेली अपने बेटों को पालती है। उसके पास कोई सहारा नहीं, सिवाय अपनी हिम्मत और अपने उसूलों के।
फिल्म को 1958 में ऑस्कर के लिए विदेशी भाषा फिल्म की श्रेणी में नामांकित किया गया था, और कहा जाता है कि पुरस्कार सिर्फ़ एक वोट से हाथ से निकल गया। इसका अंत मैं नहीं बताऊँगा। बस इतना कि वह इतना कठोर है कि दशकों बाद भी उस पर बात होती है। माँ और बेटे के रिश्ते पर इतना भारी सवाल हिंदी सिनेमा में कम ही उठा है।
एक दिलचस्प किस्सा सेट से भी जुड़ा है। शूटिंग के दौरान आग लग गई और सुनील दत्त ने नरगिस को बचाया। बाद में दोनों ने शादी कर ली। पर्दे के पीछे की यह कहानी भी किसी फिल्म से कम नहीं लगती।

7. आनंद (1971) — टिश्यू तैयार रखिए
हृषिकेश मुखर्जी की यह फिल्म कहानी के हिसाब से सबसे सादी है, और असर के हिसाब से शायद सबसे भारी।
आनंद सहगल (राजेश खन्ना) को ऐसा कैंसर है जो ठीक नहीं हो सकता। डॉक्टर कहते हैं कि उसके पास कुछ ही महीने बचे हैं, और आनंद यह जानता है। फिर भी वह हर किसी से ऐसे मिलता है जैसे बरसों पुराना दोस्त हो। अजनबियों से बातें करता है, बच्चों के साथ खेलता है, किसी को हँसाने का कोई मौक़ा नहीं छोड़ता। उसका इलाज करने वाले डॉक्टर भास्कर बनर्जी (अमिताभ बच्चन) गुस्सैल और उदास रहने वाले इंसान हैं। आनंद उन्हें ‘बाबू मोशाय’ कहकर बुलाता है, और उनकी ज़िंदगी में रंग भर देता है। डॉक्टर को पता भी नहीं चलता कि कब यह आदमी उनका सबसे क़रीबी दोस्त बन गया।
फिल्म का सबसे मशहूर विचार यह है कि ज़िंदगी लंबी नहीं, बड़ी होनी चाहिए। किताबों में लिखी यह बात सुनने में घिसी-पिटी लगती है, पर जब आप आनंद को इसे जीते हुए देखते हैं, तो यह सीधे अंदर उतर जाती है।
आख़िरी बीस मिनट के बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा। बस इतना कि वहाँ एक टेप रिकॉर्डर है, और एक आवाज़। जिन्होंने फिल्म देखी है, वे जानते हैं। जिन्होंने नहीं देखी, उनसे इतना कहना है कि इसे अकेले देखिए, आराम से, बिना किसी जल्दी के। रोना आए तो रो लीजिए। इस फिल्म को देखकर रोना कमज़ोरी नहीं है।
राजेश खन्ना को इस फिल्म के लिए फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार मिला और अमिताभ बच्चन को सहायक भूमिका का। फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी जीता।

8. तारे ज़मीन पर (2007)
आठ साल का ईशान अवस्थी स्कूल में पढ़ नहीं पाता। अक्षर उसकी आँखों के सामने नाचते हैं, पर टीचर और माता-पिता को लगता है कि वह शरारती है, आलसी है। उसे सज़ा मिलती है, डाँट मिलती है, और आख़िर में बोर्डिंग स्कूल भेज दिया जाता है। वहाँ उसे मिलते हैं आर्ट टीचर राम शंकर निकुंभ (आमिर ख़ान), जो पहली ही नज़र में भाँप लेते हैं कि ईशान को डिस्लेक्सिया है।
बतौर निर्देशक यह आमिर ख़ान की पहली फिल्म थी, और अमोल गुप्ते की कहानी ने इसे ऐसा दिल दिया कि बहुत से दर्शक थिएटर से निकले तो अपने बच्चों के बारे में कुछ अलग ढंग से सोच रहे थे। दर्शील सफ़ारी ने ईशान को इतनी सच्चाई से निभाया कि आप भूल जाते हैं कि वह अभिनय कर रहा है।
फिल्म उस सच को सामने रखती है जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं: हर बच्चा अलग तरह से सीखता है, और जिसे हम कमज़ोरी समझ लेते हैं, वह किसी और रूप में हुनर हो सकता है। ‘तारे ज़मीन पर’ को फ़िल्मफ़ेयर में सर्वश्रेष्ठ फिल्म चुना गया, और आमिर ख़ान को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार मिला।

9. दंगल (2016)
हरियाणा के बलाली गाँव में महावीर सिंह फोगाट (आमिर ख़ान) पूर्व पहलवान हैं। देश के लिए गोल्ड मेडल जीतना उनका सपना था, पर हालात ने मौक़ा नहीं दिया। बेटे की उम्मीद में उनके घर बेटियाँ होती हैं, और जब वे देखते हैं कि उनकी बेटियाँ लड़कों को अखाड़े में पटक सकती हैं, तो वे उन्हें पहलवान बनाने की ठान लेते हैं।
यह फिल्म असली पहलवान गीता और बबीता फोगाट की ज़िंदगी पर आधारित है। गाँव वाले ताने मारते हैं, रिश्तेदार हँसते हैं, और शुरू में लड़कियाँ ख़ुद भी पिता से नाराज़ रहती हैं। नितेश तिवारी ने इसे बिना ज़्यादा मेलोड्रामा के, सहजता से बनाया है। इसमें बाप-बेटी का रिश्ता कठोर है, कहीं-कहीं ज़्यादती भी लगती है, और शायद इसीलिए सच्चा लगता है।
गीता ने 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीता था, और फिल्म का सबसे भावुक हिस्सा वही है जहाँ यह सपना पूरा होता है। फातिमा सना शेख़ और सान्या मल्होत्रा ने कुश्ती सीखने में जो मेहनत की, वह पर्दे पर दिखती है। ‘दंगल’ भारत की सबसे ज़्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में गिनी जाती है। पर शायद इसकी बड़ी जीत यह है कि इसने कई घरों में बेटियों के बारे में होने वाली बातचीत को थोड़ा बदल दिया।

10. ब्लैक (2005)
मिशेल मैकनैली न देख सकती है, न सुन सकती है। उसके लिए दुनिया एक अँधेरे, ख़ामोश कमरे जैसी है, और वह उसमें गुस्से से चीखती-चिल्लाती रहती है। तब उसकी ज़िंदगी में आते हैं देबराज सहाय (अमिताभ बच्चन), एक सख़्त और सनकी शिक्षक, जो मानते हैं कि हर चीज़ का एक नाम होता है, और जब तक नाम नहीं मिलता, कुछ भी समझ नहीं आता।
संजय लीला भंसाली की इस फिल्म को हेलेन केलर की कहानी से प्रेरित कहा जाता है। रानी मुखर्जी ने बिना शब्दों के जो अभिनय किया, वह देखने लायक है। अमिताभ बच्चन को इस फिल्म के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, और फिल्म ने फ़िल्मफ़ेयर में सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी जीता।
इसका सबसे गहरा सबक यह है कि शिक्षक सिर्फ़ पढ़ाता नहीं, बल्कि किसी की पूरी दुनिया खोल देता है। और आख़िर में, जब कहानी में भूमिकाएँ उलट जाती हैं और शिष्या अपने गुरु का सहारा बनती है, तब समझ आता है कि यह फिल्म असल में कृतज्ञता के बारे में है।
अब आपकी बारी
दस फिल्में, दस अलग-अलग दुनिया। किसी में प्यार है, किसी में गुस्सा, किसी में गाँव की मिट्टी, तो किसी में एक कमरे का अँधेरा। पर सबके बीच एक धागा है: इंसान को इंसान की तरह देखना।
अगर आपने इनमें से कुछ ही देखी हैं, तो अपनी सुविधा के हिसाब से शुरू कीजिए। मूड हल्का हो तो ‘3 इडियट्स’, कुछ गहरा देखना हो तो ‘स्वदेस’, और जिस दिन मन हल्का करने की ज़रूरत लगे, उस दिन ‘आनंद’। ज़्यादातर फिल्में किसी न किसी OTT प्लेटफ़ॉर्म पर मिल जाती हैं, पर कौन-सी कहाँ है, यह समय-समय पर बदलता रहता है, इसलिए एक बार खोजकर देख लीजिए।
और हाँ, अगर किसी फिल्म को देखकर मन भारी हो जाए और वह भारीपन कई दिन तक न उतरे, तो किसी अपने से बात ज़रूर कीजिए। कहानियाँ हमें जोड़ती हैं, पर अकेले ढोने के लिए नहीं होतीं।
अब बताइए, इनमें से कितनी आपने देखी हैं? नंबर 7 के बारे में आपकी क्या राय है, और कौन-सी फिल्म आपकी सूची में होनी चाहिए थी?