Kinuyo Tanaka: वह जापानी अभिनेत्री जिसने पर्दे के पीछे भी रचा इतिहास

Movie Nurture:Kinuyo Tanaka: वह जापानी अभिनेत्री जिसने पर्दे के पीछे भी रचा इतिहास

जापानी सिनेमा की बात हो और केनजी मिज़ोगुची, यासुजिरो ओज़ू, अकीरा कुरोसावा जैसे दिग्गज निर्देशकों का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। लेकिन इन महान फिल्मकारों की कलात्मक सफलता के पीछे एक ऐसी ही महान अभिनेत्री का हाथ था, जिसने न सिर्फ़ अपने अभिनय से इनकी फिल्मों को जान डाली, बल्कि खुद एक निर्देशक के तौर पर भी उसने इतिहास रच डाला। नाम था – किनुयो तनाका 田中 絹代

1909 से 1977 के बीच का उनका सफर सिर्फ़ एक अभिनेत्री की कहानी नहीं है। यह एक ऐसी स्त्री की गाथा है जिसने एक पुरुष-प्रधान उद्योग और एक युद्ध-ग्रस्त समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई। अगर आप जापानी सिनेमा के प्रशंसक हैं, या फिर दुनिया भर की ‘क्लासिक सिनेमा लेजेंड्स’ में दिलचस्पी रखते हैं, तो किनुयो तनाका की ज़िंदगी का सफर आपको हैरान और प्रेरित ज़रूर करेगा।

Movie Nurture:Kinuyo Tanaka: वह जापानी अभिनेत्री जिसने पर्दे के पीछे भी रचा इतिहास

शुरुआत: एक नन्हीं बच्ची से स्टार तक का सफर

किनुयो तनाका का जन्म 1909 में जापान के शिमोनोसेकी शहर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनमें प्रदर्शन का शौक था। स्कूल के दिनों में वह नाटकों में हिस्सा लेती थीं। अपने पिता की मृत्यु के बाद इस प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए 1924 में, महज़ 15 साल की उम्र में, वह टोक्यो आ गईं और शोचिकु किनेमा के साथ एक अभिनेत्री के तौर पर अपना करियर शुरू किया।

उस ज़माने में जापानी सिनेमा मूक फिल्मों के दौर से गुज़र रहा था। किनुयो ने शुरुआत में छोटी-मोटी भूमिकाएँ निभाईं। लेकिन उनकी मेहनत और अभिनय क्षमता ने जल्द ही उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया। वह ‘जापानी सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार’ बनने की राह पर थीं। उनकी सुंदरता और अभिनय में एक सहज गहराई थी, जो उन्हें दूसरों से अलग करती थी।

मिज़ोगुची के साथ जुड़ाव: एक ऐतिहासिक साझेदारी का आग़ाज़

अगर किनुयो तनाका के करियर में किसी एक सबसे अहम व्यक्ति का नाम लेना हो, तो वह निर्देशक केनजी मिज़ोगुची होंगे। यह साझेदारी सिनेमा इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण निर्देशक-अभिनेत्री जोड़ियों में से एक मानी जाती है। मिज़ोगुची को अपनी फिल्मों के केंद्र में मजबूत, संघर्षशील स्त्री चरित्र चाहिए थे, और किनुयो उस भूमिका के लिए सटीक फिट थीं।

उन्होंने मिज़ोगुची की कम से कम 15 फिल्मों में काम किया, जिनमें से कई को आज भी दुनिया भर में मास्टरपीस माना जाता है।

  • द लाइफ ऑफ ओहारू (1952): इस फिल्म में किनुयो ने एक सम्मानित समुराई परिवार की औरत से लेकर एक साधारण वेश्या बनने तक के सफर को दिखाया। एक ही चरित्र की ज़िंदगी के अलग-अलग पड़ावों को उन्होंने इतनी बारीकी से निभाया कि दर्शक हैरान रह जाते हैं।

  • सैनशो द बेल्स्ट्यू (1954): इस फिल्म में उन्होंने एक ऐसी माँ का किरदार निभाया, जिसे गुलाम बना लिया जाता है और उसके बच्चों से जबरदस्ती अलग कर दिया जाता है। उनके चेहरे पर दर्द, आशा और एक माँ का साहस देखने लायक है। यह फिल्म ‘जापानी सिनेमा का स्वर्ण युग’ की एक अनमोल धरोहर है।

  • योकिही (1955): यह मिज़ोगुची की आखिरी फिल्म थी और इसमें किनुयो ने एक शाही पत्नी का किरदार निभाया। उनके अभिनय में राजसी ठाठ और गहरी उदासी का अनोखा मेल देखने को मिलता है।

मिज़ोगुची के साथ काम करना आसान नहीं था। वह बहुत सख्त निर्देशक थे और एक दृश्य को दर्जनों बार शूट करवाते थे। लेकिन किनुयो ने इस सख्ती को अपनी अभिनय यात्रा का हिस्सा बना लिया। इस साझेदारी ने न सिर्फ़ मिज़ोगुची की फिल्मों को अमर बनाया, बल्कि किनुयो को ‘जापान की सबसे सम्मानित अभिनेत्री’ के तौर पर स्थापित किया।

Movie Nurture:Kinuyo Tanaka: वह जापानी अभिनेत्री जिसने पर्दे के पीछे भी रचा इतिहास

सिर्फ़ मिज़ोगुची की म्यूज़ नहीं: अन्य निर्देशकों के साथ जुड़ाव

किनुयो तनाका की प्रतिभा किसी एक निर्देशक तक सीमित नहीं थी। उन्होंने अपने लंबे करियर में जापान के लगभग सभी बड़े निर्देशकों के साथ काम किया।

  • यासुजिरो ओज़ू: ओज़ू की फिल्मों का फोकस जापानी परिवारों और उनके बदलते रिश्तों पर होता था। ‘एक गिरी हुई औरत का गीत’ (1947) जैसी फिल्मों में किनुयो ने आधुनिक जापानी औरत की भूमिकाओं को बखूबी निभाया।

  • मिकियो नारुसे: नारुसे की फिल्म ‘बंगले (1951)’ में किनुयो ने एक मध्यमवर्गीय गृहिणी की भूमिका निभाई, जो युद्ध के बाद के जापान में अपनी पहचान और खुशी की तलाश करती है। यह भूमिका उनके अभिनय के दायरे को दर्शाती है।

  • केइसुके किनोशिता: किनोशिता की फिल्म ‘द रोड ऑफ शमेन ईटर (1954)’ में उन्होंने एक बूढ़ी महिला का किरदार निभाया, जो अपने परिवार की देखभाल करती है। इस भूमिका के लिए उन्होंने खुद को उम्रदराज़ दिखाया, जो एक स्टार अभिनेत्री के लिए एक बोल्ड कदम था।

यह विविधता साबित करती है कि किनुयो तनाका सिर्फ़ एक ‘टाइपकास्ट’ अभिनेत्री नहीं थीं। वह हर तरह के किरदार को जी सकती थीं – एक शाही महिला, एक गरीब माँ, एक आधुनिक पत्नी, या एक बूढ़ी औरत।

सबसे बड़ा कदम: निर्देशक बनने का साहसिक फैसला

1950 के दशक तक किनुयो तनाका जापान की सबसे सफल और सम्मानित अभिनेत्री बन चुकी थीं। उनके पास वह सब कुछ था जो एक कलाकार चाहता है। लेकिन उन्होंने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने उन्हें इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर कर दिया। 1953 में, उन्होंने निर्देशन की दुनिया में कदम रखा।

वह जापान की ‘पहली महिला निर्देशक’ बनीं, जिसने एक कमर्शियल फीचर फिल्म बनाई। यह फैसला आसान नहीं था। उस ज़माने में फिल्म इंडस्ट्री में महिला निर्देशकों का होना लगभग नामुमकिन सा था। यहाँ तक कि उनके सहयोगी और मित्र केनजी मिज़ोगुची ने भी शुरू में इसका विरोध किया था। लेकिन किनुयो ने हार नहीं मानी।

उनकी पहली फिल्म ‘लव लेटर’ (1953) थी, जो एक ऐसी औरत की कहानी थी जो युद्ध में अपने प्रेमी को खो देती है। इस फिल्म ने न सिर्फ़ बॉक्स ऑफिस पर सफलता हासिल की, बल्कि आलोचकों ने भी इसे काफी सराहा। किनुयो ने अपनी फिल्मों में भी उन्हीं विषयों को चुना, जिनसे वह एक अभिनेत्री के तौर पर जुड़ी रही थीं – औरतों की ज़िंदगी, उनके संघर्ष, उनकी इच्छाएँ और उनकी आज़ादी।

उन्होंने अपने करियर में कुल 6 फिल्मों का निर्देशन किया, जिनमें ‘द मून हैज रिसन’ (1955), ‘गर्ल्स ऑफ द नाइट’ (1961) और ‘लव अंडर द क्रूस’ (1962) जैसी फिल्में शामिल हैं। उनकी फिल्में ‘जापानी महिला निर्देशकों की अग्रदूत’ साबित हुईं।

एक अभिनेत्री की नज़र से निर्देशन

किनुयो तनाका का निर्देशन एक अभिनेत्री की संवेदनशीलता से भरा हुआ था। चूँकि वह खुद एक बेहतरीन कलाकार थीं, इसलिए वह अभिनेताओं से बेहतर तरीके से काम ले पाती थीं। उनकी फिल्मों में स्त्री चरित्रों को एक गहराई और सच्चाई मिलती थी, जो अक्सर पुरुष निर्देशकों की फिल्मों में देखने को नहीं मिलती थी।

वह ‘फीमेल गेज़’ यानी ‘स्त्रीयी दृष्टि’ की एक शुरुआती उदाहरण थीं। उनकी फिल्में सिर्फ़ औरतों के बारे में नहीं थीं, बल्कि वे औरतों की नज़र से बनी फिल्में थीं। यही कारण है कि आज उनके निर्देशन के काम को नए सिरे से खोजा और सराहा जा रहा है।

Movie Nurture: Kinuyo Tanaka: वह जापानी अभिनेत्री जिसने पर्दे के पीछे भी रचा इतिहास

विरासत और प्रभाव: किनुयो तनाका आज भी प्रासंगिक क्यों हैं?

किनुयो तनाका का 1977 में 67 साल की उम्र में लीवर कैंसर से निधन हो गया। लेकिन उनकी विरासत आज भी ज़िंदा है।

  1. एक प्रतीक के तौर पर: वह जापानी सिनेमा में महिलाओं की ताकत और हुनर का प्रतीक बन गई हैं। उनका सफर दिखाता है कि कैसे एक कलाकार अपनी भूमिका को सिर्फ़ पर्दे तक सीमित न रखकर, पर्दे के पीछे भी इतिहास बदल सकता है।

  2. अंतरराष्ट्रीय पहचान: 1960 में, वह कान फिल्म फेस्टिवल की ज्यूरी की सदस्य बनने वाली ‘पहली जापानी व्यक्ति’ बनीं। यह उनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता का सबूत था।

  3. आधुनिक फिल्मकारों के लिए प्रेरणा: आज की जापानी महिला निर्देशक, जैसे कि नाओमी कावासे, किनुयो तनाका को अपनी प्रेरणा मानती हैं। उन्होंने यह साबित कर दिया कि फिल्म निर्देशन सिर्फ़ पुरुषों का खेल नहीं है।

  4. फिल्म संरक्षण: दुनिया भर की फिल्म संस्थाएँ, जैसे कि द कोहलेक्शन, आज उनकी फिल्मों को रेस्टोर करके दर्शकों के सामने ला रही हैं, जिससे नई पीढ़ी उनके काम से रूबरू हो सके।

निष्कर्ष: एक अमर विरासत

किनुयो तनाका का जीवन सिनेमा और समाज, दोनों के लिए एक सबक है। उन्होंने दिखाया कि प्रतिभा की कोई सीमा नहीं होती। एक अभिनेत्री के तौर पर, उन्होंने जापानी सिनेमा के कुछ सबसे यादगार चरित्रों को जीवन दिया। एक निर्देशक के तौर पर, उन्होंने एक ऐसी राह बनाई, जिस पर चलकर कई और महिलाओं ने अपने सपने पूरे किए।

अगर आप ‘क्लासिक जापानी सिनेमा’ के शौकीन हैं, तो केनजी मिज़ोगुची की फिल्मों को देखना शुरू कीजिए। आप पाएँगे कि किनुयो तनाका की आँखों में सिर्फ़ एक किरदार नहीं, बल्कि पूरी एक सभ्यता की कहानी दर्द और गरिमा के साथ बसी हुई है। वह सिर्फ़ एक अभिनेत्री नहीं, बल्कि जापानी सिनेमा की एक ‘सांस्कृतिक धरोहर’ थीं। उनकी फिल्में आज भी हमसे बात करती हैं, हमें प्रेरित करती हैं और हमें याद दिलाती हैं कि सच्ची कला कभी बूढ़ी नहीं होती।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *