फिल्में अक्सर हमें एक अलग दुनिया में ले जाती हैं – रोमांच, फंतासी, या शानदार जीवन की दुनिया में। लेकिन कभी-कभी कोई फिल्म हमें हमारे आसपास की ही दुनिया में ले जाती है, और उसे इतनी गहराई से दिखाती है कि हमारी सांसें थम सी जाती हैं। ऐसी ही एक फिल्म है विटोरियो डी सिका की ‘लादरी दी बिसिकलेटे’ या जिसे हम ‘बाइसिकल थीव्स’ या ‘साइकिल चोर’ के नाम से जानते हैं। यह फिल्म सिर्फ एक कहानी नहीं, एक दौर का दस्तावेज है, एक ऐसा आईना है जो युद्ध के बाद के इटली की टूटी हुई आत्मा को दिखाता है। यह कहानी है इटैलियन नवयथार्थवाद की, जिसने दुनिया को सिनेमा देखने का एक नया नजरिया दिया।
वह समय: युद्ध के बाद की तबाही और एक नई शुरुआत
दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद का इटली एक टूटा हुआ देश था। शहरों के खंडहर, बेरोजगारी, गरीबी और मानवीय संवेदनाओं का सूनापन – यह थी वह हकीकत जिससे पूरा देश गुजर रहा था। हॉलीवुड का चमकदार, भव्य और पलायनवादी सिनेमा इस हकीकत से कोसों दूर था। ऐसे में कुछ फिल्मकारों ने महसूस किया कि अब सिनेमा को जमीन पर उतरना होगा। उसे आम आदमी की कहानी कहनी होगी। यहीं से जन्म हुआ ‘इटैलियन नवयथार्थवाद’ या ‘नियोरियलिज़्म’ का।

इस आंदोलन के स्तंभ थे रॉबर्टो रॉसेलिनी, लुचिनो विस्कॉन्टी, फेडरिको फेलिनी (शुरुआती दौर में) और विटोरियो डी सिका। इनका मानना था कि फिल्मों को स्टूडियो के बजाय असली लोकेशन पर शूट करना चाहिए। पेशेवर अभिनेताओं के बजाय आम लोगों को कास्ट करना चाहिए। कहानियाँ समकालीन सामाजिक समस्याओं पर केंद्रित होनी चाहिए। और सबसे बढ़कर, फिल्मों में जीवन की कठोर वास्तविकता को बिना श्रृंगार के दिखाना चाहिए। ‘बाइसिकल थीव्स’ इसी दर्शन का सबसे सुंदर, सबसे दर्दनाक और सबसे पूर्ण प्रतिनिधि बनकर उभरी।
कहानी का सार: एक साइकिल जिस पर टिकी है एक परिवार की इज्जत
फिल्म की कहानी सीधी-सादी, मगर गहरी है। यह है अंतोनियो रिक्सी की कहानी, जो रोम का एक बेरोजगार व्यक्ति है। उसे दो साल के इंतजार के बाद एक नौकरी मिलती है – शहर में पोस्टर चिपकाने की। लेकिन इस नौकरी के लिए एक साइकिल चाहिए। उसकी अपनी साइकिल गिरवी रखी हुई है। अपनी पत्नी मारिया की मदद से वह अपने बिस्तर के चादर-तकिए गिरवी रखकर साइकिल छुड़ाता है। अगले दिन नौकरी पर जाते समय, एक युवक उसकी साइकिल चुरा लेता है। अंतोनियो और उसका छोटा बेटा ब्रूनो पूरे रोम में उस साइकिल की तलाश में भटकते हैं। यह तलाश सिर्फ एक साइकिल की तलाश नहीं, बल्कि सम्मान, आत्मविश्वास और एक बेहतर जीवन की आशा की तलाश है।
यहाँ कहानी में कोई नाटकीय मोड़ नहीं, कोई बड़ा एक्शन नहीं, कोई रोमांस नहीं। है तो बस एक आदमी और उसके बेटे का शहर के चक्कर लगाते हुए थक जाना, निराश होना, और फिर भी हार न मानना। फिल्म का अंत – जब अंतोनियो खुद एक साइकिल चोरी करने की कोशिश करता है और पकड़ा जाता है, और उसका बेटा उसे शर्मिंदा और टूटा हुआ देखता है – सिनेमा के इतिहास के सबसे शक्तिशाली अंत में से एक है। यह अंत नाटकीय नहीं, मर्मांतक है।
नवयथार्थवाद की छाप: वह तकनीक जिसने बदली फिल्मों की भाषा
‘बाइसिकल थीव्स’ नवयथार्थवाद के सिद्धांतों को कैनवास की तरह उकेरती है:
1.वास्तविक स्थान: फिल्म पूरी तरह से रोम की सड़कों पर, उसके बाजारों में, उसकी इमारतों के बीच शूट की गई है। स्टूडियो का एक भी सेट नहीं है। यह रोम युद्ध के बाद का रोम है – धूल भरा, उजड़ा हुआ, लेकिन जीवंत।
2.गैर-पेशेवर अभिनेता: लैम्बर्टो मज्जोरानी, जो अंतोनियो की भूमिका में हैं, वह एक फैक्ट्री मजदूर थे। उनके चेहरे पर थकान, चिंता और निराशा वास्तविक है क्योंकि वह उसी दुनिया से आते हैं जिसकी कहानी फिल्म कह रही है। बाल कलाकार एन्ज़ो स्टैयोला (ब्रूनो) के चेहरे पर भोली-भाली उम्मीद और फिर निराशा देखने लायक है।
3.सामाजिक सरोकार: फिल्म सीधे तौर पर बेरोजगारी, गरीबी और युद्ध के बाद के सामाजिक विघटन को संबोधित करती है। यह दिखाती है कि कैसे एक छोटी सी वस्तु (साइकिल) एक परिवार के अस्तित्व का प्रतीक बन जाती है।
4.प्राकृतिक प्रकाश व्यवस्था और कैमरा वर्क: फिल्म में कोई विशेष लाइटिंग नहीं है। कैमरा अक्सर हाथ में पकड़े हुए जैसा लगता है, जो पात्रों का पीछा करता है, जैसे कोई चुपचाप उनके संघर्ष को देख रहा हो।
5.नैतिक जटिलता: फिल्म किसी को ‘खलनायक’ नहीं बनाती। साइकिल चुराने वाला लड़का भी गरीब है। अंतोनियो खुद चोरी करने लगता है। यहाँ अच्छा-बुरा नहीं, बस जीवन के संघर्ष और नैतिकता के धुंधले होते सीमांत हैं।
चरित्रों की दुनिया: अंतोनियो और ब्रूनो का सफर
फिल्म की धड़कन है अंतोनियो और उसके बेटे ब्रूनो का रिश्ता। शुरुआत में अंतोनियो अपने बेटे के सामने एक आदर्श पिता की तरह है – नौकरी मिलने पर उसे रेस्तरां में खाना खिलाता है। लेकिन साइकिल चोरी होने के बाद उसकी हताशा उसे चिड़चिड़ा बना देती है, वह ब्रूनो को डांटता है। फिर भी, ब्रूनो उसका साथ नहीं छोड़ता। वह अपने पिता के साथ पूरे दिन पैदल चलता है, उसकी मदद करता है।
एक अद्भुत दृश्य है जब थके-हारे ब्रूनो को पिता उसे बिठाकर खाने के लिए एक पैसे वाली रोटी खरीदता है। बैठे-बैठे ब्रूनो नींद से बोझिल आँखों से अपने पिता को देखता है जो बगल में खड़ा है। यह चुप्पी में कहा गया वह संवाद है जो बताता है कि पिता-बेटे के बीच शब्दों से परे कितना कुछ है। अंत में, जब अंतोनियो चोरी करते हुए पकड़ा जाता है और लोग उसे मारने लगते हैं, तो ब्रूनो का “पापा! पापा!” कहता हुआ उसके पास आना और उसका हाथ पकड़ना, दर्शक के हृदय को विदीर्ण कर देता है। चोर के रूप में बदनाम हो चुके पिता का हाथ थामकर ब्रूनो उसे उसकी इज्जत वापस दिलाता है। यह दृश्य शायद ही कभी सिनेमा में इतनी सूक्ष्मता और शक्ति के साथ फिल्माया गया हो।
सामाजिक चित्रण: सिर्फ एक साइकिल नहीं, एक पूरी व्यवस्था की कहानी
फिल्म साइकिल चोरी की घटना से आगे बढ़कर पूरे सामाजिक ताने-बाने को दिखाती है। हम देखते हैं कि कैसे गरीबों का एक समुदाय है जो एक-दूसरे की मदद करता है। अंतोनियो के पड़ोसी उसकी साइकिल छुड़ाने में मदद करते हैं। साइकिल चोरी होने पर उसके दोस्त उसके साथ तलाश में निकलते हैं। लेकिन फिल्म उस व्यवस्था की ओर भी इशारा करती है जो इन लोगों को इस हालत में रखती है। भीड़-भरे श्रम बाजार के दृश्य, जहाँ अंतोनियो को नौकरी मिलती है, यह दर्शाते हैं कि रोजगार कितनी दुर्लभ वस्तु है।
साइकिल चोरी के बाद, अंतोनियो और ब्रूनो जिस बाजार में जाते हैं, वहाँ सैकड़ों साइकिलों के पुर्जे बिखरे पड़े हैं। यह दृश्य बताता है कि चोरी और गरीबी का यह चक्र कितना व्यापक है। हर कोई किसी न किसी चीज का चोर है, क्योंकि हर कोई किसी न किसी चीज से वंचित है।
फिल्म का संगीत और ध्वनि: मौन का महत्व
चिकोनिनी का संगीत इस फिल्म की भावनाओं को और गहरा करता है। संगीत ज्यादातर हल्का और मर्मस्पर्शी है, जो पिता-पुत्र के सफर के दुख और कभी-कभी आशा को उजागर करता है। लेकिन फिल्म में मौन का भी बहुत महत्व है। जब अंतोनियो साइकिल की तलाश में निराश होकर बैठ जाता है, तो सिर्फ रोम की सड़कों की आवाजें सुनाई देती हैं। यह मौन उसकी निराशा को शब्दों से कहीं ज्यादा प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करता है।
विरासत और प्रभाव: एक फिल्म जिसने सबको प्रभावित किया
‘बाइसिकल थीव्स’ ने न सिर्फ इटली, बल्कि पूरी दुनिया के सिनेमा को प्रभावित किया। इसने भारतीय सिनेमा के यथार्थवादी आंदोलन, खासकर सत्यजित राय को गहराई से प्रभावित किया। राय ने स्वीकार किया था कि ‘पथेर पांचाली’ बनाने का विचार उन्हें ‘बाइसिकल थीव्स’ देखने के बाद आया था। ईरानी नवयथार्थवाद और लैटिन अमेरिकी सिनेमा पर भी इसका गहरा असर दिखता है।

आज भी, जब भी कोई फिल्मकार वास्तविक स्थानों पर, गैर-पेशेवर कलाकारों के साथ, सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बनाता है, तो उसकी जड़ें कहीं न कहीं इसी नवयथार्थवाद और इसी फिल्म में दिख जाती हैं। यह फिल्म एक तकनीकी उपलब्धि से कहीं बढ़कर, मानवीय संवेदना की एक उत्कृष्ट उपलब्धि है।
निष्कर्ष: साधारण की असाधारण महागाथा
विटोरियो डी सिका की ‘बाइसिकल थीव्स’ आखिर में हमें क्या देती है? यह हमें एक सबक देती है – कि महान कहानियाँ अक्सर सबसे साधारण लोगों के जीवन में छिपी होती हैं। यह फिल्म हमें सहानुभूति सिखाती है। जब हम अंतोनियो और ब्रूनो के साथ रोम की सड़कों पर चलते हैं, तो हम उनकी हताशा, उनकी छोटी-छोटी खुशियों और उनके अटूट प्रेम को महसूस करने लगते हैं।
यह फिल्म इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कोई आसान समाधान नहीं देती। अंत में साइकिल नहीं मिलती। अंतोनियो की नौकरी चली जाती है। लेकिन फिल्म समाप्त होते-होते ब्रूनो अपने पिता का हाथ थाम लेता है। और यही अंतिम छवि है – एक पिता और पुत्र, टूटे हुए, शर्मिंदा, लेकिन एक-दूसरे के साथ। उनकी एकजुटता ही उनकी जीत है। यह आशा की एक किरण है, भले ही बहुत धुंधली हो।
इटैलियन नवयथार्थवाद की यह उत्कृष्ट कृति हमें याद दिलाती है कि सिनेमा का सबसे बड़ा काम हमें मानवीय बनाए रखना है। हमें दिखाना है कि दुनिया में हम अकेले नहीं हैं, कि हर कोई किसी न किसी साइकिल की तलाश में है। और कभी-कभी, जीवन में सबसे बड़ी यात्रा वह होती है जो हम अपने प्रियजनों के हाथ थामकर, हार माने बिना, सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि हमें करनी है। ‘बाइसिकल थीव्स’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, मानवीय स्थिति का एक कालातीत चित्र है, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी 1948 में थी।
