मोमोटारो: सेक्रेड सेलर्स (1945): जापान की पहली फीचर-लेंथ एनिमेशन फिल्म की पूरी कहानी

मोमोटारो

अप्रैल 1945 का जापान आज की कल्पना से बहुत अलग था। टोक्यो पर बम गिर रहे थे, शहरों में राशन की लाइनें लगती थीं और घरों के लोग बंकरों में रातें काट रहे थे। ऐसे समय में सिनेमाघरों में एक रंग-बिरंगी, मासूम-सी दिखने वाली कार्टून फिल्म लगी, जिसमें बंदर, भालू, कुत्ते और खरगोश पैराशूट से उतर रहे थे। फिल्म का नाम था मोमोटारो: उमि नो शिनपेई, जिसे दुनिया Momotaro: Sacred Sailors के नाम से जानती है।

यह जापान की पहली फीचर-लेंथ एनिमेशन फिल्म मानी जाती है। इसकी कहानी जितनी दिलचस्प है, उतनी ही उलझी हुई भी है। यह एक तरफ़ कला की उपलब्धि है और दूसरी तरफ़ युद्ध के प्रचार का औज़ार। इस लेख में हम दोनों पहलुओं को ईमानदारी से देखेंगे।

फिल्म एक नज़र में

  • मूल नाम: 桃太郎 海の神兵 (Momotaro: Umi no Shinpei)
  • रिलीज़: 12 अप्रैल 1945
  • निर्देशक: मित्सुयो सेओ (Mitsuyo Seo)
  • अवधि: लगभग 74 मिनट
  • निर्माण: शोचिकु एनिमेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट
  • प्रायोजक: जापानी इंपीरियल नेवी (नौसेना)

जापानी एनिमेशन की शुरुआती कारीगरी दिखाते हैं

कौन था मोमोटारो?

फिल्म को समझने के लिए पहले मोमोटारो को जानना ज़रूरी है। जापान में हर बच्चा यह लोककथा सुनकर बड़ा होता है। एक बूढ़े दंपति को नदी में बहता हुआ एक विशाल आड़ू मिलता है। उसे काटने पर अंदर से एक बच्चा निकलता है, जिसका नाम रखा जाता है मोमोटारो, यानी “आड़ू का बेटा”। बड़ा होकर वह दुष्ट राक्षसों (ओनी) से लड़ने निकलता है। रास्ते में उसे एक कुत्ता, एक बंदर और एक तीतर मिलते हैं, जो किबी-दांगो नाम की मिठाई के बदले उसके साथी बन जाते हैं।

यह कहानी सदियों पुरानी है और बच्चों को साहस, दोस्ती और अच्छाई की जीत सिखाती है। लेकिन 1930 और 40 के दशक में जापान की सैन्य सरकार ने इस मासूम कथा को एक नया रंग दे दिया। मोमोटारो को “जापान की ताकत” और राक्षसों को “दुश्मन” के रूप में पेश किया जाने लगा। पोस्टर, किताबें और रेडियो पर यह छवि बार-बार दोहराई गई। फिल्म इसी सिलसिले की सबसे बड़ी कड़ी थी।

नौसेना ने यह फिल्म क्यों बनवाई?

इसके पीछे दो वजहें थीं।

पहली वजह, 1930 के दशक में सेना और नौसेना को समझ आ गया था कि एनिमेशन का असर बहुत गहरा होता है। बच्चे और परिवार कार्टून को बिना शक के देखते हैं और उसमें कही गई बात दिल में बैठ जाती है।

दूसरी वजह थी निर्देशक की प्रतिभा। मित्सुयो सेओ पहले ही 1943 में मोमोटारो नो उमिवाशी (Momotaro’s Sea Eagles) नाम की एक छोटी फिल्म बना चुके थे। लगभग 37 मिनट की इस फिल्म को नौसेना ने खूब सराहा। उसी की कामयाबी के बाद नौसेना ने उन्हें एक पूरी लंबी फिल्म बनाने का ज़िम्मा सौंपा, जो आगे चलकर सेक्रेड सेलर्स बनी।

यानी यह कोई आम स्टूडियो का प्रोजेक्ट नहीं था। इसका पैसा, मक़सद और संदेश तीनों नौसेना की सोच से जुड़े थे।

फिल्म की कहानी

फिल्म की शुरुआत बड़े शांत और सुंदर अंदाज़ में होती है। हरे-भरे जंगल का एक गाँव है, जहाँ जानवर अपने घरों में रहते हैं और अपने बच्चों के साथ हँसी-खुशी वक़्त बिताते हैं। कुछ जानवर जापानी नौसेना में भर्ती हो जाते हैं, जिनमें बंदर, कुत्ता, भालू और तीतर जैसे पात्र शामिल हैं।

पहले हिस्से में उनकी ट्रेनिंग दिखाई गई है। वे अनुशासन सीखते हैं, पैराशूट से कूदना सीखते हैं और अपने घरवालों को चिट्ठियाँ लिखते हैं। यह हिस्सा ज़्यादातर हल्का-फुल्का और भावुक है।

इसके बाद कहानी एक दूर के द्वीप पर पहुँचती है। वहाँ के स्थानीय जानवर सीधे-सादे और भोले दिखाए गए हैं। जापानी सैनिक-जानवर उन्हें खेती का तरीका बताते हैं, खेल सिखाते हैं और यहाँ तक कि जापानी भाषा के अक्षर भी पढ़ाते हैं। इस दृश्य में एक संदेश साफ़ झलकता है: जापान खुद को एशिया का “मुक्तिदाता” और “बड़ा भाई” दिखाना चाहता था। उस दौर की सरकारी विचारधारा का यही मुख्य नारा था।

कहानी का आख़िरी हिस्सा युद्ध का है। द्वीप पर “दुश्मन” का कब्ज़ा है, और जापानी जानवर बहादुरी से हमला करके उसे आज़ाद कराते हैं। इस लड़ाई में पैराशूट और हवाई हमले का दृश्य सबसे यादगार है। फिल्म का अंत जीत के साथ होता है और मोमोटारो की भावना यहाँ जापानी सेना के रूप में उभरती है।

"फिल्म का खोना और दोबारा मिलना"

एनिमेशन की ख़ूबी

अगर प्रचार वाला हिस्सा अलग रखकर सिर्फ कला की बात करें, तो इस फिल्म की तारीफ़ करनी पड़ती है।

उस समय जापान के पास संसाधन सीमित थे। फिर भी इस फिल्म में हाथ से बनाई गई फ्रेम की संख्या, कैमरा मूवमेंट और भावनाओं की बारीकी हैरान करती है। कहा जाता है कि निर्देशक सेओ डिज़्नी के काम से बहुत प्रभावित थे। उस दौर में अमेरिका की स्नो व्हाइट और फैंटेसिया जैसी फिल्में जापानी एनिमेटरों के लिए एक सपना थीं। सेओ ने कुछ तकनीकें सीखीं, लेकिन उन्हें अपनी शैली में ढाला।

फिल्म में जानवरों के चेहरे बहुत भावपूर्ण हैं। मिसाल के लिए, जब कोई सैनिक अपने घर की चिट्ठी पढ़ता है, तो उसकी आँखों का भाव एक पल में दर्शक से जुड़ जाता है। ग्रामीण जीवन के दृश्यों में रंगों का इस्तेमाल बहुत नरम और काव्यात्मक है। पैराशूट से उतरते सैनिकों वाले हिस्से में गति और संगीत का तालमेल इतना अच्छा है कि वह सचमुच किसी ओपेरा जैसा लगता है।

संगीत भी फिल्म की जान है। पश्चिमी ऑर्केस्ट्रा की धुनों और जापानी लोक-स्वर का मेल उस दौर में नया प्रयोग था। फिल्म के गीत बच्चों की जुबान पर चढ़ने लायक बनाए गए थे।

1945 में रिलीज़: सबसे बुरा समय

अब असली विडंबना सुनिए। फिल्म जब 12 अप्रैल 1945 को रिलीज़ हुई, तब जापान की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। टोक्यो पर भीषण हवाई हमले हो चुके थे और कई सिनेमाघर तबाह हो गए थे। जो बचे थे, वहाँ भी बहुत कम लोग आ पाते थे। कुछ ही महीनों में हिरोशिमा और नागासाकी की त्रासदी हुई और अगस्त में युद्ध खत्म हो गया।

यानी जिस फिल्म को लाखों बच्चों और परिवारों तक पहुँचकर जनता का हौसला बढ़ाना था, उसे बहुत कम लोग देख पाए। यह एक ऐसी फिल्म थी जिसने ठीक उस समय दर्शकों से मुलाक़ात की, जब उसका संदेश सबसे ज़्यादा खोखला साबित हो रहा था।

तेज़ुका ओसामु और एक बच्चे का सपना

इस फिल्म की कहानी में सबसे भावुक मोड़ तेज़ुका ओसामु का है। आगे चलकर यही नौजवान “एनिमे और मंगा के भगवान” कहलाए। उन्होंने अस्त्रो बॉय और किम्बा, द व्हाइट लायन जैसी कृतियाँ रचीं, जिन्होंने पूरी जापानी एनिमेशन इंडस्ट्री की नींव रखी।

तेज़ुका उस समय किशोर थे और उन्होंने यह फिल्म देखी थी। उन्होंने बाद में कई जगह बताया कि इस फिल्म ने उन्हें बहुत गहराई से छुआ। एनिमेशन की ताकत और खूबसूरती देखकर वे तय कर बैठे कि उन्हें भी ऐसा ही कुछ बनाना है। दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने अपने जीवन में युद्ध-प्रचार की आलोचना भी की और अपनी कहानियों में शांति और जीवन के सम्मान को केंद्र में रखा।

यानी एक ऐसी फिल्म, जो हिंसा और प्रचार के लिए बनी थी, उसने एक ऐसे कलाकार को जन्म दिया जिसने बाद में प्रेम और मानवता की कहानियाँ गढ़ीं। यह इतिहास की अजीब पर सच्ची विडंबना है।

Japanese Movie

फिल्म का खोना और दोबारा मिलना

युद्ध के बाद जापान पर मित्र देशों का कब्ज़ा हो गया। सैन्य प्रचार से जुड़ी बहुत-सी फिल्मों और सामग्री को नष्ट करने या जब्त करने का सिलसिला चला। सेक्रेड सेलर्स भी कुछ समय के लिए लगभग गुमनामी में चली गई।

बाद के दशकों में फिल्म के मूल नेगेटिव की खोज हुई और इसे दोबारा सहेजा गया। इसके बाद इसे कुछ फिल्म समारोहों और एनिमेशन के अध्ययन-कार्यक्रमों में दिखाया गया। आज इसे एनिमेशन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ के रूप में पढ़ा जाता है। इसकी रिलीज़ और पुनर्खोज से जुड़े कुछ ब्योरे अलग-अलग स्रोतों में थोड़े अलग मिलते हैं, इसलिए सटीक तारीख़ें जाँचकर ही उद्धृत करना बेहतर होगा।

प्रचार या कला? एक ईमानदार नज़रिया

अब बड़ा सवाल यह है कि इस फिल्म को आज कैसे देखा जाए।

एक तरफ़ यह सच है कि फिल्म साफ़ तौर पर सैन्य सोच का हिस्सा थी। इसमें दूसरे देशों के लोगों को भोले, अधूरे और “सिखाए जाने लायक” दिखाया गया है, और जापान को उनका रक्षक। इतिहास जानने वाले जानते हैं कि असलियत इससे बहुत अलग थी। युद्ध के दौरान जापानी कब्ज़े के तहत एशिया के कई देशों ने गहरी पीड़ा झेली। इसलिए फिल्म का “भाईचारे” वाला संदेश आज बहुत सहजता से नहीं पढ़ा जा सकता।

दूसरी तरफ़, यह भी उतना ही सच है कि फिल्म में कारीगरी, कल्पना और मेहनत का स्तर असाधारण है। सेओ और उनकी टीम ने संसाधनों की भारी कमी के बीच जो रचा, वह तकनीकी दृष्टि से अद्भुत है। कई समीक्षक मानते हैं कि निर्देशक के मन में शायद शांति और बचपन की मासूमियत का भाव भी था, क्योंकि फिल्म के कई हिस्से लड़ाई से ज़्यादा परिवार, घर और प्रकृति के बारे में हैं।

इसलिए ज़्यादातर इतिहासकार इसे दोनों नज़रियों से देखने की सलाह देते हैं। इसे सिर्फ़ “बुरी प्रचार फिल्म” कहकर खारिज करना भी अधूरा है और सिर्फ़ “सुंदर एनिमेशन” कहकर तारीफ़ करना भी।

क्या आज इसे देखना चाहिए?

अगर आपको एनिमेशन के इतिहास, जापानी सिनेमा या द्वितीय विश्व युद्ध के सांस्कृतिक पहलू में दिलचस्पी है, तो यह फिल्म ज़रूर देखने लायक है। लेकिन इसे मनोरंजन की तरह नहीं, एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह देखना चाहिए। देखते समय खुद से कुछ सवाल पूछिए:

  • यह दृश्य दर्शकों में कौन-सी भावना जगाना चाहता है?
  • जानवर किन लोगों के प्रतीक हैं?
  • “दुश्मन” को कैसे दिखाया गया है और क्यों?

इन सवालों के साथ फिल्म देखने पर वह सिर्फ़ कार्टून नहीं रहती। वह एक पूरे दौर की सोच का आईना बन जाती है।

जापानी लोककथा की पुरानी किताब

भारतीय दर्शकों के लिए क्या सीख?

हम भारतीयों के लिए यह फिल्म एक और वजह से ख़ास है। हमारे यहाँ भी पंचतंत्र, जातक कथाओं और लोककहानियों के ज़रिए जानवरों के माध्यम से संदेश देने की लंबी परंपरा रही है। सेक्रेड सेलर्स दिखाती है कि वही कहानी कहने का तरीका, जो बच्चों को सीख देता है, ताक़तवर हाथों में पड़कर किसी विचारधारा का हथियार भी बन सकता है।

यह हमें सतर्क करता है कि कहानियाँ मासूम होती हैं, पर उन्हें सुनाने वाले हमेशा मासूम नहीं होते। जो कुछ हम पर्दे पर देखते हैं, उसके पीछे की मंशा को पहचानना भी उतना ही ज़रूरी है जितना उसकी कला को सराहना।

निष्कर्ष

मोमोटारो: सेक्रेड सेलर्स एक ऐसी फिल्म है जो अपने समय की सबसे बड़ी उपलब्धि भी थी और सबसे बड़ा विरोधाभास भी। इसने जापानी एनिमेशन को एक नई ऊँचाई दी, एक किशोर को सपना दिया जो आगे चलकर पूरे उद्योग का पितामह बना, और साथ ही यह भी दिखाया कि कला जब सत्ता के हाथ में हो, तो उसका इस्तेमाल किस तरह किया जा सकता है।

आज जब हम एनिमे को दुनिया भर में लोकप्रिय देखते हैं, तो यह याद रखना अच्छा है कि इसकी जड़ों में एक ऐसी फिल्म भी है जिसे बमबारी के बीच बनाया गया और जो शायद सही समय पर कभी दर्शकों तक पहुँच ही नहीं पाई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *