वो अभिनेत्री जिसने Alzheimer वाला किरदार निभाया और खुद Alzheimer की शिकार हो गई — Yoon Jeong-hee

Yoon Jeong-hee

कुछ ज़िन्दगियाँ इतनी अजीब होती हैं कि लगता है जैसे किसी ने पहले से पटकथा लिख रखी हो। Yoon Jeong-hee की कहानी कुछ ऐसी ही है। एक ऐसी अभिनेत्री, जिसने अपने करियर की आख़िरी फ़िल्म में एक ऐसी बुज़ुर्ग औरत का किरदार निभाया जो धीरे-धीरे अपनी यादें खोती जा रही है — और सालों बाद पता चला कि यह सिर्फ़ एक किरदार नहीं था। यह उनकी अपनी ज़िन्दगी की भी कहानी थी।

Busan की एक लड़की जो स्क्रीन की रानी बनी

30 जुलाई 1944 को दक्षिण कोरिया के बंदरगाह शहर Busan में Son Mi-ja नाम की एक बच्ची पैदा हुई। कौन जानता था कि यही बच्ची एक दिन Korean cinema की सबसे चमकदार सितारों में से एक बनेगी। बाद में उन्होंने अपना नाम बदला — Yoon Jeong-hee, यह नाम कोरिया की फ़िल्मी दुनिया में गूँजने वाला था, दशकों तक।

वो Korean अभिनेत्री जिन्होंने Alzheimer का किरदार निभाया

1964 में उन्होंने Miss Korea प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। सुंदरता उनके चेहरे पर थी, पर असली ताक़त उनकी आँखों में थी — वो आँखें जो एक किरदार को जीती थीं, सिर्फ़ निभाती नहीं थीं। 1967 में Hapdong Film ने एक बड़ा ऑडिशन रखा जिसमें 1200 से ज़्यादा लड़कियाँ शामिल हुईं। Yoon Jeong-hee उनमें से चुनी गईं। निर्देशक Gang Dae-jin की फ़िल्म Cheongchun Geukjang (Sorrowful Youth) से उनका debut हुआ और अकेले Seoul शहर में उस फ़िल्म को 2 लाख 70 हज़ार लोगों ने देखा। यह शुरुआत नहीं थी — यह एक युग की शुरुआत थी।

“Troika” — Korean Cinema का वो सुनहरा त्रिकोण

1960 और 1970 के दशकों में South Korean cinema एक नई करवट ले रहा था। युद्ध की तबाही के बाद देश खड़ा हो रहा था, और सिनेमा उसकी आत्मा बन रहा था। इसी दौर में तीन अभिनेत्रियाँ उभरीं — Yoon Jeong-hee, Moon Hee, और Nam Jeong-im. इन तीनों को मिलाकर लोग “Troika” कहने लगे। तीनों की अपनी-अपनी पहचान थी, अपनी-अपनी ताक़त।

Yoon Jeong-hee इस तिकड़ी में सबसे अधिक बहुमुखी मानी जाती थीं। वो melodrama में रोती थीं तो दर्शकों की आँखें भी भर आती थीं। ऐतिहासिक फ़िल्मों में उनकी गरिमा देखने लायक थी। अपने पूरे करियर में उन्होंने लगभग 330 फ़िल्मों में काम किया — यह संख्या किसी भी अभिनेत्री के लिए असाधारण है।

1972 में आई उनकी फ़िल्म Oyster Village ने कमाल कर दिया। इस फ़िल्म को Blue Dragon Film Awards में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार मिला और Yoon Jeong-hee को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का। लेकिन इससे भी बड़ी बात — इस फ़िल्म को Berlin International Film Festival में Golden Bear के लिए नामांकित किया गया। उस ज़माने में किसी Korean फ़िल्म का Berlin तक पहुँचना अपने आप में एक इतिहास था।

Paris की राहें और एक pianist से मोहब्बत

1973 का साल था। Yoon Jeong-hee अपने करियर के शिखर पर थीं। हर निर्देशक उन्हें अपनी फ़िल्म में चाहता था, हर दर्शक उन्हें पर्दे पर देखना चाहता था। लेकिन उनके मन में कुछ और था — वो सिनेमा को समझना चाहती थीं, और उसके लिए वो Paris चली गईं। फ़िल्म की पढ़ाई के लिए।

Paris में उनकी मुलाक़ात हुई pianist Paik Kun-woo से। संगीत और सिनेमा का यह मेल शायद क़िस्मत ने तय किया था। 1976 में दोनों ने शादी कर ली। उनकी एक बेटी हुई — Paik Jin-hee — जो बड़ी होकर violinist बनी। एक परिवार जहाँ हर इंसान किसी न किसी कला से जुड़ा था।

1994 में Korean War पर आधारित फ़िल्म Manmubang के लिए उन्हें Grand Bell Award मिला — यह Korea का सबसे प्रतिष्ठित फ़िल्म पुरस्कार है। और फिर… वो ग़ायब हो गईं। परदे से, सुर्ख़ियों से, सबकी नज़रों से। Paris उनका घर था, और उन्होंने वहीं रहना चुना — शांति से, कला से दूर नहीं, पर सार्वजनिक जीवन से ज़रूर।

2010 की फ़िल्म Poetry (시)

16 साल की ख़ामोशी के बाद — एक वापसी, एक चमत्कार

2010, Yoon Jeong-hee की उम्र 64 साल थी। और Korean cinema के सबसे बड़े auteur निर्देशकों में से एक — Lee Chang-dong — उनके पास एक स्क्रिप्ट लेकर आए।

फ़िल्म का नाम था Poetry (시 — Si).

कहानी थी Yang Mi-ja की — 66 साल की एक बुज़ुर्ग महिला, जो अपने नाकारा नाती को पाल रही है, जीवन की आखिरी साँसों में कविता लिखना सीख रही है, और साथ ही धीरे-धीरे अपनी यादें खोती जा रही है। Alzheimer उसे अंदर से खा रहा है — एक शब्द कहीं छूट जाता है, एक चेहरा धुंधला हो जाता है, एक लम्हा हाथ से निकल जाता है।

Lee Chang-dong ने बाद में बताया कि उन्होंने यह किरदार सिर्फ़ और सिर्फ़ Yoon Jeong-hee के लिए लिखा था। किसी और के बारे में सोचा ही नहीं था।

और Yoon Jeong-hee ने इस किरदार को ऐसे जिया जैसे यह उनकी अपनी कहानी हो। Cannes में जब फ़िल्म premiere हुई, तो आलोचकों ने एक स्वर में कहा — यह किसी अभिनेत्री का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है। Poetry ने 2010 के Cannes Film Festival में Best Screenplay Award जीता। और Yoon Jeong-hee को 7 Best Actress Awards मिले — जिनमें Asia Pacific Screen Award, Grand Bell Award, और Los Angeles Film Critics Association Award शामिल थे।

64 साल की उम्र में। 16 साल की ख़ामोशी के बाद। यह वापसी नहीं थी — यह पुनर्जन्म था।

जब हक़ीकत ने fiction को पकड़ लिया

यहीं से कहानी का वो मोड़ आता है जो दिल को हिला देता है।

Yoon Jeong-hee ने पर्दे पर एक Alzheimer मरीज़ का किरदार निभाया था जो अपनी यादें खो रही थी। और जब दुनिया उस performance की तारीफ़ कर रही थी, उसी दौरान — शायद — असली बीमारी उनके अंदर पाँव पसारने लगी थी।

2019 में उनके पति pianist Paik Kun-woo ने सार्वजनिक रूप से बताया कि Yoon Jeong-hee पिछले करीब 10 सालों से Alzheimer से जूझ रही हैं। यानी जब वो Poetry की शूटिंग कर रही थीं, उस वक्त यह बीमारी शायद अपनी शुरुआती अवस्था में थी। जिस किरदार को उन्होंने इतनी गहराई से जिया — वो किरदार उनकी अपनी ज़िन्दगी का आईना बन गया।

सोचिए — एक अभिनेत्री, एक भूमिका में यादें खोने का दर्द जीती है। कैमरा बंद होता है। लाइटें बुझती हैं। और फिर असली ज़िन्दगी में वही दर्द उसके दरवाज़े पर दस्तक देता है।

Paris की गलियों में Yoon Jeong-hee का एकांत

इसे संयोग कहें, त्रासदी कहें, या नियति — शब्द कम पड़ जाते हैं।

Paris में अकेलापन और परिवार का दर्द

2021 में एक petition सामने आई — Yoon Jeong-hee के भाई-बहनों ने South Korea की तत्कालीन सरकार से गुहार लगाई। उन्होंने कहा कि उनकी बहन Paris के एक suburb में अकेली पड़ी हैं, ठीक से देखभाल नहीं हो रही, उन्हें महीने में बस एक बार 30 मिनट का फ़ोन करने दिया जाता है और तीन महीने में एक बार दो घंटे मिलने की इजाज़त है।

यह petition Korea में तूफ़ान बन गई। मीडिया ने इसे उठाया। पति Paik Kun-woo ने आरोपों को नकारा। बेटी पर भी सवाल उठे। एक court case हुआ जो परिवार हार गया।

एक तरफ़ था एक औरत का गौरवशाली इतिहास — 330 फ़िल्में, 20 से अधिक awards, Cannes का सम्मान, Berlin का नामांकन। और दूसरी तरफ़ थी एक बीमार, थकी हुई, यादें खोती हुई इंसान — जो यह भी नहीं जानती थी कि उसकी ज़िन्दगी के बारे में दुनिया क्या बात कर रही है।

आख़िरी साँस, violin की धुन, और एक विदाई

19 जनवरी 2023 की शाम। Paris का समय करीब 5 बज रहा था। Yoon Jeong-hee ने आँखें बंद कीं। उनकी बेटी Paik Jin-hee उनके पास बैठी वायलिन बजा रही थी।

उनके पति ने बाद में लिखा — “वो सपने में थीं, शांति से चली गईं। बेटी Jin-hee की violin की आवाज़ सुनते हुए।”

78 साल की उम्र में। Paris में। उसी शहर में जहाँ उन्होंने कभी सिनेमा सीखने आई थीं, जहाँ उन्हें प्यार मिला था, जहाँ उन्होंने एक नई ज़िन्दगी बनाई थी।

1960 के दशक में Korean cinema की 'Troika'

वो जो छोड़ गईं

Korean cinema आज दुनिया में Parasite और Squid Game की वजह से जाना जाता है। लेकिन यह मुकाम अचानक नहीं आया। इसकी नींव उन लोगों ने रखी जिन्होंने 1960 के दशक में, युद्ध के ज़ख्म ताज़े होते हुए भी, सिनेमा को ज़िन्दा रखा। Yoon Jeong-hee उनमें से एक थीं।

उनकी 330 फ़िल्में एक library हैं — Korean समाज का एक document, उनके किरदारों में उस दौर की औरतें हैं, उनकी तकलीफ़ें हैं, उनके सपने हैं।

और Poetry — वो फ़िल्म जो उनकी आख़िरी विदाई थी — आज भी world cinema की बेहतरीन कृतियों में गिनी जाती है। उसमें उन्होंने जो किया, वो सिर्फ़ acting नहीं था। वो एक prophecy थी — अनजाने में, बिना जाने, उन्होंने अपनी आने वाली ज़िन्दगी को पर्दे पर जी लिया था।

अंत में

Yoon Jeong-hee का नाम आज भी Korean cinema की किताबों में सुनहरे हर्फ़ों में लिखा है। लेकिन उनकी असली विरासत शायद उस ironny में है जो ज़िन्दगी ने उन्हें दी।

एक अभिनेत्री जिसने भूलने का दर्द अभिनय से जिया। और फिर ज़िन्दगी ने उसे सच में भुलाने पर मजबूर किया।

कैमरे के सामने उन्होंने कविता लिखना सीखा — ज़िन्दगी की सुंदरता ढूंढना सीखा। और शायद उनकी असली ज़िन्दगी भी एक कविता ही थी — अधूरी, दर्दनाक, लेकिन बेहद ख़ूबसूरत।

Yoon Jeong-hee को याद करना सिर्फ़ एक अभिनेत्री को याद करना नहीं है। यह उस पूरे युग को याद करना है जब Korean cinema अपनी आवाज़ ढूंढ रहा था — और जब एक औरत ने अपनी पूरी ज़िन्दगी उस आवाज़ को देने में लगा दी।

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