साल 1942 था। हॉलीवुड में हेनरी फोंडा का नाम बड़े पोस्टरों पर सबसे ऊपर छपता था। उन्होंने द ग्रेप्स ऑफ़ रैथ जैसी फिल्म दी थी, ऑस्कर के लिए नामांकित हो चुके थे और स्टूडियो उनके पीछे हाथ बाँधे खड़े रहते थे। ऐसे में एक दिन ख़बर आई कि यह अभिनेता नौसेना में भर्ती होने जा रहा है। वह अफ़सर बनकर नहीं, एक आम नाविक की तरह जाना चाहता था।
उस वक़्त उनकी उम्र 37 साल थी, यानी फौज में बुलाए जाने की उम्र पार हो चुकी थी। कोई उन्हें मजबूर नहीं कर रहा था। फिर भी उन्होंने चमक-दमक छोड़कर जहाज़ का डेक चुना। यह लेख उसी फ़ैसले की कहानी है: वह क्यों लिया गया, उसकी क्या क़ीमत चुकानी पड़ी और उसने फोंडा को हमेशा के लिए कैसे बदल दिया।
एक नज़र में
- पूरा नाम: हेनरी जेनकिन्स फोंडा (Henry Fonda)
- जन्म: 16 मई 1905, ग्रैंड आइलैंड, नेब्रास्का (अमेरिका)
- 1940s की प्रमुख फिल्में: द ग्रेप्स ऑफ़ रैथ (1940), द लेडी ईव (1941), द ऑक्स-बो इंसिडेंट (1943), माय डार्लिंग क्लेमेंटाइन (1946)
- सैन्य सेवा: अमेरिकी नौसेना, 1942 से द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के आसपास तक
- सम्मान: युद्ध-सेवा के लिए ब्रॉन्ज़ स्टार
- युद्ध के बाद की बड़ी वापसी: ब्रॉडवे नाटक मिस्टर रॉबर्ट्स (1948)
नेब्रास्का का एक शर्मीला लड़का
हेनरी फोंडा की कहानी हॉलीवुड की चकाचौंध से नहीं, अमेरिका के बीचोबीच बसे एक शांत राज्य से शुरू होती है। नेब्रास्का में पले-बढ़े इस लड़के ने बचपन में कभी नहीं सोचा था कि वह अभिनेता बनेगा। वह स्वभाव से कम बोलने वाला और झिझकने वाला था। अभिनय में वह लगभग इत्तेफ़ाक से आया, जब ओमाहा के एक स्थानीय थिएटर में उसे एक छोटा-सा रोल मिला।
वहाँ से न्यूयॉर्क के मंच तक पहुँचने में उसे कुछ साल लगे, फिर हॉलीवुड ने बुला लिया। न्यूयॉर्क के उन्हीं संघर्ष भरे दिनों में उनकी दोस्ती एक और नौजवान अभिनेता जेम्स स्टीवर्ट से हुई। दोनों एक कमरे में रहते थे। यह दोस्ती आगे चलकर युद्ध के दिनों में भी उनके जीवन का हिस्सा बनी रही।
फोंडा की ख़ास बात उनका सादापन था। वे ऐसे हीरो नहीं थे जो पर्दे पर चमकते-दमकते उतरें। उनके चेहरे में एक पड़ोसी जैसी आत्मीयता थी, जिस पर लोग भरोसा कर लेते थे। शायद इसी वजह से जब वे पर्दे पर ईमानदार आदमी बनते थे, तो दर्शक उसे सच मान लेते थे।
1940: जब किस्मत ने दरवाज़ा खटखटाया
1939 तक फोंडा की गिनती बड़े सितारों में होने लगी थी। यंग मिस्टर लिंकन में उन्होंने अब्राहम लिंकन की जवानी निभाई। ड्रम्स अलॉन्ग द मोहॉक जैसी फिल्में भी चलीं। लेकिन असली छलाँग 1940 में आई।
जॉन स्टाइनबेक के मशहूर उपन्यास पर बनी द ग्रेप्स ऑफ़ रैथ में उन्हें टॉम जोड का किरदार मिला, जो महामंदी के दौर में अपनी ज़मीन से उजड़े एक किसान परिवार का बेटा है। इस किरदार में उन्होंने जो सादगी और ग़ुस्से का मेल दिखाया, वह आज भी अमेरिकी सिनेमा की सबसे याद की जाने वाली अदाकारियों में गिना जाता है। उन्हें इसके लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के ऑस्कर में नामांकन मिला। पुरस्कार उसी साल उनके पुराने रूममेट जेम्स स्टीवर्ट के हाथ लगा, द फिलाडेल्फिया स्टोरी के लिए।
इस किरदार के साथ एक कड़वी शर्त भी जुड़ी थी। बताया जाता है कि स्टूडियो प्रमुख डैरिल ज़ैनक ने फोंडा को यह रोल सात साल के लंबे अनुबंध के बदले दिया। यानी फोंडा को मनचाहा किरदार मिला, पर उसकी क़ीमत में उसकी आज़ादी गिरवी रखनी पड़ी। इसके बाद वर्षों तक उन्हें अक्सर वे फिल्में करनी पड़ीं जो स्टूडियो चाहता था, वे नहीं जो उनका मन चाहता था। यह बात आगे उनके फ़ैसलों को समझने के लिए अहम है।
सुनहरे दौर की हल्की बयार: द लेडी ईव
सिर्फ़ गंभीर किरदार ही नहीं, फोंडा हँसाना भी जानते थे। 1941 की द लेडी ईव में उन्होंने एक भोले-भाले, साँपों के शौकीन अमीर वारिस का रोल किया, जो एक चालाक महिला के जाल में फँस जाता है। यह फिल्म आज भी रोमांटिक कॉमेडी की सबसे बेहतरीन मिसालों में गिनी जाती है। फोंडा का हर झेंप भरा हाव-भाव, हर लड़खड़ाता कदम फिल्म को यादगार बना देता है।
तो तस्वीर यह थी: एक अभिनेता जो गंभीर और हल्के, दोनों तरह के किरदारों में सफल था, जिसके पास शोहरत थी और जिसके सामने एक लंबा करियर खुला था। फिर दुनिया बदल गई।

दिसंबर 1941 और वह बेचैनी
7 दिसंबर 1941 को पर्ल हार्बर पर हमला हुआ और अमेरिका द्वितीय विश्व युद्ध में कूद पड़ा। हॉलीवुड में जैसे हलचल मच गई। कई सितारे फौज की तरफ़ बढ़े। जेम्स स्टीवर्ट पहले ही सेना की वायु शाखा में जा चुके थे और आगे जाकर उन्होंने बमवर्षक विमान उड़ाए। क्लार्क गेबल ने भी वायुसेना में कदम रखा। टायरोन पावर मरीन में गए।
फोंडा के मन में एक उलझन थी। वे उम्र के कारण भर्ती के लिए अनिवार्य नहीं थे। उनका एक परिवार था, जिसमें पत्नी और दो छोटे बच्चे थे, जेन और पीटर। स्टूडियो भी चाहता था कि वे फिल्में करते रहें, क्योंकि युद्ध के दिनों में लोगों को पर्दे पर हौसला देने वाले चेहरे चाहिए थे। कुछ लोगों का तर्क था कि सितारे फिल्में करके भी देश की सेवा कर सकते हैं।
लेकिन फोंडा को यह बात चैन नहीं लेने देती थी। जिन किरदारों को वे पर्दे पर निभाते आए थे, ईमानदार, ज़िम्मेदार और आम आदमी, उनके असली जीवन का आईना भी वही होना चाहिए था। उन्हें लगता था कि जब हज़ारों नौजवान लड़ने जा रहे हैं, तब वे रंगीन सेट पर बैठकर सैनिक का अभिनय करें, यह उनके ज़मीर को मंज़ूर नहीं था।
1942: आख़िरकार वर्दी
1942 में उन्होंने अमेरिकी नौसेना में भर्ती होने का फ़ैसला किया। उनके करियर का सबसे बड़ा दौर चल रहा था और वे उसे बीच में रोक रहे थे। उनकी द ऑक्स-बो इंसिडेंट और द इम्मॉर्टल सार्जेंट जैसी फिल्में 1943 में सिनेमाघरों में पहुँचीं, तब तक वे अपनी पुरानी ज़िंदगी पीछे छोड़कर वर्दी में थे।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि वे सहूलियत वाला रास्ता चुन सकते थे। एक मशहूर अभिनेता को नौसेना के प्रचार-विभाग या फिल्म इकाई में आराम से रखा जा सकता था, जहाँ वे वर्दी भी पहनते और ख़तरे से भी दूर रहते। कई सितारों के लिए ऐसे इंतज़ाम किए गए थे। मगर कहा जाता है कि फोंडा ने ख़ुद को इस तरह के “स्पेशल ट्रीटमेंट” से अलग रखना चाहा। वे आम भर्ती की तरह जाना चाहते थे, किसी ख़ास रियायत के बिना।
नौसेना में उन्हें क्वार्टरमास्टर (जहाज़ की दिशा-निर्देशन से जुड़ा पद) की ज़िम्मेदारी मिली। जो आदमी कल तक लाखों की कमाई वाले स्टूडियो में कुर्सी पर बैठता था, वह अब एक विध्वंसक जहाज़ (डेस्ट्रॉयर) पर नक्शे, कम्पास और हुक्म की भाषा में उलझा रहता था।
जहाज़ का डेक, जहाँ कोई स्टार नहीं था
फोंडा को यूएसएस सैटरली नाम के विध्वंसक जहाज़ पर तैनात किया गया। जहाज़ की ज़िंदगी में कुछ भी ग्लैमरस नहीं था। कमरे तंग थे, नींद अधूरी रहती थी, समंदर कभी शांत तो कभी बेरहम, और ख़तरा हमेशा सिर पर। यहाँ कोई उन्हें “मिस्टर फोंडा, सुपरस्टार” की तरह नहीं देखता था। साथी नाविकों के लिए वे बस एक और सैनिक थे, जिसे उतनी ही मेहनत करनी थी जितनी बाकी को।
बहुत से लोग मानते हैं कि इन्हीं दिनों में उन्होंने किरदारों की असली क़ीमत समझी। पर्दे पर जिस आम आदमी की भूमिका वे बरसों से निभाते आए थे, उसे अब वे अपनी रोज़ की ज़िंदगी में जी रहे थे।

अफ़सर का दर्जा और प्रशांत महासागर की ज़िम्मेदारी
कुछ समय बाद उन्हें अफ़सर का दर्जा मिला और उनकी भूमिका बदल गई। उन्होंने प्रशांत क्षेत्र में एयर कॉम्बैट इंटेलिजेंस में काम किया। इस विभाग का काम दुश्मन के हवाई ठिकानों, विमानों की गतिविधियों और हमले के रास्तों की जानकारी जुटाकर उसका विश्लेषण करना था। यह शोरगुल वाला काम नहीं था। इसमें दिमाग़, धैर्य और सटीकता चाहिए थी, और कभी-कभी एक ग़लत अंदाज़ा किसी की जान ले सकता था।
उनकी इस सेवा के लिए उन्हें ब्रॉन्ज़ स्टार से सम्मानित किया गया। ख़ास बात यह है कि फोंडा ने अपनी इस उपलब्धि को कभी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं बताया। बाद के सालों में उन्होंने युद्ध के अपने दिनों के बारे में बहुत कम बात की। हॉलीवुड में जहाँ लोग ज़रा-सी बहादुरी को भी बड़ा करके सुनाते हैं, फोंडा की चुप्पी उनके स्वभाव की गवाही देती है।
जो घर पर पीछे रह गए
कोई भी फ़ैसला अकेला व्यक्ति नहीं भुगतता। फोंडा के जाने के बाद उनके बच्चे, जेन और पीटर, बड़े होते गए और पिता का साथ बहुत कम मिला। जेन फोंडा ने आगे चलकर कई बार बताया कि उनके पिता भावनात्मक रूप से दूर रहने वाले इंसान थे। यह हर परिवार की कहानी नहीं होती, पर इतना ज़रूर है कि युद्ध ने फोंडा को सिर्फ़ बाहर से नहीं, भीतर से भी बदला था।
और यही सिक्के का दूसरा पहलू है। देशसेवा की यह तस्वीर जितनी चमकदार दिखती है, उसके पीछे उतना ही सूनापन भी था। जो लोग घर छोड़कर युद्ध में जाते थे, उनके पीछे बचा परिवार भी उसी युद्ध का हिस्सा होता था, बस मोर्चे पर नहीं, घर में।
लौटना: माय डार्लिंग क्लेमेंटाइन
युद्ध ख़त्म हुआ तो फोंडा हॉलीवुड लौटे। अब वे वही आदमी नहीं थे जो गए थे। उनकी आँखों में ठहराव और चुप्पी में एक वज़न आ गया था।
वापसी की पहली बड़ी फिल्म बनी माय डार्लिंग क्लेमेंटाइन (1946), जिसे जॉन फोर्ड ने निर्देशित किया था। इसमें फोंडा ने मशहूर वेस्टर्न किरदार वायट अर्प की भूमिका निभाई। यहाँ का वायट अर्प शोर-शराबे वाला गनफाइटर नहीं था। वह एक थका हुआ, शांत और हिसाब से चलने वाला इंसान था, जिसे हिंसा से ज़्यादा इंसाफ़ की फ़िक्र थी। कई समीक्षकों का मानना है कि इस किरदार में युद्ध से लौटे फोंडा की झलक साफ़ दिखती है।
इसके बाद उन्होंने जॉन फोर्ड के साथ फोर्ट अपाचे (1948) जैसी फिल्म में भी काम किया। दोनों की जोड़ी ने वेस्टर्न फिल्मों को एक नई गरिमा दी।
युद्ध ने जो सिखाया: मिस्टर रॉबर्ट्स
जिस तरह फोंडा ने हॉलीवुड के स्टूडियो सिस्टम का बोझ ढोया था, वह उन्हें अब चुभने लगा था। 1948 में उन्होंने एक बड़ा क़दम उठाया और ब्रॉडवे के मंच पर लौट गए। नाटक का नाम था मिस्टर रॉबर्ट्स, एक नौसैनिक जहाज़ पर बोरियत, सनक और अधूरी इच्छाओं से जूझते नाविकों की कहानी।
यह महज़ संयोग नहीं था कि जिस इंसान ने सचमुच जहाज़ पर वक़्त गुज़ारा था, उसे जहाज़ की ज़िंदगी पर बना नाटक मिला। लेफ्टिनेंट डग रॉबर्ट्स का किरदार उन पर इस तरह फिट बैठा, जैसे वह उनके अपने अनुभवों से निकला हो। नाटक कई सालों तक चला और फोंडा को इसके लिए टोनी पुरस्कार मिला। बाद में 1955 में इसी पर फिल्म भी बनी।
सोचिए: सुपरस्टार ने सुख-सुविधाएँ छोड़कर समंदर चुना, और समंदर ने उसे वही किरदार वापस लौटाया जो उसके दिल के सबसे क़रीब था। क़िस्मत की यह गोलाई कम ही लोगों के हिस्से में आती है।

यह फ़ैसला आज भी क्यों मायने रखता है?
आज के दौर में, जब लोग शोहरत को ही सबकुछ मान लेते हैं, फोंडा का यह फ़ैसला कई सवाल खड़े करता है।
पहला सवाल: क्या शोहरत किसी को ज़िम्मेदारियों से बरी कर देती है? फोंडा का जवाब साफ़ था: नहीं। उन्होंने रियायत लेने के बजाय बराबरी चुनी।
दूसरा सवाल: क्या अपने उसूलों पर चलने की कोई क़ीमत नहीं होती? होती है। उन्होंने अपने करियर के चरम पर कई साल गँवाए। परिवार से दूरी सही। कुछ फिल्मों के मौक़े भी हाथ से निकले।
तीसरा सवाल: क्या सच में एक कलाकार का निजी जीवन उसके किरदारों से जुड़ा होता है? फोंडा की मिसाल बताती है कि कभी-कभी ऐसा होता है। टॉम जोड हो या डग रॉबर्ट्स, उनके निभाए किरदार इसलिए सच्चे लगे क्योंकि उनके पीछे एक सच्चा इंसान खड़ा था।
यह भी ईमानदारी से कहना चाहिए कि फोंडा कोई दोषरहित महानायक नहीं थे। उनके पारिवारिक रिश्ते उलझे रहे और उनके बच्चों ने उन्हें हमेशा आदर्श पिता के रूप में याद नहीं किया। लेकिन इंसान की पूरी तस्वीर यही होती है, जिसमें रोशनी भी होती है और परछाईं भी।
निष्कर्ष
हेनरी फोंडा के 1940 के दशक को अगर एक वाक्य में कहना हो, तो यह एक ऐसे अभिनेता की कहानी है जिसने पर्दे पर आम आदमी को ज़िंदा किया और फिर असली ज़िंदगी में भी वही बनकर दिखाया। उनके पास रुकने के सौ बहाने थे, पर उन्होंने जाने का एक कारण चुना: ज़मीर।
हॉलीवुड ने उन्हें स्टार बनाया, पर जंग के मैदान ने उन्हें इंसान बनाया। शायद इसीलिए आज, दशकों बाद भी, जब कोई द ग्रेप्स ऑफ़ रैथ का आख़िरी भाषण देखता है, तो वह सिर्फ़ एक अभिनेता को नहीं, एक ऐसे आदमी को सुन रहा होता है जिसने जो कहा, वह जिया भी।
